महादेव कोली वाल्मीकि महाराष्ट्र में पाए जाने वाली कोली जाती की उपजाति है।[1] महादेव कोलियों को 'डोंगर कोली' और 'राज कोली' के नाम से भी जाना जाता है। इन्हें डोंगर कोली इसलिए बोला जाता है क्योंकि ये पुराने समय से ही पहाड़ी इलाकों में रहते हैं और राज कोली इसलिए बोला जाता है क्योंकि जव्हार रियासत के मुकने राजवंश के महाराजा इसी जाती के थे। महादेव कोली रामायण के रचियता आदिकवि वाल्मीकि के वंसज हैं।[2][3]

महादेव कोलियों का मुख्य कार्य खेतीवाड़ी हैं और कुछ पढ़े लिखे महादेव कोली सरकारी और प्राइवेट नोकरियाँ करते हैं। महाराष्ट्र सरकार ने महादेव कोलियों को अनुसूचीत जनजाति की श्रेणी में रखा है जिसके तहत महादेव कोली अनुसूचित जनजाति के कोटे में सरकार नोकरी करते हैं।[4]

महादेव कोली जाति में कई गोत्र पाए जाते हैं जिनमें से कुछ जाने माने गोत्र इस प्रकार हैं:, अघासी, भागिवन्त,चव्हाण, भोंसले, बुद्धिवंत, दाजीई, दलवी, गायकवाड़, गावली, जगताप, कदम, केदार, खरड़, ख़िरसागर, नामदेव, पवार, पोलेवास, सागर, सेष शिवा, सलिखि, सूर्यवंशी, उटेरेचा, चौहान ।

पुराने समय मे महादेव कोली किलेदार थे। मुख्य तौर पर कोली लूट मार करके जिया करते थे।[5] अंग्रेजी सरकार द्वारा महादेव कोली जाती को खूनी जाती घोसित कर दिया गया था। सन 1657 में महादेव कोलियों ने खैमी सरनाईक के नेतृत्व में मुग़ल सुल्तान औरंगज़ेब के खिलाप विद्रोह किया था। खैमी सरनाईक ने सभी कोलियों को वक किया और मुग़ल हुकूमत को हिला रखने का वादा किया। मुग़ल सेना पहाड़ी इलाकों से आई और आक्रमण किया। मुग़ल सुल्तान ने खैमी सरनाईक के पूरे परिवार को मार डाला साथ ही उसके रिस्तेदारो को भी मर डाला। हज़ारों महादेव कोलियो को बंदी बनाकर जुन्नर ले गया और सिर कलम कर दिया और उनके ऊपर कोली चबूतरा बना दिया।

ऐसा ही 1741-42 में हुआ। महादेव कोली कुरंग किले पर राज करते थे लेकिन 1741 में पेशवा बालाजी बाजीराव ने कोलियों से कुरंग किला छीनना चाहा जिसके चलते पेशवा और महादेव कोकियों के बीच जंग छिड़ी और कोलियों का नरसंघार किया गया। इसी के इसी वर्ष पेक्सहवा ने वदावली गांव पर भी हमला कर दिया जो कि महादेव कोलियों के राज में था इसे भी छीन लिया और प्रचंड विद्रोह हुआ। 1750-51 में पेशवा ने महादेव कोलियों के चौदह प्रान्त छीन लिए, साथ ही किले भी जिसके दौरान पेशवा और महादेव कोलियों के बीच संगर्ष हुआ और कोलियों ने वीरगति प्राप्त की। 1760 से लेकर 1799 तक पेशव इसी तरह महादेव कोलियों से किले छिनता रहा जिसके कारण लूट मार, चोरी डकैती, और बाकी सभी आपराधिक गतिविधियां करने लगे।

1761 में भांगरे और पाटीकर गोत्र के कोलियों ने हैदराबद के निज़ाम के खिलाप विन्द्रोह कर दिया था और निज़ाम से ट्रिम्बक किला छीन लिया। 1818 में अंग्रेजों ने मराठों को हर दिया उसके बाद 1830 तक महादेव कोली विद्रोह करते रहे। इसके बाद राघोजी भांगरे नाम के एक क्रांतिकारी महादेव कोली ने विद्रोह कर दिया। जिसको 1848 में अंग्रेजो ने फाँसी पर चढ़ा दिया।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

वाल्मीकि जाति

संदर्भसंपादित करें

  1. "Social Study of Mahadev Koli Tribes in Akole Tahsil, District-Ahmednagar, Maharashtra".
  2. कोली
  3. "Valya Koli Valmiki".
  4. Gazetteer of the Bombay Presidency: Ahmedabad.
  5. The Mahadev Kolis.