उत्प्लव (बॉय / buoy) उन पिंडों का नाम है जो समुद्रतल से बँधे रहते हैं और समुद्रपृष्ठ पर उतराते रहकर जहाजों को मार्ग की विपत्तियों या सुविधाओं की सूचना देते रहते हैं। उदाहरण के लिए, उत्प्लव संकीर्ण समुद्रों को नौपरिवहन योग्य सीमा सूचित करते हैं, या यह बताते हैं कि मार्ग उपयुक्त है, या यह कि उसके अवरोध कहाँ हैं, जैसे पानी के भीतर डूबी हुई विपत्तियाँ या बिखरे हुए चट्टान, सुरंग या टारपीडो के स्थल, तार भेजने के समुद्री तार, या लंगर छोड़कर चले गए जहाजों के छूटे हुए लंगर। कुछ उत्प्लवों से यह भी काम निकलता है कि लंगर डालने के बदले जहाज को उनसे बाँध दिया जा सकता है। इनको नौबंध उत्प्लव (मूरिंग बॉय) कहते हैं। उद्देश्य के अनुसार उत्प्लवों के आकार और रंग में अंतर होता है। ये काठ के कुंदे से लेकर इस्पात की बड़ी बड़ी संरचनाएँ हो सकती हैं, जिनमें जहाज बाँधे जाते हैं। उत्प्लव को अंग्रेजी में 'बॉय' कहते हैं और लश्करी हिंदी में इसे 'बोया' कहा जाता है। अंग्रेजी शब्द बॉय उस प्राचीन अंग्रेजी शब्द से व्युत्पन्न है जिससे आधुनिक अंग्रेजी शब्द बीकन (beacon, आकाशदीप) की भी उत्पत्ति हुई है। परंतु अब बॉय का अर्थ हो गया है उतराना और उत्प्लव शब्द का भी अर्थ है वह जो उतराता रहे।

मौसम से संबन्धित आंकड़े जुटाने वाला एक उत्प्लव
 
एक प्रकार के उत्प्लव का योजनामूलक चित्र

जब उत्प्लव नौपरिवहनोपयुक्त संकीर्ण समुद्री मार्ग को सूचित करते हैं तब ये दक्षिणबाहु उत्प्लव (स्टारबोर्ड हैंड बॉय) या वामबाहु उत्प्लव (पोर्ट-हैंड-बॉय) या मध्यवाही उत्प्लव (मिड-चैनल-बॉय) नाम से जाने जाते हैं। दक्षिणबाहु उत्प्लव का अभिप्राय है मुख्य प्रवाह की दिशा में चलनेवाले या बंदरगाह, नदी, अथवा मुहाने में समुद्र की ओर से प्रवेश करनेवाले नौपरिवाहक की दाहिनी ओर पड़नेवाला उत्प्लव, तथा वामबाहु उत्प्लव का अर्थ है पूर्वोक्त परिस्थितियों में बाई ओर पड़नेवाला उत्प्लव। जिस उत्प्लव का शीर्ष पानी के ऊपर शंकु (कोन) के आकार का दिखाई पड़ता है उसे शंक्वाकार उत्प्लव कहा जाता है और वह सर्वदा दक्षिणबाहु उत्प्लव होता है। जिस उत्प्लव का शीर्ष पानी के ऊपर चिपटा दिखाई देता है उसे मंजूषाकार (कैन) उत्प्लव कहते हैं और वह सर्वदा वामबाहु उत्प्लव ही होता है। जिन उत्प्लवों का सिर पानी के ऊपर गुंबदाकार दिखाई पड़ता है उन्हें गोलाकार (स्फ़ेरिकल) उत्प्लव कहते हैं और ये मध्यभूमि के छोर को सूचित करते हैं। वे उत्प्लव जो विस्तृत आधार पर खड़े रहते हैं और बहुत ऊँचे होते हैं स्तंभ उत्प्लव (पिलर बॉय) कहलाते हैं। अन्य विशेष उत्प्लवों, जैसे घंटोत्प्लव, प्रकाशोत्प्लव, स्वयं-ध्वनिकर-उत्प्लव, सीटी उत्प्लव आदि, की भाँति ये स्थिति विशेष के परिचायक होते हैं। ये समुद्रतट पर या बंदर पहुँचाने के पहलेवाले मार्ग में रहते हैं। इसके अतिरिक्त जिन उत्प्लवों में केवल एक मस्तूल पानी के ऊपर दिखाई पड़ता है वे दंडोत्प्लव (स्पार-बॉय) कहे जाते हैं। कुछ उत्प्लवों के शीर्ष पर विशेष चिह्न भी बने रहते हैं जिनसे समुद्री मार्ग के अन्य ब्योरों या विशेषताओं का पता चलता है। इसी तरह इनपर अंकविशेष या नामविशेष भी अंकित हो सकता है। सुगम मार्ग की सूचना देनेवाले उत्प्लवों पर साधारणत: आड़ी या बेड़ी धारियाँ भी अंकित रहती हैं। हरे रंग में रँगे उत्प्लव से पता चलता है कि यहाँ कोई जहाज नष्ट हो गया है। छोटे जहाजों के पास में प्राय: संरक्षक उत्प्लव (वाच बॉय) लंगर डाले पड़े रहते हैं। इसी प्रकार 'मत्स्योत्प्लव' (डैन बॉय) सूचित करता है कि यह मछली मारने का क्षेत्र है, जहाँ जालों का खतरा है। समुद्र में शत्रु द्वारा डाले गए विस्फोटक सुरंगों के क्षेत्र की सीमा भी वह बता सकता है।

