अनवतप्त ( संस्कृत), प्राचीन बौद्ध ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार, दुनिया के केंद्र में स्थित झील है। अनवत्पत नाम का अर्थ है "(ऐसा कुंड) जो गर्म न हो सके"। ऐसी मान्यता है कि इस कुंड के पानी से जीवों को विचलित करने वाली आग शांत होती है। अनवत्पत एक ड्रैगन का नाम भी है जो झील में रहता है; बोधिसत्व बनने के बाद, वह उन संकटों से मुक्त हो गया जो अन्य ड्रैगन को कष्ट देते थे, जो उग्र गर्मी से तड़पते हैं और जिनका गरुड़ द्वारा शिकार करते हैं।

अनवतप्त एक बौद्ध विश्व मानचित्र पर (1710)

चार्ल्ज़ हिगम (Charles Higham) के अनुसार, अनवत्पत कुंड एक "पवित्र हिमालयी कुंड था, जो मानव पापों को दूर करने वाली चमत्कारी गुणकारी शक्तियों से युक्त था।" [1] :125 जार्ज कदस (George Cœdès) इस कुंड के विषय में बताते हैं, "... भारतीय परंपरा के अनुसार, हिमालय की परिधि में स्थित है, और इसका पानी जानवरों के सिर के रूप में दैत्यों से निकलता है।" [2] :174

कैलाश पर्वत के दक्षिण में मौजूद, अनवत्पत झील को परिधि में 800 ली और सोने, चांदी और कीमती पत्थरों से घिरा बताया गया है। इस कुंड से चार नदियाँ निकलीं। इसकी सांसारिक अभिव्यक्ति अक्सर मानसरोवर झील को माना जाता है, जो हिमालय में कैलाश पर्वत के तल पर स्थित है। चार पौराणिक नदियों को कभी-कभी गंगा (पूर्व), सिंधु (दक्षिण), अमु दरिया (पश्चिम), और तारिम या पीली नदी (उत्तर) के रूप में पहचाना जाता है।

ब्रह्माण्ड का यह प्राचीन बौद्ध दर्शन बाग़वानी के माध्यम से छठी शताब्दी में चीन से जापान पहुँचा था। इस तरह के बगीचों में अक्सर केंद्र में एक टीला बनाया जाता था, जिसे मेरु पर्वत का रूप माना जाता था, और एक तालाब बनाया था, जो अनवत्पत का प्रतीक था।

संदर्भसंपादित करें

  1. Higham, C., 2001, The Civilization of Angkor, London: Weidenfeld & Nicolson,
  2. Empty citation (मदद)