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मराठा शासक शिवाजी के सलाहकार परिषद को अष्ट प्रधान कहा जाता था। शिवाजी महाराज [1] थे उनके राज्याभिषेक में भी कई समस्याएं आईं। प्रथम पेशवा जो की स्वयं ब्राहमण था, ने शिवाजी के क्षत्रिय होने का सार्वजनिक रूप से विरोध किया। उसने शिवाजी से कहा उनका राज्याभिषेक एक क्षत्रिय के रूप में नहीं वरन शुद्र के रूप में हो सकता हे और कुछ ब्राहमण इसके लिए तैयार हे। ब्राहमणों ने शिवाजी के द्वारा किये गए जाने-अनजाने पापों की सूची बनाई जिसमे भूलवश युद्ध के दौरान गोवध भी शामिल था इसके आधार पर दंड निर्धारण किया गया और यह दंड उन को देना पड़ा। इस प्रकार 11000 ब्राहमणों को परिवार् सहित भोज्य वस्त्र और अन्यसामग्री 4 महीने तक दी गयी। उन्होंने इसे अपना अपमान समझा
शिवाजी के राज तिलक के समय पर उन्हें स्वर्ण मुकुट पहनाया गया और बहुमूल्य रत्नों और स्वर्ण पुष्पों की वर्षा की गई। ब्राह्मणों को दिए गए उपहारों के कारण उन लोगो ने अपने विरोध को दबाये रखा। शिवाजी का शुद्धिकरण शुद्र से क्षत्रिय, गंगा भट्ट नामक ब्राहमण ने वैदिक मन्त्र सिखा कर किया। ब्राहमणों ने कहा इस समय सिर्फ ब्राहमण ही द्विजाति हे और कोई भी क्षत्री जाती वास्तविक नहीं हे अपनी समाज के इस मंतव्य पर गनगा भट्ट अपना आप खो बता और उसने एक अनुष्टान को छोड़ दिया। जिसे बाद में रायगढ़ में किया गया। गंगा भट्ट को एक लाख रुपया दिया गया। शिवाजी तिलक को सूरत में अंग्रेजी फैक्ट्री मुख्य हेनरी ओक्सेंदेंग ने अपनी आँखों से देखा। इस दोरान इस बात को भी बताया जाता हे की सिवाजी ने अपना हिरन्य गर्भ संस्कार कराया था जिससे वे शुद्ध क्षत्र्य बन जाये।
इतना शक्तिशाली योधा भी जातिवाद का शिकार होकर क्षत्रियत्व को प्राप्त करने को प्रलोभित किया गया। उसने अपना राजकोष सिर्फ इस कार्य के लिए खली कर दिया और सैनिक तयारी पर कुछ भी खर्च नहीं किया [2]। अंतत: बहुत सा धन देकर असंतुष्ट ब्राहमणों को प्रसन्न किया गया। कुल मिला कर 460 लाख रुपया खर्च हुआ। किन्तु पुणे के ब्राहमण लोग अभी भी संतुष्ट नहीं हुए और शिवाजी महारज को राजा मानने से इंकार कर दिया। तब अष्ट प्रधान मंडल की स्थापना की गयी[3]। जिसमे सात सदस्य ब्राह्मण थे[4]

इसका विवरण इस प्रकार है -

  1. पेशवा - ये मंत्रियों का प्रधान था प्रशासन में राजा के बाद जिसका सबसे ज्यादा महत्व था और इसकी तुलना प्रधानमंत्री से की जा सकती है।
  2. अमात्य - अमात्य वित्त मंत्री था। वह राजस्व संबंधी मुद्दों के प्रति उत्तरदायी था। इसकी तुलना मौर्यकालीन राजा अशोक के महामात्य से की जा सकती है।
  3. मंत्री - राजा के दैनिक कार्यों का ब्यौरा रखता था। इसे वकियानवीस भी कहते थे।
  4. सचिव - राजा के पत्र व्यवहार और शाही मुहर जैसे दफ्तरी काम करता था।
  5. सुमन्त - विदेश मंत्री।
  6. सेनापति - सैनिक प्रधान .
  7. पण्डितराव - दान का अध्यक्ष।
  8. न्यायाधीश - कानूनी मामलों का निर्णायक।

शिवाजी के बादसंपादित करें

शिवाजी के पुत्र सांभाजी, (शासन 1680–89) ने इस परिषद को विशेष महत्त्व नहीं दिया। कालांतर में परिषद के पद वंशानुगत होते चले गये एवं दरबार में इनकी महत्ता न्यूनतम रह गयी। १७१४ ई के आरंभ में शिवाजी के पौत्र छत्रपति शाहूजी ने इनकी महत्ता एवं शक्तियों में काफ़ी वृद्धि की और इसके साथ ही कुछ ही समय में मराठा राज्य का वास्तविक नियंत्रण उनके परिवार तक ही सीमित रह गया। वंशानुगत प्रधानमंत्री परिवार ने पेशवा की पदवी बनाये रखी। हालांकि शिवाजी के समय अष्टप्रधान को मिले अधिकार न उसे फिर मिल पाये न ही यह फिर कभी पुनर्जागृत हो पायी।

जाट गोदारा जाति कहां से निकलि

  1. http://hindi.ibtl.in/news/vande-matrubhoomi/2079/shivajis-coronation-ceremony-at-raigarh-6th-june-1674/
  2. सदाशिवन, एन. (०१). ए सोशल हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया (गूगल पुस्तकें) (अंग्रेज़ी में). ए.पी.एच.पब्लिशिंग. पृ॰ २४९. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद); |pages= और |page= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद); |date=, |year= / |date= mismatch में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  3. त्रिशरण, डॉ॰विजय कुमार. छत्रपति शाहूजी महाराज - सामाजिक लोकतंत्र के भीमस्तंभ (गूगल पुस्तकें). दिल्ली: गौतम बुक सेंटर, मुद्रक: शिवाजी आर्ट प्रेस, दिल्ली. पृ॰ 32. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-87733-90-4. अभिगमन तिथि ११ दिसम्बर २०१२.
  4. नर्वाणे, विंग कमाण्डर (सेवानिवृत्त) एम.एस. (२००६). बैटल्स ऑफ़ द ऑनरेबल ईस्ट इण्डिया कंपनी - मेकिंग ऑफ़ द राज (गूगल पुस्तकें). दिल्ली: ए.पी.एच.पब्लिशिंग. पृ॰ २४. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-313-0034-X. |pages= और |page= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद)