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गणेश दैवज्ञ (जन्म : सन् १५०७) एक खगोलविद थे। उनके द्वारा रचित ग्रहलाघव प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके अलावा बुद्धिविलासिनी टीका भी प्रसिद्ध है। 'ताजकभूषण'कार गणेश और 'जातकालंकार' के कर्ता गणेश, ये दोनों ग्रहलाघवकार गणेश से भिन्न हैं।

गणेश के पिता व गुरु केशव माता लक्ष्मी के गर्भ में श्री भगवान गणेश के अवतार स्वरूप गणेश दैवज्ञ का जन्म शके १४२९ (ई० सन् १५०७) में हुआ। गणेश ने अपनी तेरह वर्ष की छोटी अवस्था में ही ग्रहलाधव करण ग्रन्थ की रचना कर ली थी, यह चिरात जनश्रुति प्रसिद्ध है । ग्रहलाघव करण ग्रन्थ के आरम्भ में शक १४४२ से अहर्गण साधन किया है, जिससे १४४२-१४२९ = १३ वर्ष ज्ञात होता है ।

ग्रहलाघव ग्रन्थ के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि लम्बे-चौड़े अरबों संख्या के अङ्कों का अपवर्तनाङ्क समझ कर उनके स्थान पर छोटे अपवर्त्तित अंकों के माध्यम से, तथा ज्याचाप की क्लिष्ट गणित पद्धति के स्थान पर सर्वसुलभ लघु प्रणाली का प्रचलन के कारण से इस ग्रहसाधन ग्रन्थ की ‘ग्रहलाघव' संज्ञा हुई है।

बुद्धिविलासिनी में गणेश दैवज्ञ ने गणित की परिभाषा निम्नवत की है-

गण्यते संख्यायते तद्गणितम्। तत्प्रतिपादकत्वेन तत्संज्ञं शास्त्रं उच्यते।
(जो परिकलन करता और गिनता है, वह गणित है तथा वह विज्ञान जो इसका आधार है वह भी गणित कहलाता है।)

गणेश ने अपना गणित ग्रन्थ ‘ग्रहलाघव’ सन् 1521 के आस-पास आरम्भ किया। ग्रहगणित पर गणेश की जितनी कृतियाँ प्रचलित हैं, उतनी अन्य किसी की नहीं। ज्योतिष पर भी गणेश ने कार्य किया है। इन्होंने भास्करकृतलीलावती’ की टीका लिखी थी। इसी टीका में उन्होंने गुणन की एक विधि का वर्णन किया है जो 8वीं शती या उससे पहले के हिंदुओं को स्मरण थी। जब गणेश ने इसका उल्लेख किया तो वह सहज ही अरब पहुंची और अन्य यूरोपीय देशों में भी। पसियोली के ‘सूमा’ नामक ग्रंथ में भी इसका उल्लेख मिलता है।

अनुक्रम

कृतियाँसंपादित करें

आचार्य गणेश ने—ग्रहलाघव, लघुतिथि चिन्तामणि, वृहत्तिथि चिन्तामणि, सिद्धान्त शिरोमणि टीका, लीलावती टीका, विवाह वृन्दावन टीका, मुहूर्त तत्व टीका, श्राद्धादिनिर्णय, छन्दोऽर्णव टीका, सुधीरञ्जनी, तर्जनीयन्त्रम्, कृष्ण जन्माष्टमी निर्णय, होलिका निर्णय, इत्यादि अनेक ग्रन्थों की रचना से ज्योतिषशास्त्र का भण्डार भरा है। ज्योतिष शास्त्र के प्रगल्भ पाण्डित्य विशेष के साथ-साथ आचार्य गणेश की अन्य रचनाओं से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि श्री गणेश में काव्य साहित्यादि का पूर्ण एवं व्यापक पाण्डित्य है।

