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राग और द्वेष से असंपृक्त हो जाना ही अनासक्ति है। महात्मा गाँधी ने गीता के श्लोकों का सरल अनुवाद करके अनासक्ति योग का नाम दिया। कर्तव्य कर्म करते समय निष्पृह भाव में चले जाना ही अनासक्त भाव है। बुद्ध ने इसे 'उपेक्षा' कहा है।