क्रीमिया का युद्ध

(क्रीमियन युद्ध से अनुप्रेषित)

क्रीमिया का युद्ध (जुलाई, 1853 - सितंबर, 1855) तक काला सागर के आसपास चला युद्ध था, जिसमें फ्रांस, ब्रिटेन, सारडीनिया, तुर्की ने एक तरफ़ तथा रूस ने दूसरी तरफ़ से लड़ा था। 'क्रीमिया की लड़ाई' को इतिहास के सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण तथा अनिर्णायक युद्धों में से एक माना जाता है। युद्ध का कारण स्लाववादी राष्ट्रीयता की भावना थी। इसके अतिरिक्त दूसरे तरफ़ तुर्की ने रूस की कुस्तंतुनिया की ओर राज्यविस्तार कि नीति के विरुद्ध युद्ध किया, किंतु बेहद खून खराबे के बाद भी नतीजा कुछ भी नहीं निकला।

क्रीमिया युद्ध का रूसी भाषा में बना नक्शा। उत्तर-पूर्व में रूस और दक्षिण में तुर्की हैं।

यह युद्ध कदाचित् अकारण लड़ा गया था फिर भी यूरोपीय इतिहास में इसका विशेष महत्व आँका जाता है। उन दिनों यूरोपीय देशों में लोगों की यह धारणा हो गई थी कि रूस के पास इतने अधिक शस्त्रास्त्र हैं कि वह अजेय है। उससे लोग आतंकित थे। कुस्तंतुनिया की ओर राज्यविस्तार करने की रूस की नीति पीटर महान् के समय से ही चली आ रही थी। अपनी इस राज्यविस्तार की आकांक्षापूर्ति के लिये वह कोई न कोई बहाना ढूँढ़ता रहता था। इस युद्ध को पहला ऐसा युद्ध माना जाता है जिसमें जनता को प्रतिदिन की लड़ाई की ख़बर मिली। द टाइम्स अख़बार के विलियम रसेल और रोजर फ़ेंटन ने पत्र में इस लड़ाई का विवरण दिया था।

पृष्ठभूमि

संपादित करें

इस युद्ध का सूत्रपात एक छोटे से धार्मिक विवाद को लेकर हुआ। उन दिनों फ़िलिस्तीन, तुर्की साम्राज्य (उस्मानी साम्राज्य या ऑटोमन साम्राज्य) के अंतर्गत था। 1535 ई. में तुर्की के सुल्तान ने रोमन ईसाइयों के तीर्थस्थानों की देखभाल फ्रांस के संरक्षण में फ्रेंच कैथलिक पादरियों को सौंपा था। इसी प्रकार तुर्की स्थित यूनानी-ईसाई संप्रदाय के धार्मिक स्थान रूस के जार के संरक्षण में दिए गए थे। किंतु फ्रांस की प्रख्यात राजक्रांति के समय फ्रांस अपने उत्तरदायित्व की ओर समुचित ध्यान न दे सका। धीरे धीरे लैटिन धर्मस्थानों पर यूनानी-ईसाई संप्रदाय के साधुओं का अधिकार हो गया। 1850 ई. में फ्रांसनरेश नैपोलियन तृतीय का ध्यान लैटिन चर्च की ओर गया; उसने उनके प्रबंध को फ्रांस के संरक्षण में दे देने के लिये तुर्की को लिखा। 1852 ई. में उसने अपनी इस माँग को दुहराया। कुछ हीला-हवाली करने के बाद तुर्की के सुल्तान ने फ्रांस की इस माँग को स्वीकार कर लिया। रूस के लिये कोई कारण न था कि वह तुर्की के इस कार्य पर आपत्ति करता; किंतु उसने इसे तुर्की को हड़प लेने का एक अच्छा अवसर समझा। यूनानी-ईसाई संप्रदाय का पक्ष लेकर जार ने सुल्तान को लैटिन धार्मिक स्थलों का प्रबंध उन्हें लौटा देने को लिखा। इससे इंग्लैंड आशंकित हो उठा। उसे डर लगा कि कुस्तुंतुनिया पर रूस का अधिकार हो जाने पर स्थल मार्ग से भारत के लिये स्थायी खतरा उत्पन्न हो जाएगा और यह ऐसा खतरा होगा जिसका किसी प्रकार भी सामना करना उसके लिये संभव न होगा। वह रूस के विरूद्ध तुर्की की सहायता के लिये उठ खड़ा हुआ।