बृहत्तिथ्यादि में स्वयं आचार्य गणेश का कथन उल्लेख्य है-

ब्रह्माचार्यंवसिष्ठकश्यपमुखैर्यखेटकर्मोदितं
तत् तत्कालजमेव तत्थ्यमथ तद्भूरिक्षणेऽभूच्छलथम्,
प्रपातोऽथ मयासुर कृतयुगान्तेऽर्कात् स्फुटं तोषितात् ।
तच्चास्ति स्म कलौ तु सान्तरमथाऽभूच्चारु पाराशरम्,
तजज्ञात्वार्यभट्टः खिलं बहुतिथे कालेऽकरोत्स्फुटम् ।
तत् स्रस्तं किल दुर्गसिंहमिहिराद्यैस्तान्निबद्धं स्फुटम् ॥
तच्चाभूच्छिथिलं वु जिष्णुतनयनाऽकारि वेधात्स्फुटम्,
ब्रह्मोक्त्याश्रितमेतदाप्यथ बहौ कालेऽभवत् सान्तरम् ॥
श्री केशवः स्फुटतरं कृतवान् हि सौरार्यासन्नमेतदपि पष्टिमिते गतेऽव्दे-
दृष्ट्वा श्लथं किमपितत्तनयो गशेशः ।
स्पष्टं यथा ह्यकृत् दृग्गणितैक्यमत्र,
कथमपि यदिदं भूरिकाले श्लथं स्यात् ।
मुहरपि परिलक्षेन्दुग्ग्रहाद्यृक्षयोग्यम्,
सदमलगुरूतुल्यप्राप्तबुद्धिप्रकाशैः ।
कथितसदुपपत्त्या शुद्धि केन्द्रे प्रचाल्ये ॥
(इस प्रकार वाराहाचार्य ने अपनी पञ्चसिद्धान्तिका में १-पौलिश, २-रोमक, ३--वासिष्ठ, ४-सौर, एवं ५-पैतामह इन पाँचों में सूर्य सिद्धान्त का गणित “स्पष्टतर सविता' से सूक्ष्म कहा है । तदुपरि के आचयों ने सौर सिद्धान्त की अपेक्षा आर्यभट्ट का गणित अधिक सूक्ष्म माना। कालान्तर में आर्यभट्ट को ग्रहगणित स्थूल हो जाने से ब्रह्मगुप्त का वेधसिद्ध ग्रहगणित सूक्ष्म हुआ। किन्तु बहुकालान्तर में व्रह्मगुप्त गणित की स्थूलता को समझ कर श्री केशवाचार्य ने सौर एवं आर्य-सिद्धान्त के समीप का वेधसिद्ध ग्रहगणित स्वीकार किया है। इस उत्तरोत्तर गणित-सूक्ष्मता प्राप्ति के लिए आचार्य गणेश ने स्पष्ट दृग्गणितैक्य सिद्ध ग्रहगणित साधन पद्धति से भारतीय ज्योतिष को समुज्वल किया है। इस सन्दर्भ में आचार्य गणेश का मत स्पष्ट है-“इस प्रकार के गणित के स्थूल भय को दूर करने के लिये सूर्यचन्द्रग्रहणादि प्रत्यक्ष दुग्योग्यता संपादनार्थ समय-समय पर बेधादि विचार से उत्पन्न त्रुटियाँ दूर करते हुए प्रश्न का समाधान करते रहना चाहिए। अर्थात् सूक्ष्मता प्राप्ति हेतु ग्रहों में संस्कारान्तर स्वीकृत करने चाहिए।)

सम्प्रति यह आशा की जा सकती है कि वर्तमान दृश्य एवम् अदृश्य पञ्चाङ्गों का भयंकर विवाद उक्त प्रमाणों से समाप्त हो जा सकेगा।

टीकाएँसंपादित करें

ग्रहलाघव पर टापरग्रामस्थ गङ्गाधर की शक १५०८ की टीका है। मस्सारि की टीका शक १५२४ की और विश्वनाथ की शक १५३४ के आसपास की है। उसमें उदाहरण है। इस टीका को उदाहरण भी कहते हैं।

बृहचिन्तामणि में कोष्ठक अधिक होने से कारण प्रायः उससे कोई गणित नहीं करता। लघुचिन्तामणि से गणित किया जाता है। इसमें अंक ही अधिक हैं। क्रमशः बढ़ते-बढ़ते इसमें अशुद्धियां बहुत हो गयी हैं। बृहच्चिन्तामणि पर विष्णु दैवज्ञ की सुबोधिनी नाम की टीका है। उसमें उपपति है। लघुचिन्तामण पर यज्ञेश्वर नामक ज्योतिषी ने 'चिन्तामणिकान्ति' नाम की टीका की है। उसमें उपपत्ति है। तर्जनीयन्त्र कालसाधनोपयोगी है। उसे प्रतोदयन्त्र भी कहते हैं। उस पर सखाराम की और सङ्गमेश्वरनिवासी गोपीनाथ की टीकाएँ हैं। गोपीनाथ के पिता का नाम भैरव और पितामह को राम था।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें