चार्ल्स प्रथम (19 नवम्बर 1625 – 30 जनवरी 1649) ब्रिटेन के शासक था I उसने २७ मार्च १६२५ से अपनी मृत्यु तक शासक तत्कालीन इंग्लैंड , आयरलैंड और स्कॉटलैंड पर शासन किया I उसके शासन के दौरान इंग्लैंड में गृह युद्ध हुआ और वह फ्रांस भाग गया था लेकिन बाद में उसे वापिस लाया गया I उस समय के लार्ड प्रोटेक्टर ओलिवर क्रोम्वेल्ल ने उसको सज़ा के रूप में मौत के घाट उतार दिया था।

संसद और देश के खिलाफ जंग छेड़ने और देशद्रोह के आरोप पर पेशी की दौरान राजा चार्ल्स प्रथम का चित्र, चित्र में राजा की दाढ़ी मूछ और उनके बाल लंबे हैं, क्योंकि उनकी गिरफ़्तारी के बाद, संसद ने उनके शाही नाइ को हटवा दिया था। पेशी में चार्ल्स को सर कलम कर, मृत्युदंड दिया गया था। एडवर्ड बोवर, १६४९[1]


चार्ल्स प्रथम - पार्लियामेण्ट एवं सम्राट् के मध्य संघर्ष-

1625 ई. में जेम्स प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र चार्ल्स प्रथम इंग्लैण्ड की राजगद्दी पर

बैठा। वह भी अपने पिता के समान राजा के दैवी अधिकारों में विश्वास रखता था। परन्तु उसमें अपने पिता के समान व्यावहारिक बुद्धि का अभाव था। उसका विवाह फ्रांस की राजकुमारी हेनरीटा मारिया के साथ हुआ था।


चार्ल्स प्रथम और संसद के मध्य संघर्ष के कारणसंपादित करें

जिस समय चार्ल्स प्रथम इंग्लैण्ड की राजगद्दी पर बैठा, उस समय इंग्लैण्ड की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। यूरोप में तीस वर्षीय युद्ध चल रहा था। इंग्लैण्ड का राजकोष रिक्त था तथा संसद अपने अधिकारों के प्रति जागरूक थी। चार्ल्स प्रथम की पत्नी मारिया का प्रशासनिक कार्यों में दखल बढ़ने लगा था। मारिया कैथोलिक थी, अत: इंग्लैण्ड के लोग उसे सन्देह की दृष्टि से देखते थे। मारिया ने कैथोलिक धर्म के अनुयायियों को अधिक सुविधाएँ देने का प्रयास किया, किन्तु जनता और संसद ने इसका विरोध किया। धीरे-धीरे चार्ल्स प्रथम और संसद के सम्बन्ध खराब होते चले गए।

संक्षेप में चार्ल्स प्रथम और संसद के मध्य संघर्ष के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) राजा के दैवी अधिकारों में विश्वास-अपने पिता जेम्स प्रथम के समान चार्ल्स प्रथम भी राजा के दैवी अधिकारों में विश्वास रखता था। वह राजसत्ता पर संसद का नियन्त्रण स्वीकार करने को तैयर नहीं था। दूसरी ओर संसद भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक थी। अत: चार्ल्स प्रथम और संसद के मध्य संघर्ष होना स्वाभाविक था।

(2) चार्ल्स प्रथम की धार्मिक नीति -इंग्लैण्ड में प्यूरिटन, ऐंग्लिकन तथा रोमन कैथोलिक धर्मों के अनुयायी रहते थे। चार्ल्स प्रथम ऐंग्लिकन चर्च क अनुयायी था, जबकि संसद में प्यूरिटन लोगों का बहुमत था और वे प्रोटेस्टैण्ट धम में सुधार चाहते थे। परन्तु चार्ल्स प्रथम प्यूरिटन लोगों से सबसे अधिक घृण करता था। इसके अतिरिक्त जब उसने फ्रांस की राजकुमारी हेनरीटा मारिया से विवाह किया, तो उसने कैथोलिकों को अधिक सुविधाएँ देने का वचन दिया। इस प्रकार चार्ल्स प्रथम की धार्मिक नीति भी संसद व उसके मध्य संघर्ष का कारण बनी।