फ्रांस के लिये तो रुष्ट होने का स्पष्ट कारण था ही। रूस उसके तीर्थस्थलों की देखभाल के अधिकार में हस्तक्षेप कर रहा है। किंतु इससे बड़ा कारण यह था कि जार निकोलस प्रथम ने फ्रांस के नए सम्राट् को ‘भाई’ संबोधित न कर ‘मित्र’ संबोधित किया था। इसलिये रूस के यूनानी-ईसाई संप्रदाय का पक्षधर बनते देख उसे अपने राजवंश पर खतरा आता दिखाई पड़ा। आस्ट्रिया को भी बाल्कन की ओर रूसी बढ़ाव से घबराहट हुई। यद्यपि 1849 ई. में आस्ट्रियानरेश को अपना पैतृक सिंहासन रूसी सैनिक सहायता से प्राप्त हुआ था, तथापि इस अवसर पर रूस की कृतज्ञता मानना और चुप बैठे रहना उचित नहीं जान पड़ा। उसका झुकाव फ्रांस और इंग्लैंड की ओर होने लगा। उसने ब्रिटिश राजदूत के इशारे पर रूस की चुनौती को ठुकरा दिया। इसका जो परिणाम होना था हुआ।

जुलाई, 1853 में रूस की सेना ने कूच बोल दिया और डैन्यूब नदी के उत्तरवर्ती तुर्की के भूभाग-मोल्डेविया और बालेशिया के प्रांतों पर आधिकार कर लिया। तत्काल इंग्लैंड और फ्रांस का संयुक्त नौसेनिक बेड़ा तुर्की की सहायता के लिये बास्फोरस पहुँचा; किंतु अंगरेजी और फ्रांसीसी युद्धपोतों के देखते देखते साइनोप के निकट रूसी नौसेना ने तुर्की के बेड़े को नष्ट कर दिया। तब जनवरी,1854 ई. के आंरभ में इंग्लैंड और फ्रांस का संयुक्त बेड़ा कालासागर में घुसा और दोनों देशों ने शीघ्र ही रूस के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। उन्होंने अपनी रक्षात्मक युद्ध करने की योजना बनाई। कुस्तुंतुनिया की रक्षा के लिये उन्होंने गैलीपोली में किलेबंदी करने का निश्चय किया। किंतु इसके पूर्व कि आंग्ल-फ्रेंच सेनाएँ कालासागर के पश्चिमी तट पर वर्ना में एकत्र हों, आस्ट्रिया के अमैत्रीपूर्ण रुख को देखकर रूस ने अपनी सेना को तुर्की के अधिकृत प्रदेशों से वापस बुला लिया। इस प्रकार रूस द्वारा तुर्की पर आक्रमण की संभावना समाप्त हो गई। फलत: इंग्लैंड और फ्रांस की स्थिति विषम हो गई।

वर्ना में जोरों का हैजा फैला। सेना वहाँ छोड़ी नहीं जा सकती थी। दूसरी ओर बिना युद्ध किए अपनी सेना को स्वदेश लौटा ले जाना दोनों ही देश के शासकों का अपनी हीनता का द्योतक जान पड़ा। अत: कुछ करने की धुन में उन्होंने क्रीमिया पर आक्रमण करने का निश्चय किया। उसके दक्षिणी तट पर सेवास्टोपोल में रूस का नौसेनिक अड्डा था। उसे अधिकार में करना उनहोंने अपना लक्ष्य बनाया।

