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गदाधर भट्टाचार्य (1650) नव्य न्याय के यशस्वी नैयायिक थे।[1] वे नवद्वीप के निवासी थे। इन्होंने रघुनाथ की "दीधिति" पर अत्यन्त विसतृत और परिष्कृत टीका की रचना की है जो "गादाधरी" नाम से विख्यात है। व्युत्पत्तिवाद, शक्तिवाद आदि उनके अनेक मौलिक ग्रंथ हैं, जिनसे इनके मौलिक चिंतन की विदग्धता विदित होती है। ये 17 वें शतक में विद्यमान माने जाते हैं।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. सतीश चन्द्र विद्याभूषण (1920). A History of Indian Logic: Ancient, Mediaeval and Modern Schools [भारतीय तर्कशास्त्रियों का इतिहास: प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक] (अंग्रेज़ी में). मोतीलाल बनारसीदास. पृ॰ 481. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788120805651.