(3) चार्ल्स प्रथम की आर्थिक नीति- आर्थिक मसले पर भी चार्ल्स प्रथम और संसद के मध्य मतभेद था। स्पेन के साथ चल रहे युद्ध के लिए राजा को अधिक धन की आवश्यकता थी, जबकि संसद ने पर्याप्त धनराशि स्वीकृत नहीं। की। अत: चार्ल्स प्रथम ने संसद की स्वीकृति के बिना टनेज एवं पौण्डेज क। लगाया, धनी व्यक्तियों से उपहार प्राप्त किए तथा सामन्तों को 'नाइट' की उपाधिन प्रदान कर उसके बदले में धन प्राप्त किया। राजा के इन कार्यों का संसद ने डटक । विरोध किया।

(4) चार्ल्स प्रथम की प्रशासनिक नीति—संसद ने राजा से एक अधिकार पत्र (Petition of Right) पर हस्ताक्षर करवाए थे, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को बिना कारण बताए बन्दी नहीं बनाया जा सकता था और सैनिक गृहस्थों के घर में नहीं ठहर सकते थे। इसके अतिरिक्त शान्तिकाल में सैनिक कानून लागू नहीं किया जा सकता था। आगे चलकर चार्ल्स प्रथम ने अधिकार-पत्र की धाराओं का उल्लंघन करना प्रारम्भ कर दिया। इससे दोनों पक्षों के मध्य मतभेद बढ़ने लगा।

(5) चार्ल्स प्रथम की निरंकुशता -1629 ई. में तीसरी संसद भंग करने के चात् चार्ल्स प्रथम 11 वर्षों तक निरंकुश शासन करता रहा। किन्तु जब जनता में असन्तोष अधिक बढ़ने लगा, तो चार्ल्स प्रथम को विवश होकर 3 नवम्बर, 1640 को संसद का अधिवेशन बुलाना पड़ा। इतिहास में यह संसद 'दीर्घ संसद' के नाम से विख्यात है, क्योंकि यह निरन्तर 20 वर्षों तक कार्य करती रही। संसद ने एक नियम पारित किया, जिसके अनुसार राजा के परामर्शदाताओं के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाएगा। संसद के इस निर्णय से चार्ल्स प्रथम तथा संसद के मध्य संघर्ष प्रारम्भ हो गया।

(6)आयरलैण्ड का विद्रोह – आयरलैण्ड के विद्रोह के समय संसद ने कुछ अधिकारियों की नियुक्ति की। चार्ल्स प्रथम को संसद का यह कार्य रास नहीं आया इसके अतिरिक्त संसद ने चार्ल्स प्रथम की रानी पर मुकदमा चलाना चाहा। यह भी संसद व चार्ल्स प्रथम के मध्य संघर्ष का एक प्रमुख कारण बना।

प्रथम संसद - चार्ल्स प्रथम ने जून, 1625 में अपनी प्रथम संसद बुलाई। किन्तु इससे पूर्व ही वह स्पेन के साथ युद्ध (जो जेम्स प्रथम के समय से चल रहा था ) को जारी रखने का आदेश दे चुका था। इसके अतिरिक्त उसने तीस वर्षीय युद्ध मे डेनमार्क के राजा को आर्थिक सहायता देने का वचन दिया। इसके लिए धन जमा करने हेतु चार्ल्स प्रथम ने संसद की बैठक बुलाई, परन्तु संसद ने पर्याप्त धन कि  स्वीकृति नहीं दी। साथ ही उसने टनेज एवं पौण्डेज कर वसूलने का अधिकार भी राजा को केवल एक वर्ष के लिए ही प्रदान किया। फलत: दो माह अंदर 12 अगस्त, 1625 को संसद को भंग कर दिया गया।

दूसरी संसद - 6 माह बाद (6 फरवरी, 1626 को) उसने संसद की दूसरी बठक बुलाई। इस समय कैडिज की पराजय के कारण इंग्लैण्ड की प्रतिष्ठा धूल में मिल चुकी थी। संसद के अनुसार इस पराजय का कारण चार्ल्स प्रथम का प्रिय मंत्री बकिंघम था। संसद ने इस मन्त्री पर महाभियोग चलाने का निर्णय लिया। चार्ल्स प्रथम ने बकिंघम के कार्यों का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेकर यह सिद्ध करना चाहा कि शासन के कार्यों के लिए राजा उत्तरदायी है, मन्त्री नहीं। उधर सांसद अपनी जिद पर अड़ी रही। और इसका परिणाम ये हुआ कि चार्ल्स प्रथम ने बकिंघम को बचाने के लिए 15 जून, 1626 को दूसरी संसद को भंग कर दिया।