दुर्धर्ष निर्णय तो इन दोनों देशों ने ले लिया पर उनमे से किसी को भी क्रीमिया के भूभाग के संबंध में कोई जानकारी न थी। उत्साही फ्रांस ने जब इस कठिनाई का अनुभव किया तब उसने प्लेंचेट पर नैपोलियन महान की आत्मा को बुलाकर उससे सलाह लेने की बात की। रैफेट ने सेवास्टोपोल और बालक्लावा के जो मानचित्र तैयार किए थे उनका अध्ययन-मनन किया गया; रणव्यूह-विशेषज्ञ जैमिनी से सलाह ली गई किंतु कोई उत्साहजनक बात सामने नहीं आर्ई। असफलता की ही संभावनाएँ जान पड़ी। इधर ब्रिटिश मंत्रिमंडल को किसी प्रकार के गंभीर चिंतन की आवश्यकता नहीं जान पड़ी। उसने क्रीमिया के नक्शे पर सामान्य ढंग से दृष्टिपात किया और कहा कि तोपों के बल पर स्थलडम डिग्री के अवरुद्ध कर क्रीमिया के प्रायद्वीप को मुख्य भूभाग से काट देना कोई कठिन काम नहीं है। उन्हें तब तक इस बात का ज्ञान न था कि स्थलडम डिग्री के दोनों ओर समुद्र में दो-तीन फुट से अधिक जल नहीं है। उन्होंने युद्ध के लिये आदेश जारी कर दिए।

14 सितंबर को सेनाएँ यूपोटोरिया पहुँची। 17 सितंबर को उन्होंने सेवास्टोपोल की और बढ़ना आरंभ कर दिया। 20 सितंबर को उन्होंने रूसी सेना को हराया किंतु किसी प्रकार का कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला। रूसी सेनापति टाडेलबेन ने सेवास्टोपोल के दुर्ग में घुसकर दुर्ग की रक्षा की पूरी तैयारी कर ली। आँग्ल-फ्रेंच सेना ने दुर्ग पर घेरा डाल दिया। आगे कोई काररवाई वे कर पाएँ, इसके पूर्व जाड़ा आ गया; समुचित खानेपीने, वस्रादि की व्यवस्था के अभाव में सैनिक दयनीय स्थिति में पड़ गए। अँगरेजी सेना की स्थिति तो और भी खराब हो गई। जो जहाज उनके लिसे सामान ला रहे थे वे बालक्लावा के बंदरगाह में भयंकर समुद्री तूफान में पड़कर नष्ट हो गए। वर्ष समाप्त होते होते 8,000 सैनिक बीमार पड़ गए। अस्पतालों की स्थिति बीमारी को घटाने के बजाय बढ़ानेवाली थी। आधे से भी कम आदमी लड़ने योग्य बचे। जब फ्लोरेंस नाइट एंगेल महिला स्वयंसेविकाओं को लेकर पहुँची और बीमारों की सेवासुश्रुषा की व्यवस्था की तब कहीं स्थिति में कुछ सुधार हुआ।

जब सर्दी कम हुई तो दूसरी मुसीबत उठ खड़ी हुई। तार के आविष्कार से त्वरित संपर्क स्थापित करने की सुविधा हो गई। अत: दोनों देशों के मुख्यालयों से जो आदेश दस दिन में पहुँचते थे अब 24 घंटे में पहुँचने लगे। इस सुविधा का उपयोग इंग्लैंड और फ्रांस ने अलग अलग ढंग से किया। इंग्लैंड के लिये सैनिक असफलता का अर्थ मंत्रिमंडल में उलटफेर की संभावना से अधिक और कुछ न था। अत: युद्ध विभाग ने उसका उपयोग केवल अपने कप्तान जेविस के स्वास्थ्य के प्रति चिंता व्यक्त करने में किया। किंतु फ्रांस के सम्राट् के लिये तो हार राजवंश के विनाश का पैगाम था। अत: वे अपने सेनापति को दनादन सुझाव, सलाह और आदेश भेजने लगे। फलत: दोनों ही देशों के सेनापतियों को तारों के इस प्रकार के आदान-प्रदान के कारण मेज से उठकर और कुछ करने और सोचने की फुरसत ही नहीं रही।

