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कुमारी कंदम : समुद्र में डूबे प्राचीन भारत का रहस्य जानिए


जो लोग यह मानते हैं कि सिन्धु घाटी की सभ्यता से भारत के इतिहास की शुरुआत होती है, उनकी सोच अब पुरानी हो चुकी है। ऐसे लोग गुजरात समुद्र के भीतर द्वारिका नगरी के मिलने के साक्ष्य को नकार सकते हैं। अब उन्हें 'कुमारी कंदम' के अस्तित्व को भी नकारने की ताकत जुटाना होगी। आज से 100 या 50 साल पहले इतिहास को जानने के स्रोत कम थे। उस काल में लिखी गई इतिहास की किताबों को पढ़कर ही अब इतिहास को नहीं जाना जा सकता, हालांकि वे किताबें हमारे ज्ञान का आधार जरू


वैज्ञानिक कहते हैं कि गोंडवाना नामक एक द्वीप के टूटने से भारत, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका का निर्माण हुआ। उस काल में भारत कैसा था, यह शोध का विषय हो सकता है। लेकिन हम बात कर रहे हैं आज से 15,000 वर्ष पूर्व के भारत की। 19वीं सदी में अमेरिकी और यूरोपीय विद्वानों के एक वर्ग ने अफ्रीका, भारत और मेडागास्कर के बीच जियोलॉजिकल और अन्य समानताएं समझाने के लिए जलमग्न हो चुके एक महाद्वीप का अनुमान लगाया और उसे लेमुरिया (Lemuria) का नाम दिया। हलांकि इस दौरान एक और महाद्वीप खोजा जिसका नाम मु (mu) दिया गया। उसके बारे में हम बात नहीं करेंगे, क्योंकि यह विषय बहुत विस्तृत है।



जिस तरह वर्तमान में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण पृथ्वी पर कई विनाशकारी बदलाव होने की आशंकाएं जताई जा रही हैं, उसी तरह प्राचीनकाल में एक बार ऐसा हो चुका है जिसके चलते लेमुरिया और मु नाम के 2 महाद्वीप जलमग्न हो चुके थे। हालांकि वैज्ञानिक इस पर अभी शोध ही कर रहे हैं किंतु विश्व के खोजकर्ताओं का दावा है कि इन दोनों महाद्वीपों पर सभ्यता काफी विकसित थी। कुछ खोजकर्ताओं, जिनमें प्रमुख थे फिलीप स्कोल्टर, का यह भी कहना था कि मनुष्य की उत्पत्ति इन्हीं महाद्वीपों पर हुई थी। ये दोनों महाद्वीप किसी भू-वैज्ञानिक हलचल की वजह से समुद्र के भीतर समा गए।


जब से पृथ्वी बनी है, तब से विनाश के कई चरण हुए हैं तथा कई प्रजातियां विलुप्त हुईं तथा नई आई भी हैं। विश्व की सभी जातियों एवं धर्मों में प्राचीन महाप्रलय का उल्लेख मिलता है। केवल धर्म ही नहीं, भू-वैज्ञानिक साक्ष्य भी पृथ्वी पर कई प्राचीन विनाशकारी हलचलों को दर्शाते हैं चाहे वे भूकंप के रूप में हों या ज्वालामुखी के रूप में या ग्लोबल वॉर्मिंग या हिमयुग के रूप में हों। आदिम जनजातियों में भी जल महाप्रलय का उल्लेख कहानियों के रूप में हुआ है। इसी क्रम में इस महाद्वीप का उल्लेख भी प्राचीन तमिल साहित्य में पाया जाता है।


तमिल इतिहासकारों के अनुसार इस द्वीप का नाम 'कुमारी कंदम' था। 'कुमारी कंदम' आज के भारत के दक्षिण में स्थित हिन्द महासागर में एक खो चुकी तमिल सभ्यता की प्राचीनता को दर्शाता है। इसे 'कुमारी नाडू' के नाम से भी जाना जाता है। तमिल शोधकर्ताओं और विद्वानों के एक वर्ग ने तमिल और संस्कृत साहित्य के आधार पर समुद्र में खो चुकी उस भूमि को पांडियन महापुरुषों के साथ जोड़ा है। तमिल पुनर्जागरणवादियों के अनुसार 'कुमारी कंदम' के पांडियन राजा का पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन था। दक्षिण भारत के लोकगीतों में इतिहास के साथ उस खो चुकी इस सभ्यता का वर्णन मिलता है। नतीजतन, जब इसके बारे में जानकारी देने वाले खोजकर्ता भारत के नगरों में पहुंचे, तब इस लोकगीत और कथा को बल मिला।


तमिल लेखकों के अनुसार आधुनिक मानव सभ्यता का विकास अफ्रीका महाद्वीप में न होकर हिन्द महासागर में स्थित 'कुमारी कंदम' नामक द्वीप में हुआ था। हालांकि 'कुमारी कंदम' या लुमेरिया को हिन्द महासागर में विलुप्त हो चुकी काल्पनिक सभ्यता कहा जाता है। कुछ लेखक तो इसे रावण की लंका के नाम से भी जोड़ते हैं, क्योंकि दक्षिण भारत को श्रीलंका से जोड़ने वाला राम सेतु भी इसी महाद्वीप में पड़ता है।


इस महाद्वीप को लेमुरिया नाम भूगोलवेत्ता फिलीप स्क्लाटर (Philip Sclater) ने 19वीं सदी में दिया था। सन् 1903 में वीजी सूर्यकुमार ने इसे सर्वप्रथम 'कुमारी कंदम' नाम दिया था। कहा जाता है कि यह 'कुमारी कंदम' ही रावण के देश 'लंका' का विस्तृत स्वरूप है, जो कि वर्तमान भारत से भी बड़ा था।


फिलीप स्क्लाटर ने मेडागास्कर और भारत में बहुत बड़ी मात्रा में वानरों के जीवाश्मों (Lemur Fossils) के मिलने पर यहां एक नई सभ्यता के होने का अनुमान व्यक्त किया था। उन्होंने इस विषय पर एक किताब भी लिखी जिसका नाम ‘The Mammals of Madagascar’ था, जो कि 1864 में प्रकाशित हई थी।


अगले पन्ने पर जानिए 'कुमारी कंदम' जब जल में डूब गया...

'कुमारी कंदम' का क्षेत्र उत्तर में कन्याकुमारी से लेकर पश्चिम में ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी तट और मेडागास्कर तक फैला था