तीसरी संसद - चार्ल्स प्रथम ने 1626 ई. में अपनी द्वितीय संसद भंग करने के पश्चात आगामी दो वर्षों तक बिना संसद के ही शासन किया। इस दौरान संसद की स्वीकृति के बिना टनेज और पौण्डेज कर वसूला। लोगों को तरह -तरह के कर्ज देने को बाध्य किया, जिन्होंने इन्कार किया उन्हें जेल में डाल दिया गया। चार्ल्स प्रथम ने Ship money नामक कर लगाया, जो तट पर रहने वाले लोगों के साथ-साथ अन्य स्थानों पर रहने वाले लोगों से भी वसूल किया गया। इसके अतिरिक्त चार्ल्स प्रथम ने काउण्टीज में बलपूर्वक सेना बनाई तथा सैनिकों को साधारण जनता के घर में रखा, जिससे जनता की कठिनाइयाँ और बढ़ गईं। सैनिकों की सुविधा के लिए उसने सैनिक कानून भी लागू किया।

उपर्युक्त समस्त साधनों का प्रयोग करने के पश्चात् भी चार्ल्स की आर्थिक समस्या का समाधान नहीं हुआ। अत: उसने विवश होकर मार्च, 1628 में पुनः संसद को आमन्त्रित किया। चार्ल्स प्रथम ने संसद के समक्ष अपने प्रथम भाषण में कठोरता का परिचय दिया। चार्ल्स प्रथम ने कहा, "यदि संसद ने उसकी आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं किया, तो वह उन समस्त तरीकों का प्रयोग करेगा जो ईश्वर ने उसे प्रदान किए हैं। यह धमकी नहीं है, क्योंकि मैं बराबर वालों के अतिरिक्त किसी को धमकी देना अपना अपमान समझता हूँ।" संसद ने चार्ल्स के इस कठोर व्यवहार को पसन्द नहीं किया। इसके अतिरिक्त इस संसद ने चार्ल्स प्रथम के दरबार में उच्च पदों पर अनेक आर्मीनियन कैथोलिकों को देखा। जनता भी इनकी विरोधी थी, अत: संसद ने पिम (Pym) के नेतृत्व में राजा का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने राजा के समक्ष एक अधिकार-पत्र (Petition of Right) प्रस्तुत किया और निर्णय लिया कि जब तक राजा इस अधिकार-पत्र को स्वीकार न कर ले, वे राजा को धन स्वीकृत नहीं करेंगे। इस अधिकार-पत्र में निम्नलिखित माँगें थीं

(1) राजा किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए बन्दी न बनाए।

(2) शान्तिकाल में सैनिक कानून नहीं लागू किया जाए।

(3) वे समस्त कर अथवा ऋण जो संसद की अनुमति के बिना लिए गए हैं, अवैध हैं।

(4) राजा सेना के सिपाहियों को रखने की व्यवस्था जनता के घरों में नहीं, अपितु कहीं अन्यत्र करे।

प्रारम्भ में चार्ल्स प्रथम ने इस अधिकार-पत्र को स्वीकार नहीं किया। किन्तु जब उसने यह अनुभव किया कि संसद उसे तब तक धन नहीं देगी जब तक वह इसे स्वीकार नहीं करेगा, तो विवश होकर उसने इस अधिकार-पत्र को स्वीकार कर लिया। यद्यपि चार्ल्स प्रथम ने भविष्य में इस अधिकार-पत्र की धाराओं का उल्लंघन किया, तथापि ब्रिटेन के संसदीय इतिहास में इसका अत्यधिक महत्त्व है। मैग्नाकार्टा के पश्चात् यह एक ऐसा प्रपत्र था जिसने राजा और संसद के अधिकारों के मध्य स्पष्ट विभाजन रेखा खींच दी।

M.J. P.R.U., B.A. I, History II. 45

अधिकार-पत्र स्वीकार करने के पश्चात् भी संसद चार्ल्स प्रथम से सन्तुष्ट नहीं दी। अब संसद ने चार्ल्स प्रथम के मन्त्री बकिंघम की आलोचना करनी प्रारंभ कर दी। इसके अतिरिक्त चार्ल्स प्रथम के दरबार में कैथोलिक आर्मीनियनों को लेकर भी संसद ने चार्ल्स प्रथम का विरोध किया। इसी बीच जॉन फाल्टन नामक व्यक्ति ने बकिंघम की हत्या कर दी। इस घटना से चार्ल्स प्रथम को अत्यधिक दुःख पहुंचा। उसका विचार था बकिंघम के कारण ही संसद उसका विरोध करती है, अत: उसकी मृत्यु के पश्चात् स्थिति में सुधार होगा। किन्तु ऐसा नही हुआ , क्योंकि अब संसद ने वेण्टवर्थ का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। वेण्टवर्थ संसद का सदस्य था, किन्तु अधिकार-पत्र की स्वीकृति के पश्चात् वह चार्ल्स प्रथम से मिल गया था। राजा का समर्थक बन जाने के कारण संसद उसका का विरोध करती थी। इसके बाद संसद ने राजा पर आरोप लगाया कि वह अधिकार-पत्र का पालन नहीं कर रहा है। संसद की निरन्तर विरोध की नीति से क्षुब्द होकर चार्ल्स प्रथम ने मार्च, 1629 में तीसरी संसद को भंग कर दिया।

