उषिक सिद्धान्त (caloric theory) एक ऊष्मा से सम्बन्धित एक वैज्ञानिक सिद्धान्त था जो अब समयातीत (obsolete) और अमान्य हो गया है। इस सिद्धान्त के स्थान पर १९वीं शताब्दी के मध्य में 'ऊष्मा का यांत्रिक सिद्धान्त' प्रतिपादित किया गया।

उषिक सिद्धान्त के अनुसार उष्मा का कारण एक अति लचीले स्वप्रतिकर्षक तथा सर्वव्यापी द्रव की क्रिया था। इस द्रव के गुण ये माने गए। यह अति लचीला था तथा इसके कण परस्पर प्रतिकर्षण करते थे। इस द्रव को 'कैलरिक' (caloric) नाम दिया गया। प्रतिकर्षण गुण के कारण जलने पर यह द्रव उष्मा तथा प्रकाश उत्पन्न करता हुआ माना गया। 'कैलरिक' के कण परस्पर तो प्रतिकर्षक थे परन्तु साधारण पदार्थ के कणों से आकर्षित होते माने गए। विभिन्न पदार्थो के कण उसे विभिन्न बल से आकर्षित करते थे। यह द्रव अनाश्य तथाश् अजन्मा माना गया।

उषिक सिद्धांत के अनुसार पदार्थ 'कैलरिक' की वृद्धि से उष्ण होता था तथा उसके ह्रास से शीतल। पदार्थ पर उष्मा के भिन्न भिन्न प्रभावों को कैलरिक सिद्धांत के अनुसार स्पष्टीकरण के प्रयत्न होते रहे। कुछ का तो स्पष्टीकरण सरलता से हो गया परन्तु कुछ के लिए अन्य अनेक कल्पानएँ करनी पड़ीं।

घर्षण द्वारा उष्माजनन की घटना मानव को आदिकाल से ज्ञात है। कैलरिक सिद्धांत के अनुसार इसके स्पष्टीकरण के प्रयत्न किए गए, परन्तु वे संतोषप्रद न हो सके।