फिर भी अप्रैल आते आते उन लोगों ने सेवास्टोपोल के घेरे की गति तीव्र करने की चेष्टा की। जून में अंगरेजी सेना ने रेडान पर और फ्रांसीसी सेना ने मेलेकाफ पर आक्रमण किया परंतु रूसियों ने दोनों ही आक्रमणों को विफल कर दिया। किंतु जब आँग्ल-फ्रेंच सेना ने किनबर्न पर अधिकार कर लिया तब रूस ने युद्ध जारी रखना व्यर्थ समझा। इस समय तक फ्रेंच नरेश नैपोलियन (तृतीय) भी इस युद्ध से घबरा उठा था। वह आगे युद्ध करने के पक्ष में न था। किंतु अंगरेज, जिन्हें सेवास्टोपोल के आक्रमण में असफलता मिली थी, खीझे हुए थे। वे युद्ध जारी रखना चाहते थे किंतु अकेले रूस से युद्ध कर सकना उनके बस की बात न थी। निदान पेरिस में एक संधि हुई। इस संधि में अन्य बातों के अतिरिक्त मुख्य बात यह थी कि दान्यूब नदी में सभी देशों के जहाजों के लिए यातायात खोल दिया गया; कालासागर तटस्थ क्षेत्र घोषित किया गया; प्रत्येक देश के युद्धपोतों का वहाँ आना निषिद्ध कर दिया गया। दूसरे शब्दों में रूस को अपने युद्धपोत कालासागर से हटा लेने पड़े; किंतु पंद्रह वर्ष के भीतर ही संधि की ये बातें निरर्थक हो गई।

युद्ध के कारण

संपादित करें

वियना कांग्रेस के पश्चात क्रीमिया युद्ध युरोप इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना था। इस युद्ध के फलस्वरुप एक ओर जहाँ रुस की तुर्की संबंधी योजना विफल हो गई वहीं दूसरी ओर तुर्की को नव जीवन प्राप्त हुआ। इटली और जर्मनी के एकीकरण रुस की राजनीति बालकन प्रायद्वीप के पूर्ण निर्माण एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर इस युद्ध का गहरा प्रभाव पड़ा। इस युद्ध के कई कारण थे। जो इस प्रकार है।

रुसी नीति-

19 वीं शताब्दी में तुर्की साम्राज्य का पतन होता जा रहा था। इससे फायदा उठाकर विभिन्न यूरोपीय राष्ट्र उसे आपस में बाँटना चाहते थे। रुस इसके लिए विशेष प्रयत्नशील था। वह तुर्की के मामले में गहरी अभिरुचि लेने लगा। रुस चाहता था। कि तुर्की कमजोर पड़ जाए ताकि बाल्कन क्षेत्र में अपनी साम्राज्य का विस्तार कर सके। अत: उसने बाल्कन प्रायद्वीप के प्रजा को तुर्की के खिलाफ आंदोलन के लिए भड़काया। रुस का उद्देश्य तुर्की को समाप्त करना था। और तुर्की साम्राज्य के खंडहर पर क विशाल रुसी साम्राज्य का महल खड़ा करना चाहता था। इस लिए जब भी मौका मिला रुस यूरोपीय के सामना तुर्की के बटवारे का प्रस्ताव रखता था।