किन्तु भंग होने से पूर्व संसद ने अध्यक्ष जॉन इलियट के निम्न तीन प्रस्तावों को स्वीकार किया

(1 )  संसद की स्वीकृति के बिना धर्म में परिवर्तन,

2 संसद की सहमति के बिना टनेज व पौण्टेज कर वसूल करना, तथा

(3) संसद द्वारा अस्वीकृत करों को देना, सभी देशद्रोहिता के कार्य माने जाएंगे |

इस प्रकार संसद ने अपने अधिकारों की घोषणा कर दी।

चार्ल्स प्रथम का व्यक्तिगत शासन – 1529 ई. में तृतीय संसद को भंग करने पश्चात चार्ल्स प्रथम ने 11 वर्ष तक बिना संसद के शासन किया। 1629 ई. में उसने फ्रांस से और 1630 ई. में स्पेन के साथ सन्धि कर ली। अत: अब उसे युद्ध के लिए धन को आवश्यकता नहीं थी। फिर भी प्रशासनिक व्ययों के लिए धन की आवश्यकता रहती थी। इसके लिए उसने अनुचित साधनों को अपनाया, 'नाइट' पद प्रथा को पुन: चालू किया, जंगल कानून को फिर लागू किया, टनेज और अण्डेव की वसूली की, जहाज कर लगाया और एकाधिकार की बिक्री की। उसने आपने विरोधियों को न्यायालय के द्वारा दण्ड दिलवाया। सम्भवतः उसका शासन ठीक प्रकार चलता रहता, किन्तु लॉड की धार्मिक नीति ने संकट उत्पन्न कर दिये,

चार्ल्स प्रथम प्यूरिटनों के विरुद्ध था और कैथोलिकों की ओर झुकाव रखता था ,लॉड की नीति भी इसी प्रकार की थी। उसने जो भी कार्य किए, वे सब प्यूरिटनों के विरुद्ध थे। इससे प्यूरिटनों तथा प्रोटेस्टैण्ट धर्म के अनुयायियों में भय उत्पन्न हो गया। उसकी धार्मिक नीति की स्कॉटलैण्ड में गम्भीर प्रतिक्रिया हुई। चार्ल्स प्रथम ने स्कॉटलैण्ड के विद्रोह का दमन करने के लिए सेना भेजी, किन्तु उसे पराजय का सामना करना पड़ा। इसे 'प्रथम बिशप युद्ध' कहा जाता है। बारबिक की सन्धि के द्वारा युद्ध बन्द हो गया और चार्ल्स प्रथम ने युद्ध व्यय देना स्वीकार किया।

लघु संसद-युद्धकालीन आर्थिक साधनों की पूर्ति हेतु चार्ल्स प्रथम ने 1640 ई. में संसद का अधिवेशन बुलाया, जो 'लघु संसद' के नाम से विख्यात है। चार्ल्स प्रथम चाहता था कि संसद पहले धन की स्वीकृति दे दे, बाद में अपनी शिकायतें प्रस्तुत करे। परन्तु संसद पहले अपनी शिकायतें प्रस्तुत करना चाहती थी। उसने जहाज कर तथा बलात् ऋणों की वसूली को समाप्त करने तथा स्कॉट लोगों से समझौता करने की माँग की। इस पर चार्ल्स प्रथम ने संसद को भंग कर दिया। उधर स्कॉट लोगों ने पुनः युद्ध आरम्भ कर दिया। इसे 'द्वितीय बिशप युद्ध' कहा जाता है। इस युद्ध में भी चार्ल्स प्रथम की पराजय हुई और सन्धि के अनुसार उसने सैनिक व्यय देना स्वीकार किया।

