आर्थिक वनस्पतिशास्त्र अथवा आर्थिक पादपविज्ञान (Economic botany) ज्ञान की एक अंतर्विषयक शाखा है जिसके तहत मनुष्य की पेड़-पौधों के साथ अंतर्क्रिया का अध्ययन किया जाता है।[1] यह शाखा वनस्पति विज्ञान और अनुप्रयुक्त वनस्पतिशास्त्र के मध्य के सेतु का कार्य करती है।[2]

इसमें पौधों के आर्थिक उपयोग एवं महत्व, मानव समुदायों द्वारा इन उपयोगों की जानकारी, उपयोग विधि, संरक्षण इत्यादि का अंतरानुशासिक अध्ययन किया जाता है। जो पादप मनुष्य के काम आते हैं, उन्हें आर्थिक वनस्पति कहते हैं। यों तो हजारों पौधे मनुष्य के नाना प्रकार के काम में आते हैं, पर कुछ प्रमुख पौधे इस प्रकार हैं :

अन्न - गेहूँ, धान, चना, जौ, मटर, अरहर, मक्का, ज्वार इत्यादि।

फल - आम, सेब, अमरूद, संतरा, नींबू, कटहल इत्यादि।

पेय - चाय, काफी इत्यादि।

साग सब्जी - आलू, परवल, पालक, गोभी, टमाटर, मूली, नेनुआ, ककड़ी, लौकी इत्यादि।

रेशे बनाने वाले पादप - कपास, सेमल, सन, जूट इत्यादि।

लुगदी वाले पादप - सब प्रकार के पेड़, बाँस, सवई घास, ईख इत्यादि।

दवा वाले पादप - एफीड्रा, एकोनाइटम, धवरबरुआ, सर्पगंधा और अनेक दूसरे पौधे।

इमारती लकड़ी वाले पादप - टीक, साखू, शीशम, आबनूस, अखरोट इत्यादि।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. "What is Economic Botany?". botany.org (अंग्रेज़ी में). Botanical Society of America. मूल से 29 जून 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 जून 2019.
  2. Wickens, G. E. (1990). "What Is Economic Botany?". Economic Botany. 44 (1): 12–28. आइ॰एस॰एस॰एन॰ 0013-0001. मूल से 29 जून 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 जून 2019.