ब्रिटेन का स्वार्थ-

इंगलैंड रुस की महत्वकांक्षा का प्रबल विरोधी था। क्योंकि भुमध्य सागर में रुस का प्रवेश इंगलैड के लिए संकट उत्पन्न कर सकता था। साथ ही साथ तुर्की पर रुस का अधिकार होने से इंगलैंड का भारतीय साम्राज्य भी खतरे में पड़ सकता था। इसलिए भारतीय साम्राज्य की सुरक्षा के लिए तुर्की को रुस के अधिकार में जाने से बचाने के लिए उसकी अहम भूमिका थी। इंगलैंड कभी नहीं चाहता था कि पूर्व की ओर उसका विस्तार हो। हलांकि रुस ने इंगलैंड को अपनी ओर मिलाने की चेष्टा की लेकिन उसे सफलता नहीं मिल सकी। विभिन्न प्रयासों के बाद भी जब इंगलैड रुस के पक्ष में नहीं हो सका तो उसे तलवार के बल पर तुर्की को हड़पने की योजना बनाना शुरु कर दी।

फ्रांस का स्वार्थ-

यूरोप के बीमार राष्ट्र तुर्की पर फ्रांस की नजर भी लगी हुई थी। लुई नेपोलियन युद्ध नीति के द्वारा फ्रांस का विस्तार करना चाहता था। उसने तुर्की के मामले में हस्तक्षेप करना शुरु किया। क्रीमिया युद्ध का शुत्रपात नेपोलियन के इसी नीति के फलस्वरुप हुआ।

मोहम्मद अली का विद्रोह और यूरोपीय राष्ट्रों का तुर्की में हस्तक्षेप-

मोहम्मद अली मिश्र का गवर्नर था। जो तुर्की साम्राज्य के अधिन था। परन्तु मोहम्मद अली एक स्वतंत्र शासक था। यूनान के स्वतंत्रता संग्राम में तुर्की को सहायता देने के बाबजूद उसे कोई लाभ नहीं हुआ था। अत: वह सीरिया के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की। इसपर तुर्की का शुल्तान घबरा गया। उसने रुस से सहायतका प्राप्त की। इससे विभिन्न राष्ट्रों में बेजैनी बड़ गई और प्रमुख यूरोपीय देशों ने रुसी सेना को वापस करना के लिए तुर्की पर यह दबाव डालना शुरु किया कि वे मोहम्मद अली के साथ समझौता कर ले। समझौता के फलस्वरुप मोहम्मद अली को सीरिया दे दिया गया। इधर रुस अपनी सहायता के बदले तुर्की से कुछ ना कुछ पुरस्कार चाहता था। 1832 में उसने तुर्की के साथ एक संधि की जिसके द्वारा तुर्की पर रुस का प्रभाव कायम हो गया। इस घटना से इंगलैंड चिंतित हो गया उसने यूरोपीय राज्यों का लंदन में एक सम्मेलन बुलाया। सभी राष्ट्रों ने एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर किया। फलत: तुर्की पर रुस का प्रभाव कुछ कम हो गया। इसके पश्चात लगभग दस वर्षों तक शांति कायम रही परन्तु फ्रांस में लुई नेपोलियन का जमाना आया तो उसने रुस के इसाई का पादरीयों का पक्ष लेकर पूर्वी समस्या को उभारना शुरु किया क्रिमिया युद्ध इसकी का परिणाम था।

