'ऋंगवेरपुर'प्रयागराज रामायणकाल में गंगा के तट पर स्थित एक स्थान का नाम यह है। ऋंगवेरपुर के राजा महाराजा निषादराज थे, उनका नाम महाराजा गुह्यराज निषाद था। वे तीरथराज निषाद के पु्त्र एवं प्रयागराज के पौत्र थे और निषाद राज एक महान महाराजा थे श्रृंगवेरपुर, श्रृंगी ऋषि की तपस्थली रही है। इनकी पत्नी का नाम शांतादेवी था। शांता देवी राजा रो पामपाद की पुत्री थी। यह स्वयं एक साध्वी थी। यहां साध्वी शांता देवी का भव्य मंदिर बना हुआ है। कहते हैं कि शांता देवी महाराज दशरथ की पुत्री थी उन्होंने अपने भाई समान मित्र को गोद दे दिया था। जब महाराज दशरथ को कोई संतान नहीं हो रही थी तब महाराज दशरथ ने श्रृंगी ऋषि को बुलाया था जिनके पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने के उपरांत महाराज दशरथ के चार पुत्र हुए थे। पिता की आज्ञा से वनवास जाते समय भगवान श्री राम भी एक दिन श्रृंगवेरपुर में निवास किए थे, तथा वन से लौटते वक्त श्रृंगवेरपुर में रुककर श्री सीता जी सहित गंगा जी का पूजन किया था। अतः श्रृंगवेरपुर पौराणिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।