कूकर कास या कूकर खांसी या काली खांसी wooping cough (अंग्रेज़ी:पर्टसिस, व्हूपिंग कफ़ ,हिमोफिलस पर्टयुसिस ) जीवाणु का संक्रमण होता है जो कि आरंभ में नाक और गला को प्रभावित करता है। यह प्रायः २ वर्ष से कम आयु के बच्चों की श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। इस बीमारी का नामकरण इस आधार पर किया गया है कि इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति सांस लेते समय भौंकने जैसी आवाज करता है। यह बोर्डेटेल्ला परट्यूसिया कहलाने वाले जीवाणु के कारण होता है। यह जीवाणु व्यक्तियों के बीच श्वसन क्रिया से निष्कासित जीवाणु से फैलती है। यह तब होता है जब संक्रमण युक्त व्यक्ति खांसते या छींकते हैं। यह संक्रमण युक्त व्यक्तियों के शारीरिक द्रवों से संपर्क होने से भी फैलता है जैसे नाक का पानी गिरना।

कूकर खांसी
वर्गीकरण एवं बाह्य साधन
ेक बच्चे को कूकर कास में खांसी
आईसीडी-१० A37.
आईसीडी- 033
डिज़ीज़-डीबी 1523
मेडलाइन प्लस 001561
ईमेडिसिन emerg/394  ped/1778
एम.ईएसएच D014917
  • जीवाणु संक्रमण के आरंभ से 7 से 17 दिनों के बाद इसके लक्षण विकसित हो पाते हैं।
  • जिनमें लक्षण विकसित हो जाते हैं, वे अधिकांश में 2 वर्ष की आयु से कम होते हैं।

ये लक्षण लगभग 6 सप्ताह तक रहते हैं और ये 3 चरणों में विभाजित होते हैं -

चरण-1

इन लक्षणों में छींकना, आंखों से पानी आना, नाक बहना, भूख कम होना, ऊर्जा का ह्रास होना और रात के समय खांसना शामिल है।

चरण-2

इन लक्षणों में लगातार खांसते रहना और इसके बाद भौंकने जैसी आवाज आना तब जबकि बीमार व्यक्ति सांस लेने का प्रयास करता है, आदि शामिल है।

चरण -3

इसके अंतर्गत सुधार की प्रक्रिया आती है जबकि खांसना न तो लगातार होता है और न गंभीर। यह स्तर 4 सप्ताह से प्रायः आरंभ होता है।

यह कुकर खांसी कम आयु के रोगियों को होती है जिनकी खांसी 2 सप्ताह तक रहती है।

कुकुर खांसी बच्चों में होने वाली एक संक्रामक तथा खतरनाक बीमारी है। मुख्यत: श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है जो विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों के लिए अत्यन्त चिन्ता का विषय है। भारत जैसे विकासशील देश में प्रत्येक एक लाख की आबादी पर 587 बच्चे प्रत्येक वर्ष इस बीमारी से ग्रसित होते हैं। इससे बच्चों में मृत्युदर 4.15 प्रतिशत है जो कि कुकुर खांसी के रोगियों का 10 प्रतिशत, एक वर्ष के भीतर मरने वाले बच्चों का आधा भाग है।

यह बीमारी बोर्डटेल परट्यूसिस नामक सूक्ष्मजीवी से होती है। संक्रमण की सार्वधिक बीमारियां पांच वर्ष से कम उम्र में होती हैं जोकि नर बच्चों की अपेक्षा मादा बच्चों में अधिक होती है। छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में इस बीमारी से मृत्यु-दर अधिक होती है, हालांकि यह बीमारी साल के किसी भी माह में हो सकती है, किन्तु जाड़ा तथा वर्षा की ऋतु में इसकी संभावना सार्वाधिक होती है। अब प्रश्न उठता है कि यह बीमारी एक बच्चे से दूसरे बच्चे में किस प्रकार संक्रमित होती है ? इस बीमारी से ग्रसित बच्चों की नाक बहती है, छींक आती है और वह खांसता है। नाक बहने के क्रम में जो तरल पदार्थ निकलता है, इसी के द्वारा बीमारी फैलती है। खांसी या छींक के दौरान नाक, मुंह तथा सांस छोड़ने के क्रम में जीवाणु आसपास तथा वातावरण में फैल जाता है, जो दूसरे बच्चों में संक्रमित होने का कारण बनता है। यह बीमारी मुख्यत: बच्चों की प्रारंभिक अवस्था में, जब उनके माता-पिता को उनकी बीमारी का पता नहीं चलता, खेल के मैदान में, एक बिछावन पर सोने और एक ही बर्तन में खाने-पीने के क्रम में फैलती है।