धार्मिक कारण-

इसाई का पवित्र येरुसलम तुर्की साम्राज्य के अधीन था। वहाँ रोमन और यूनानी चर्च के संन्यासी रहते थे। उनके साथ तुर्की सुल्तान का व्यवहार अच्छा नहीं था अत: 1742 के संधि के अनुसार रोमन संन्यासी की रक्षा का भार रुस पर कर दिया गया। परन्तु फ्रांस के क्रांति के फलस्वरुप जब फ्रांस में अव्यवस्था फैल गई। तो यूनानी पादरी ने रोमन चर्च पर आक्रमण करना शुरु किया। लुई नेपोलियन ने रोमन पादरी का समर्पन करना शुरु किया और रुस ने यूनानी पादरी का साथ देना शुरु किया। अत: पूर्वी समस्या बिगड़ने लगी। तीन वर्षों तक इस समस्या को लेकर यूरोप में कुटनीति तनाव व्याप्त रहा। रुस यूरोप में कुटनीति तनाव व्यप्त रहा। रुस धार्मिक बहाना बना कर तुर्की पर आक्रमण कर उसके प्रदेशों पर अधिकार करना चाहता था। 1853 में रुस ने तुर्की पर आक्रमण किया तथा नोलडेविया और बेलेशिया पर अधिपत्य कर लिया। रुस पर इंगलैण्ड और फ्रांसने तुर्की को सहायता देने का आश्वसन दिया तुर्की को सहायता देने का आश्वसन दिया 27 फरवरी 1854 को इंगलैंड और फ्रांस ने रुस को संयुक्त चेतावनी दी कि रुस तुर्की का प्रदेश खाली कर दे। लेकिन संतोष जनक उत्तर न मिलने के कारण दोनों ने रुस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यही युद्ध क्रीमिया का युद्ध था। जिसमें एक ओर इंगलैण्ड, फ्रांस और तुर्की तथा दुसरी रुस ओऱ बिल्कुल अकेला था यह युद्ध दो वर्षों तक चलता रहा। धन जन की अपार क्षति हुई। रुस की जबर्दस्त पराजय हुई। मार्च 1856 में पेरिस के संधि के द्वारा युद्ध समाप्त हुआ। इस प्रकार युद्ध मंु मिस्त्र राष्ट्रों की विजय और रुस की पराजय हुई।

पेरिस की संधि

संपादित करें

30 मार्च 1856 को इंगलैंड, फ्रांस, आस्ट्रिया, तुर्की, सर्विया तथा रुस के प्रतिनिधियों ने पेरिस संधि पर हस्ताक्षर किया। जिसके अनुसार कालासागर की तटस्थ क्षेत्र घोषित किया गया। सभी नदी की अन्तर्राष्ट्रीय करण कर दिया गया। मोल डिविया और बोलेगिया पर रुस का संरक्षण समाप्त कर दिया गया। सर्विया की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई। तुर्की को यूरोप के राष्ट्र समुह में शामिल कर लिया गया। तथा उसकी अखंडता और स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया।

युद्ध के परिणाम

संपादित करें

क्रीमिया युद्ध यूरोपीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इस युद्ध के बारे में दो प्रकार की धारणाये व्यक्त की गई है। राबर्ट मेरियट ने इसे आधुनिक युग का पुर्ण व्यर्थ युद्ध बताया था, उन्होंने लिखा है। “The only perfectly useless modern war that has been waged.” इसके विपरीत लार्ड क्रोमर का कहना है। ‘यदि क्रीमिया युद्ध नहीं होता तो तुर्की पर रुस का अधिपत्य कायम हो जाता’ डा. एम. केदेलवी ने लिखा है। ‘क्रीमिया युद्ध के फलस्वरुप रुस की तुर्की संबंधी योजनाओं को रोक दिया गया। रुस की जबर्दस्त पराजय हुई। तुर्की को युरोप के संरक्षण में नव जीवन मिला नेपोलिन की धाक जम गई। इंगलैंड का राष्ट्रीय ऋण बढ़ गया और आस्ट्रिया ने एक महान देश की शत्रु मोल ली। राबर्ट मोरिट का विचार कुछ अंशों में स्तय प्रतीत होता है। क्रीमिया युद्ध के पश्चात तुर्की का पतन अवश्यभांवी हो गया। सर्विया को स्वतंत्रता प्रदान की गई। यह अन्य पराधीन देशों के लिए प्रेरणा स्रोत साबित हुआ। और विदेशी अपनी स्वाधीनता के लिए बेचैन हो उठे। क्रीमिया युद्ध का प्रमुख उद्देश्य रुस को कमजोर बनाना था। परन्तु यह उद्देश्य भी सफल नहीं हो सका। यह सोचना कि रुस आगे चजलकर शांत हो जाएगा गलत साबित हुआ। मौका मिलते ही वह पूर्व समस्या में पुन: कुद पड़ा पेरिस की संधि का उद्देश्य रुसी महत्वकांक्षाओं पर अंकुश लगाना था और तुर्की को जीवित करना था परन्तु यह भी परी नहीं हो सका। अत: यह कहा जा सकता है। कि जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए युद्ध लड़ा गया था। उस दृष्टि से यह व्यर्थ साबित हुआ। इंगलैंड या फ्रांस किसी को लाभ नहीं पहुँचा। परन्तु इतना होते हुए भी क्रीमिया युद्ध को पूर्ण व्यर्थ युद्ध नहीं कहा जा सकता। वास्तव में इसका अप्रत्यक्ष परिणाम दूरगामी और महत्वपूर्ण साबित हुआ। केटोलवी लिखा है। “it is indirect results were greater out of the mud of Cremica new Italy way made and less of obviously a new Germany” वस्तुत: 19वीं शदी की आने वाली घटनाओं पर इस युद्ध का ऐसा निश्चित प्रभाव पड़ा कि 1815 में वियना में जिस महत्व का निर्माण किया गया था उसकी नींव हिल गई।

