अच्युत के दूसरे अर्थ हेतु अच्युत् श्रीमदभगवतगीता के प्रथम अध्याय के 21वें श्लोक में अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को अच्युत कह कर संम्बोधित किया है

सेनयोरूभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेैऽच्युत।जिससे

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योध्दुकामानवस्थितान्।। 21

कैर्मया सह यो योध्दव्यमस्मिरणसमुद्यमे।। 22

अर्जुन ने कहा- हे अच्युत कृपा करके मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलें जिससेे मैं यहॉ युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को और शस्त्रों की इस महान परीक्षा में जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूँ। अच्युत का अर्थ है- भगवान अपने भक्त पर स्नेह दिखानें मे कभी नहीं चूकते है इसलिए भगवान श्री कृष्ण को अच्युत कह कर संम्बोधित किया जाता है। भगवान अपने भक्त की आज्ञा का पालन करते हैं और इसमें भगवान को कोई संकोच नहीं होता है जैसे महाभारत युद्ध के समय भगवान ने अपने भक्त का सारथी बन कर उसकी आज्ञा का पालन किया। जहॉ कहीं भी रथ ले चलने का आदेश अर्जुन देता है भगवान वहीं रथ लेकर चलते है। इसलिए भगवान को अच्युत शब्द से अर्जुन ने संबोधित किया।

अच्युतसंपादित करें

विभिण्डुकियों द्वारा परिचालित सत्र मे इन्होने प्रतिहर्ता का काम किया था, जिसका वर्णन जैमनीय ब्राह्मण में मिलता है, प्रतिहर्ता का काम किसी भी किये गये वैदिक वर्णन का प्रयोग के रूप में समझा जाना होता है, जमिनी पद्धति में ज्योतिष के प्रत्येक फ़र्मूले को विभिन्न लोगों की कुन्डलिया और जन्म समय को खुद के द्वारा समझ कर और अपनी देख रेख में प्रसव आदि के समय का ज्ञान रखने के बाद कालान्तर मे जैमिनी पद्धति में वर्णन किया गया था, उसका हर प्रकार से सही उतरने पर ही जैमिनी सिद्धांत का निर्णय जन सामान्य के लिये उपयोग मे लाया गया था।

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