सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित विकास से मिलने वाले अवसरों का वितरण पूरे ग्लोब पर असमान रूप से वितरित है।देशों में विस्तृत आर्थिक,राजनीतिक और सामाजिक भिन्नताएं पाई जाती हैं।निर्णायक कारक यह है कि कोई देश कितनी शीघ्रता से अपने नागरिकों को सूचना और संचार प्रौद्योगिकी तक पहुंच और उसके लाभ उपलब्ध करा सकता है।विकसित देश,सामान्य रूप से,इस दिशा में आगे बढ़ गए है जबकि विकासशील देश पिछड़ गए हैं और इसी को अंकीय विभाजक कहा जाता है।इसी प्रकार देशों के भीतर अंकीय विभाजक विद्यमान है। उदाहरणतः भारत और रूस जैसे विशाल देश में यह अवश्यंभावी है कि महानगरीय केंद्रों जैसे निश्चित क्षेत्रों में परिधिस्थ ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अंकीय विश्व के साथ बेहतर संबंध तथा पहुंच पाई जाती है। डिजिटल डिवाइड या अंकीय विभाजन अंकीय तकनीक तक प्रभावी पहुँच के पक्ष से लोगों के बीच वह मौजूद विभाजन या फ़ाड़े को कहते हैं। अर्थात, जिन समूहों और शख़्सों की तकनीक तक पहुँचना का फ़र्क़ है। संसार के देशों के बीच अंकीय विभाजन वैश्विक अंकीय विभाजन को कहते हैं।[1] यह कई आधार पर हो सकता है।जैसे गरीबी ,अशिक्षा और प्राकृतिक स्थिति। अंकीय विभाजन को कम करने के लिए विकासशील देशों को प्रभावी कदम उठाने चाहिए |

वैश्विक अंकीय विभाजन 2006 में: कंप्यूटर के प्रति 100 लोग


सन्दर्भसंपादित करें

  1. "अंकीय विभाजन कैसे दबाया जाये - संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट" (PDF). मूल (PDF) से 11 अगस्त 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 अप्रैल 2016.