तुर्की पर प्रभाव-

इस युद्ध के फलस्वरुप तुर्की को नवजीव मिला। वह यूरोप के राष्ट्र समुह में शामिल हो गया। उसकी अखंडता और स्वतंत्रता स्वीकार कर ली गई। रुस का भय समाप्त हो गया।

रुस पर प्रभाव-

इस युद्ध ने रुस की सैनिक शक्ति को आघात पहुँचाया और जार शाही की कमजोरी को उजागर कर दिया। उसे अधिक क्षति भी उठानी पड़ी इतिहासकार होजन का विचार है। ‘इस राष्ट्रीय अपमान में भविष्य की आशाएं निहित थी। जिस प्रकार सेना की पराजय के बाद सैनिक पूर्ण गठन हुआ उसी प्रकार रुस का पुर्णनिर्माण भी हुआ यह रुस के इतिहासकार की महत्वपूर्ण घटना है। क्योंकि इस पराजय के बाद ही यहाँ व्यापक सुधार हुआ परन्तु क्रीमिया युद्ध का सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि इसका कुस्तुनतुनिया पर अधिकार करने और काला सागर को रुसी झील बनाने का सपना भंग हो गया।

इंगलैंड पर प्रभाव-

इस युद्ध में इंगलैंड का उद्देश्य पुरा हो गया। रुस के विस्तार पर प्रतिबंध लग गया लेकिन इससे इंगलैंड को धन जन की अपार क्षति हुई उसका राष्ट्रीयकर बाद दिया गया जिससे सुधार योजनाएँ को लागू करने में कठिनाई हुई।

फ्रांस पर प्रभाव-

युद्ध के चलते फ्रांस के गौरव में काफी वृद्धि हुई। युद्ध में रुस की पराजय हुई। नेपोलियन ने फ्रांस की पराजय का बदला रुस से ले लिया।

इटली पर प्रभाव-

इस युद्ध का प्रभाव इटली और जर्मनी पर भी पड़ा यदि यह युद्ध नहीं होता तो इटली और जर्मनी का एकीकरण नहीं हो पाता वास्तव में इस युद्ध के द्वारा इटली को काफी फायदा पहुँचा।

आस्ट्रिया पर प्रभाव-

आस्ट्रिया के द्वारा तटस्थता की नीति अपनाने से इंगलैंड और फ्रांस, अप्रसन्न हो गए। रुस भी नाराज हो गया। आस्ट्रिया मित्र विहीन हो गया और उसका साथ देने वाला कोई नहीं बचा।