एकजीववाद सिद्धांत के अनुसार वेदांत में एक ही जीव की स्थिति मानी जाती है। अविद्या एक है, अत: अविद्या से आवृत्त जीव भी एक होगा।

इस वाद के कई रूप शंकर के परवर्ती अद्वैत वेदांत में मिलते हैं। कुछ लोगों के अनुसार एक ही जीव एक ही शरीर में रहता है। अन्य शरीर स्वप्नदृष्ट शरीरों की तरह चेतनाशून्य हैं। दूसरे लोग ब्रह्म के प्रतिबिंब रूप में हिरण्यगर्भ की कल्पना करते हैं। अन्य जीव हिरण्यगर्भ के प्रतिबिंब मात्र हैं। भौतिक शरीरों में असत्य जीव की स्थिति होती है। वास्तविक शरीर हिरण्यगर्भ है। अन्य व्याख्या के अनुसार नाना शरीरों में रहनेवाला एक ही जीव है। जीव में वैयक्तिकता का बोध शरीर की भिन्नता के कारण होता है।

इस सिद्धांत पर यह आक्षेप किया जाता है कि यदि जीव एक है तो एक जीव का मोक्ष होने पर सभी जीवों का मोक्ष होना चाहिए। एक के सुख दु:ख का ज्ञान सभी को होना चाहिए। किंतु जैसे जलपात्र के मालिन होने या नष्ट होने से उसमें पड़नेवाला सूर्य का प्रतिबिंब अप्रभावित रहता है उसी प्रकार जीव पर दूसरे शरीरों का प्रभाव नहीं होता।

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