आनुवांशिक कोड पढ़ने की विधि

मानव रुधिर वर्ग को समझाइए

प्रकृति हमारा जेनेटिकल, अर्थात् आनुवंशिक कोड केवल चार अक्षरों वाली वर्णमाला में लिखती है। ये चार अक्षर हैं अंग्रेज़ी के AGCT. चारों, चार रासायनिक क्षारों के प्रतीक हैं--

  1. एडेनीन,
  2. गुआनीन,
  3. साइटोसिन और
  4. थाइमीन.
डी एन ए संरचना

केवल चार अक्षर या चार क्षार होते हुए भी इस कोड को पढ़ना न केवल आसान नहीं है, उसमें समय भी बहुत लगता है, हालांकि अब ऐसी मशीनें भी उपलब्ध हैं, जो बटन दबाते ही डी एन ए सूत्रों के रूप में लिखी आनुवंशिक सामग्री पढ़ सकती हैं।

चित्र:DNA functional groups.jpg
डी एन ए चार मूल बेसों का बना होता : एडेनिन,थायमिन,गुआनिन,साइटोसिन

किंतु, इन मशीनों को भी जैवरासायनिक क्रियाओं से जुड़ी असंख्य गणनाएँ करनी पड़ती हैं, जिसमें कई-कई घंटे लग जाते हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए जर्मनी में डोर्टमुंड के एक शोधक ने जैवरासायनिक क्रियाओं की गणना के बिना ही, यानी आनुवंशिक कोड को सीधे ही पढ़ लेने का उपाय ढूँढ़ निकाला है।

आनुवंशिक कोड की पहेली

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अब तक का तरीका यह है कि सीक्वेंसियल रॉबट कहलाने वाली मशीनें आनुवंशिक सामग्री को, अर्थात् डी एन ए को, एंज़ाइमों की सहाता से छोटे-छेटे टुकड़ों में बाँट देती हैं। इन टुकड़ों को किसी चित्रपहेली के अनेक टुकड़ो की तरह अनेकानेक बार पहले कॉपी किया जाता है, यानी उनकी प्रतिलिपि बनायी जाती है और तब प्रकाशदायी अणुओं की सहायता से उन्हें क्रमबद्ध किया जाता है। रसायनशास्त्र में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त, डोर्टमुंड के फ़ोल्कर डेकर्ट इसे बहुत जटिल मानते हैं और चाहते हैं कि आनुवंशिक कोड को पढ़ना भी उतना ही सरल-सहज होना चाहिये, जितना किसी सुपर मार्केट के कैश-काउंटर पर स्कैनर की सहायता से किसी वस्तु का मूल्य बताने वाला बार-कोड पढ़ना.

फ़ोल्कर डेकर्ट डोर्टमुंड के इंस्टीट्यूट फ़ोर एनैलिटिकल साइंसेज़--आइ एस ए एस—की अपनी प्रयोगशाला में इस समय एक ऐसी विधि का परीक्षण कर रहे हैं, जो डी एन ए के रूप में लिखे आनुवंशिक कोड को पढ़ने में क्रांति ला सकती है। प्रयोगशाला में लगभग अंधेरा रहता है और बाहरी आवाज़ें भी नहीं आ सकतीं:

यह एक विशेष प्रयोगशाला है। बाहरी आवाज़ों और कंपनों को न्यूनतम रखने का प्रयास किया गया है, ताकि बाहरी व्यवधानों का यथासंभव कोई प्रभाव न पड़े. हम आखिरकार हर डी एन ए को सही-सही पढ़ना चाहते हैं।

घुमावदार सीढ़ियों जैसा दिखायी पड़ने वाले डी एन ए का हर दोहरा सूत्र मानवीय बाल से भी 10 हज़ार गुना महीन होता है। उस में छिपे कोड को यदि सीधे पढ़ना है, तो एक बहुत ही शक्तिशाली लेंस चाहियेः

समझ लिजिये कि सारा स्कैनर ही ऐसा है। उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है माइक्रोस्कोप. यह एक इनवर्स यानी उलटा माइक्रोस्कोप है--आप नमूने को नीचे से देखते हैं। नमूना स्वयं एक छोटी-सी तश्तरी पर रखा होता है।

डी एन ए बनाम आर एन ए

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माइक्रोस्कोप या सूक्षमदर्शी तो वैसा ही है, जैसा बाज़ार में उपलब्ध एक अच्छा सूक्षमदर्शी होना चाहिये। लेकिन, प्रयोगशाला में उसे जिस मेज़ पर रखा गया है, वह बाहरी कंपनों को दबा देने वाली एक विशेष मेज़ है। नमूने के तौर पर काँच की पारदर्शी पट्टिकओं पर एक तरल घोल की कुछेक बूँदों के साथ आर एन ए सूत्र तैर रहे होते हैं। आर एन ए वास्तव में डी एन ए के ही समदर्शी हैं। मुख्य अंतर यह है कि डी एन ए यदि दोहरी, यानी दो समानांतर पैरों वाली घुमावदार सीढ़ी के समान दिखते हैं, तो आर एन ए इकहरी, यानी एक ही पैर वाली ऐंठनदार सीढ़ी के समान होते हैं। आर एन ए अणुओं के आनुवंशिक कोड को जानने के लिए एक दूसरे सूक्ष्मदर्शी की अत्यंत महीन सूई उन्हें सावधानीपूर्वक स्पर्श करती हुई उनके ऊपर से घूमती हैः