ऐसी बात नहीं है कि रोग के कीटाणुओं के संक्रमण (बीमार बच्चे से स्वथ्य बच्चे में) के तुरंत बाद बीमारी हो जाती है। रोगाणुओं के आक्रमण के पश्चात लक्षण दिखाई पड़ने में एक से दो सप्ताह का समय लग जाता है। सर्वप्रथम जीवाणु श्वसन तंत्र की भीतरी स Bतह के संपर्क में आकर सतह पर चिपक जाता है, जहां उचित माध्यम पाकर वृद्धि करने लगता है। उसके बाद सतह पर घाव बनता है। फलस्वरूप स्थान फूल जाता है। फिर त्वचा पर नेक्रोसिस की क्रिया होती है। नेक्रोसिस (रक्त प्रवाह की कमी की वजह से त्वचा का क्षय) के कारण अन्य बैक्टीरिया आक्रमण कर त्वचा में तेजी से वृद्धि करना शुरू कर देते है।

इतनी प्रक्रिया पूरी होने में एक-दो सप्ताह का समय लग जाता है। उसके बाद रोग अपना लक्षण दिखाना शुरू करता है, जो तीन भागों में प्रकट होता है। शुरू में बच्चे के खांसी होती है तथा नाक से पानी बहता है। फिर धीरे-धीरे खांसी से बच्चे को विशेष परेशानी नहीं होती, किन्तु धीरे-धीरे इसकी गति बढ़ती है क्योंकि श्वसन-तंत्र को प्रभावित करने की प्रक्रिया लगातार बढ़ती जाती है। जैसे-जैसे श्वसन-तंत्र प्रभावित होता है खांसी और खांसने की गति बढ़ती जाती है और एक समय ऐसा आता है कि खांसी की वजह से रोगी रात को सो नहीं पाता है। पहले जो केवल जागृतावस्था में खांसी होती थी अब वह नींद में भी होने लगती है, जिससे बच्चा खांसते-खांसते उठ जाता है।

यह स्थिति दो से चार सप्ताह तक बनी रहती है। उसके बाद अपना उग्र और भयंकर रूप धारण कर लेती है। अब पहले की अपेक्षा और जल्दी-जल्दी खांसी का दौरा पड़ने लगता है। इस दौरान एक ऐसा स्थिति आ जाती है कि बच्चे को सांस लेने तक में कठिनाई होने लगती है। उसके बाद सांस लेने के क्रम में एक विशेष प्रकार की आवाज निकलने लगती है, जैसे-किसी कुत्ते के रोने की आवाज। यह आवाज श्वसन-तंत्र में संक्रमण तथा ग्लाटिस के खुलने की वजह से होती है, किन्तु वह हूप-हूप आवाज हमेशा नहीं होती है। उसके बाद खांसी के साथ गाढ़े रंग का बलगम (कफ) निकलता है। एक बात और कि जब खांसी अपना वीभत्स रूप दिखा रही होती है तो ठीक उसके बाद उल्टी होती है और खाया-पीया सब बाहर निकल जाता है। खांसी के दौरान जीभ का बार-बार मुंह से बाहर आने के क्रम में उस पर दांत पड़ने से घाव हो जाने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है। बार-बार खांसने की वजह से चेहरा लाल हो जाता है। बच्चा चिन्तित रहने लगता है। कई बार तो अत्यधिक उदासीन अपने आप में भौंचक्का, किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में कुछ समझ नहीं पाता कि आखिर मुझे कौन-सी सजा दी जा रही है। मानसिक तनाव की वजह से पूरे शरीर से पसीना छूटने लगता है, भोजन से विरक्ति होने लगती है। वह भोजन करना नहीं चाहता।

सभी शिशुओं के लिए कुकर खांसी का टीका लगवाना आवश्यक है। यह टीकाकरण प्रायः डीटीपी संयुक्त रूप में डिप्थेरिया, टिटनेस और कुकर खांसी (परट्यूरसिस) दिया जाता है। पहले वाला संक्रमण और टीकाकरण जिंदगीभर असंक्रमीकरण की गारंटी नहीं देता है। तथापि 6 वर्ष की आयु के बाद वर्धक टीकाकरण की सिफारिश नहीं की जाती है जब तक कि संक्रमण न हुआ हो।

इलाज क्या है ?

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इस बीमारी के इलाज के लिए एन्टीबायोटिक्स का प्रयोग किया जाता है जो इसके दौरे की भयानकता को कम कर देता है। यदि रोग की पहचान प्रारम्भिक अवस्था में हो जाए तो एन्टीबायोटिक्स का प्रयोग काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इरिथ्रोमाइसिन या एम्पीसिलिन का प्रयोग सात से दस दिनों तक किया जाता है। आजकल क्लोरम्फेनिकोल का व्यवहार अत्यधिक किया जाता है क्योंकि यह दवा अत्यधिक सस्ती है। घबराहट दूर करने के लिए भी इनकी गोलियां दी जा सकती हैं। श्वसन-नलियों की सिकुड़न को कम करने के लिए ब्रोंकोडायलेटर दिया जाता है। कफ सिरप भी कफ को निकालने के लिए दिया जाता है।


बाहरी कड़ियाँ

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