क़ाफ़िया

कुलदीप बिश्नोई

काफ़िया ग़ज़ल के किसी शेर की लाइन के तुकांत को कहते हैैं। मतलब किसी शेर के आखिर में अगर 'आता है' लिखा है तो उसके अगले लाइन में 'जाता है', 'पाता है', 'लाता है' जैसे शब्द ही इस्तेमाल होंगे जो पहली लाइन के आखिरी शब्दों से मेल खाते हो, इसे ही काफ़िया कहा जाता है।

मतलब लाइनों के आखिरी उच्चारण को एक जैसा करने को ही काफ़िया मिलाना कहते हैं। शायरी में इसका बड़ा महत्व है। किसी ग़ज़ल के पहले शेर को मतला कहा जाता है और मतले की पहली दो लाइनों में काफ़िया मिलाना जरूरी होता है।