नमूना सामान्य सूक्ष्मदर्शी और तथाकथित रैंडम पावर माइक्रोस्केप के ठीक बीच में रखा जाता है। यदि हम चाहें, तो रैंडम पावर माइक्रोस्कोप नमूने के एक-एक परमाणु को स्कैन कर सकता है। लेकिन हमें इस सीमा तक जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. महीन सुई-जैसी इस स्पर्शिका के द्वारा, जिसे हमने स्वयं बनाया है, प्रकाश की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। प्रकाश को बढ़ाया ही नहीं, किसी ख़ास बिंदु पर संकेंद्रित भी किया जा सकता है। इसीलिए हम यहाँ किसी सामान्य सूक्ष्मदर्शी की तुलना में बहुत-सी बारीक़ियों को कहीं बेहतर देख सकते हैं।

रमण-प्रभव

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दो सूक्ष्मदर्शियों के मेल वाली इस अत्यंत शक्तिशाली वीक्षण और विश्लेषण विधि को भारतीय वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेकट रमण द्वारा खोजे गये रमण-प्रभाव के आधार पर रमण-स्पेक्ट्रोस्कोपी कहा जाता है। चंद्रशेखर वेंकट रमण को अपनी खोज के लिए 1930 में भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला था। विज्ञान का कोई नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे प्रथम भारतीय थे।

रमण स्पेक्ट्ररोस्कोपी पर आधारित इस स्कैनिंग तकनीक में होता यह है कि सामान्य सूक्ष्मदर्शी के लेंस के रास्ते से परीक्षण-नमूने पर लेज़र प्रकाश डाला जाता है। इस प्रकाश से आनुवंशिक कोड वाले अणुओं में कंपन्न होने लगता है। ठीक किस जगह यह हरकत हो रही है, इसे तय करती है रैंडम पावर माइक्रोस्कोप की सुई. चाँदी की बनी उसकी नोक आतशी शीशा कहलाने वाले लेंस की तरह काम करती है। उसकी सहायता से आनुवंशिक कोड वाली सामग्री के छोटे-छोटे हिस्सों को बड़े ही लक्ष्यबद्ध ढंग से झकझोरा जा सकता है। उनके द्वारा परावर्ति लेज़र किरणों से तुरंत पता चल जाता है कि आनुवंशिक कोड वाले कौन से अणु ठीक इस समय कांप रहे हैं:

उंगली के निशान की तरह हर अणु की अपनी एक ठेठ पहचान है। इसी का हम फ़ायदा उठाते हैं। डी एन ए सूत्र पर के हर क्षार का अपना एक अलग स्पंदन है। इन स्पंदनों की सहायता से हम पहचान सकते हैं कि कौन-सा अणु एडेनीन का है या कौन-सा साइटोसिन का या कौन-सा किस का है। परावर्तित प्रकाश बता देता है कि कौन-सा अणु ठीक इस समय थिरक रहा है। यही सारी ट्रिक है।

एक और ट्रिक अपनायी जाती है। आर एन ए सूत्र की हर क्षारीय ईंट को एक-एक कर ठोंकना-बजाना क्योंकि बहुत पेचीदा सिद्ध हो सकता है, इसलिए फ़ोल्कार डेकर्ट कई-कई अणुओं के कंपनों को एक ही साथ मापते हैं। स्कैनिंग के समय उनके कंपन में होने वाले क्रमशः परिवर्तन आर एन ए सूत्र पर उनके स्थान वाले क्रम का अता-पता देते हैं। इस तरह आर एन ए या डी एन ए को टुकड़े-टुकड़े में बाँटने और उनकी हज़ारों प्रतिलिपियाँ बनाने की ज़रूरत नहीं रह जाती, जैसा आजकल है।

अपने प्रथम मापनों के आधार पर हमने जो अनुभव पाये हैं, उनसे पता चलता है कि आनुवंशिक कोड वाले क्षारों के स्पेक्ट्रम, अर्थात् वर्णक्रम बहुत मिलते-जुलते हैं। दूसरे शब्दों में, हम बहुत भरोसे के साथ कह सकते हैं कि हम हर बेस, हर क्षार के बीच अंतर कर सकते हैं।

फ़ोल्कर डेकर्ट का यह भी कहना है कि किसी के आनुवंशिक कोड को पढ़ने के लिए एकसूत्री आर एन ए के बदले दोसूत्री डी एन ए का उपयोग करने में भी सिद्धांततः कोई समस्या नहीं है। उनका अनुमान है कि पाँच से छः वर्षों में उनके जेनेटिकल कोड रीडर का ऐसा पहला मॉडल तैयार हो जायेगा, जिसे बाज़ार में उतारा जा सकता है। तब, डी एन ए विश्लेषण के आधार पर किसी अपराधी को पकड़ने और सज़ा दिलाने, किसी बच्चे के असली पिता की या किसी अज्ञात मृतक की सही-सही पहचान करने में और भी आसानी हो जायेगी, इस सब में लगने वाला समय भी बहुत कम हो जायेगा।