दीर्घ संसद - स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए तथा आर्थिक संकट के कारण चार्ल्स प्रथम ने नवम्बर, 1640 में पुनः संसद की बैठक बुलाई। यह संसद लगभग 20 वर्षों तक कार्य करती रहो, अत: इसे 'दीर्घ संसद' (Long Parliament) के नाम से जाना जाता है। इंग्लैण्ड के संवैधानिक इतिहास में दीर्घ संसद का विशेष महत्त्व है। दीर्घ संसद ने सर्वप्रथम स्कॉटलैण्ड की सेना को आवश्यक धन देकर सन्तुष्ट किया। इसके पश्चात् संसद ने अपनी स्थिति को दृढ़ करने के प्रयत्न किए तथा अनेक नियम पारित किए, जिनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण त्रिवर्षीय नियम (Triennial Act) था। इस नियम के द्वारा राजा को बाध्य किया गया कि वह प्रत्येक तीन वर्ष बाद संसद की बैठक अवश्य बुलाएगा तथा संसद को राजा स्वेच्छा से भंग नहीं कर सकेगा अर्थात् संसद भंग करने के लिए संसद से परामर्श करना आवश्यक है। संसद ने राजा द्वारा टनेज और पौण्डेज कर लगाया जाना भी अनुचित घोषित किया तथा बलपूर्वक ऋण अथवा उपहार लेने पर भी प्रतिबन्ध लगाया। इसके अतिरिक्त इस संसद ने कोर्ट ऑफ स्टार चैम्बर, काउन्सिल ऑफ नॉर्थ एण्ड वेल्स, काउन्सिल ऑफ हाई कमीशन आदि विशेष न्यायालय, जो राजा के अत्याचार के साधन बन गए थे, को समाप्त कर दिया। जहाज कर को अवैध घोषित किया गया तथा हैम्पडन एवं डार्नेल के मुकदमों में न्यायाधीशों के निर्णय रद्द कर दिए गए। वेण्टवर्थ पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा 1641 ई. में उसे फाँसी दे दी गई। लॉड को बन्दीगृह में डाल दिया गया तथा 1645 ई. में उसे मृत्युदण्ड दिया गया।

इस प्रकार सम्राट् की स्वेच्छाचारिता समाप्त हो गई और वह पूर्ण रूप से संन्द के नियन्त्रण में आ गया। अब देश में संसद सर्वोच्च प्रशासक संस्था बन गई इसने राजा के अधिकारों की सीमा निश्चित की और संसद के अधिकारों की व्याख्या की। यद्यपि राजा के हाथों में अभी भी पर्याप्त शक्ति थी, किन्तु अब वह मनमानी नहीं कर सकता था, क्योंकि उस पर संसद का नियन्त्रण था ,

1642 ई. में इंग्लैण्ड में गृह युद्ध प्रारम्भ हो गया। गृह युद्ध एक धार्मिक एवं राजनीतिक संघर्ष था। धर्म की आड़ में राजनीतिक और वैधानिक स्वतन्त्रता का युद्ध लड़ा जा रहा था। मूल प्रश्न था सम्प्रभु शक्ति का। सम्प्रभुता राजा के हाथों में रहे या राजा व संसद के हाथों में सम्मिलित रूप से रहे। युद्ध में संसद और प्यूरिटन दल एक साथ हो गए और उनका नेतृत्व पिम तथा हैम्पडन कर रहे थेकैथोलिक लोग, लॉर्ड सभा के तीन-चौथाई सदस्य और कॉमन सभा के एकचौथाई सदस्य चार्ल्स प्रथम के समर्थक थे। चार्ल्स प्रथम के समर्थक कैवेलियर्स तथा संसद के समर्थक राउण्डहैड्स (Roundheads) के नाम से पुकारे जाते थे। यह युद्ध दो भागों में हुआ था। प्रथम भाग 1642 से 1646 ई. तक जब स्कॉटलैण्ड ने संसद का पक्ष लिया। इस भाग में राजा पराजित हुआ, लेकिन संसद राजा से समझौता करके सीमित राजतन्त्र स्थापित करना चाहती थी। दूसरा भाग 1646 से 1649 ई. तक था। चार्ल्स प्रथम संसद से वार्ता की आड़ मे

स्कॉटलैण्ड तथा विदेश से सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहा। अत: 1648  में युद्ध पुन: आरम्भ हो गया। संसद की सेना ने स्कॉटलैण्ड की सेना को पराजित किया। गृह युद्ध समाप्त होने के पश्चात् चार्ल्स प्रथम पर मुकदमा चलाया गया और 30 जनवरी, 1649 को उसे फाँसी दे दी गई।[कृपया उद्धरण जोड़ें]


इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Carlton 1995, पृष्ठ 326; Gregg 1981, पृष्ठ 422.

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें