खालसा महिमा (या खालसा महमा) (Pa: ਖਾਲਸਾ ਮਹਿਮਾ) दो रचनाओं का नाम है, जो खालसा के सम्मान में काव्य रूप में गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित है। प्रत्येक रचना दसम ग्रंथ और सर्बलोह ग्रंथ में मौजूद हैं।[1]

दशम ग्रंथ में, रचना 33 सवैयों के अंत में मौजूद है। इसमे गुरु गोबिंद सिंह हिंदू ब्राह्मणों को संत सैनिकों (संत सिपाही) की भूमिका के बारे में बताते हैं।[2]

सर्बलोह ग्रंथ में यह रचना 459 पंक्ति मे "बिसनूपद धनुकी देव प्लासी" शीर्षक के नाम से मौजूद है, जो खालसा मेरो रूप है खास से शुरू होती है।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Page 113, The A to Z of Sikhism, W. H. McLeod
  2. patshahi10.org