उत्प्लव साधारणतया इस्पात से बनाए जाते हैं। सर्वप्रथम लगभग १८७८ ई. में उत्प्लवों में तैलोत्पादित गैस के प्रकाश की व्यवस्था की गई। स्वयंचालित रुक रुककर प्रकाश देनेवाले यंत्र का उपयोग १८८३ ई. में किया गया। भयावह क्षेत्र, समुद्री तार तथा अन्य विपत्तियों को सूचित करने के लिए भी उत्प्लवों का उपयोग किया जाता है। संक्रामक रोगग्रस्त यात्रियोंवाले पृथक्कृत जहाजों के रुकने का स्थान निरोधायन उत्प्लवों (क्वारेंटाइन बॉयों) से मिलता है। यहीं आदेश पत्र की प्रतीक्षा में खड़े जहाज टिकते हैं। कभी कभी अधिकारी लोग गोलंदाजी तथा बमबाजी के अभ्यास के लिए कुछ क्षेत्र नियत कर लेते हैं, उसके लिए वे विशेष चिह्न के उत्प्लवों (स्पेशल मार्क बॉयों) द्वारा क्षेत्र को अंकित करते हैं।

वर्तमान शताब्दी में तरलीकृत एसेटिलीन गैस के प्रयोग से उत्प्लवों में प्रकाश लगाने में विशेष उन्नति हुई हैं। जहाँ धारा अत्यधिक तीव्र रहती है, जैसे हुगली नदी में, वहाँ की सूचना देने के लिए ऐसे उत्प्लव का कभी कभी उपयोग किया जाता है, जिसमें प्रकाश और घंट दोनों रहते हैं। छोटे-छोटे प्रकाशपूर्ण उत्प्लवों का उपयोग समुद्र में तार बिछानेवाले जहाज तार की अस्थायी स्थिति दिखाने के लिए करते हैं।

नौबंध उत्प्लव बहुत से बंदरों में रहते हैं जिनका उद्देश्य यह रहता है कि जहाज नियत स्थानों पर ही रुकें, अन्यत्र नहीं और उन्हें लंगर न डालना पड़े। ऐसे उत्प्लवों का उपयोग उस समय भी होता है जब जहाज माल उतारने के लिए घाट पर नहीं बाँधे जाते तथा उस समय भी जब आवश्यकता पड़ने पर उन्हें लंगर उठाना पड़ता है। नौबंध उत्प्लवों का रूप पथप्रदर्शक उत्प्लवों से प्राय: भिन्न होता है तथा उनका रंग भी भिन्न होता है। बड़े बड़े जहाजों के लिए बने नौबंध उत्प्लवों में बहुधा पाँच तक भूमि-साँकल होते हैं, जिनमें दोनों सिरों पर लगे पेंच मुख्य साँकल को दृढंता से भूमि में बाँध देते हैं।

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