आस्था ज्ञान के आधार के बिना किसी भी परिघटना के सत्य मानने का विश्वास है। इस नाम से निम्न लेख हैं।

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परवीन कुमार सोढ़ी


विश्वास और आस्था दो ऐसे शब्द है, जिनके मायनें शायद एक दूसरे के बिलकुल करीब होते हुये भी जुदा-जुदा हैं। शायद एक जुड़वा की तरह, जिनमें भले ही कितनी भी बाहरी एक रुपता हो लेकिन मन की गहराई से एक नदी के दो किनारे होते हैं, एक साथ चलते हैं, एक दूसरे के नज़दीक रहते हैं, एक दूसरे के बिन अधूरे होते है, सफर टेढ़ा मेढ़ा हो, उतार चढ़ाव भरा हो पर साथ नहीं छोड़ते, एक दूसरे के अनुभवों के गवाह भी बनते हैं, एक है इसीलिए दूसरे का अस्तित्व है लेकिन इतना होते हुये भी कभी आपस में मिलते नहीं।

विश्वास का जन्म तो इन्सान की पैदाइश के साथ ही हो जाता है। पैदा होते ही उस नन्हें से बच्चे को पूरा विश्वास होता है कि कोई उसकी रोती हुयी आवाज़ को सुन कर उसे दूध पिलायेगा। अपने स्पर्श से उसे अहसास दिलायेगा कि इस दुनियां में वो महफूज़ है। इन्सान अपना पूरा जीवन विश्वास में ही तो जीता है। अपने हर कदम पर वो विश्वास करता है; कभी अपने जन्म दाता में, कभी इस प्रकृति में, कभी ब्रहम्माड में, अपने हर छोटे और बड़े कर्म में। वो विश्वास करता है कि जो भोजन वो खा रहा है, वो ही उसे जीवित रखेगा। वो विश्वास करता है कि जो पानी वो पी रहा है, वो उसकी प्यास बुझायेगा। वो विश्वास करता है कि जिस धरती पर वो चल रहा है, वो उसका बोझ सम्हालेगी। वो विश्वास करता है कि जिस वायु को अपने शरीर में श्वास के माध्यम से खींच रहा है, वो उसे ऊर्जा देगी। दरअसल विश्वास का नाता हमारे रोम-रोम से है। इसके उलट आस्था हमारी पैदाइश के बाद जन्म लेती है। आस्था उत्पन्न नहीं होती बल्कि इसका विकास होता है, हमारे अपने अनुभवों के आधार पर। आस्था हमें विरासत में भी मिलती है। क्योंकि हम अक्सर उसी में आस्था रखते हैं, जिसके बारे में हमारे पुरखे हमें बताते हैं। जन्म से पहले हमारी आस्था का निर्धारण नहीं किया जा सकता। जन्म के बाद आस्था का कुछ हिस्सा हम पर थोपा जाता है, कुछ हम खुद तैयार करते है, जो हमे ठीक लगता है, हमारी अपनी प्रकृति के अनुसार, उसको हम अपना लेते हैं। कह सकते हैं कि विश्वास जीव की मूल प्रकृति है जबकि आस्था उसके संस्कारों का नतीजा होता है।