कुमार विमल (12 अक्टूबर 1931 -- २६ नवम्बर २०११) हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखने वाले समालोचक तथा काव्य में सौन्दर्यशास्त्र के आचार्य थे। वे प्रायः ही पुस्तकों से घिरे और लिखते–पढ़ते ही देखे जाते थे। उनका जीवन साहित्य का पर्यायवाची था। साहित्य जगतमें प्रो. विमल को हिंदी का विश्वकोश माना जाता था। उनके दिलोदिमाग में साहित्य की देशव्यापी गतिविधियां हर समय तरोताजा रहती थीं।

कुमार विमल का जन्म 12 अक्टूबर 1931 को लखीसराय जिले के पचीना गांव में हुआ था। विमल ने उन्नीस सौ चालीस के दशक से लेखन जगत में पदार्पण किया। आलोचना पर उनकी पुस्तक ‘मूल्य और मीमांसा’ तथा कविता संग्रह में ‘अंगार’ तथा ‘सागरमाथा’ उनकी यादगार कृतियों में शुमार हैं। उनकी हिंदी में कई कविताओं का अंग्रेजी, बांग्ला, तेलुगू, मराठी, उर्दू और कश्मीरी सहित कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ था।

अध्यापन के बाद तमाम प्रशासनिक पदों पर रहते हुए भी उन्होंने अपनी अध्यवसायिता नहीं छोड़ी और निरन्तर लेखन से जुड़े रहे। "सौंदर्यशास्त्र के तत्व" और "छायावादी काव्य का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन" उनकी आलोचना की पहली दो पुस्तकें थीं। इनसे उन्होंने हिंदी के बौद्धिक वर्ग में एक सौंदर्यशास्त्री के रूप में प्रतिष्ठा पाई। इसके बाद 'मूल्य और मीमांसा', 'कला विवेचन', 'आलोचना और अनुशीलन', 'चिंतन मनन और विवेचन', 'महादेवी का काव्य सौष्ठव' आदि लगभग चालीस कृतियां छपीं।

मगध विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रह चुके विमल कई प्रमुख संस्थाओं में भी उच्च पदों पर रहे। उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, बिहार इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद के अध्यक्ष और नालन्दा खुला विश्वविद्यालय के कुलपति के पद को भी सुशोभित किया। [1]

विमल को राजेन्द्र शिखर सम्मान सहित उत्तर प्रदेश और बिहार के कई साहित्य सम्मान प्रदान किए गए। ज्ञानपीठ समिति ने भी उन्हें विशेष लेखन का सम्मान दिया था।

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