अनुवाचन श्रोताओं की उपस्थिति में औपचारिक शैली से किसी कविता, गद्य, भाषण या अन्य लिखाई के पाठ करने की क्रिया होती है। अक्सर यह पाठ सामग्री का स्मरण करके बिना किसी साहयता के किया जाता है, हालांकि लिखित सामग्री भी प्रयोग की जा सकती है। विश्व की कई सांस्कृतिक परम्पराओं में अनुवाचन का महत्व है। धार्मिक व अन्य सन्दर्भों में यह अक्सर एक नियमबद्ध कला भी होती है जिसमें उच्चारण इत्यादि पर बहुत ध्यान दिया जाता है।[1][2][3]

फ़िनलैंड में अपनी कविताओं का अनुवाचन करती एक अमेरिकी कवयित्री

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Kuipers, Cornelius (1944) "Preface" Christian dialogs and recitations: dialogs, recitations, readings, pageants Zondervan, Grand Rapids, Michigan, page 1 and following, OCLC 9054621
  2. Denny, Frederick Mathewson (1989) "Qur’ān Recitation: A Tradition of Oral Performance and Transmission" Archived 2 दिसम्बर 2017 at the वेबैक मशीन. Oral Tradition 4(1/2): pp. 5-26, page 1
  3. Martin, Richard (2005) "Tilāwah" in Jones, Linsay (editor) (2005) Encyclopedia of Religion (2nd edition) Volume 13, page 9200, Macmillan Reference, Detroit, Michigan, ISBN 0-02-865982-1