गायरी

भारतीय चरवाहा समुदाय

गायरी या गाडरी भारतीय राज्य राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र का एक जाति-समूह है, इन्हें पशुपालक जातियों की श्रेणी में रखा जाता था।[1]राजस्थान सरकार ने एक अधिसूचना द्वारा गुर्जर एवं चार अन्य तीन जातियों के साथ इस जाति को अन्य पिछडा वर्ग (ओबीसी) में शामिल किया है, जबकि पहले यह जातियां विशेष पिछडा वर्ग (एबीसी) में शामिल थीं। [2]

गायरी समाज में आसन पूजा का महत्व,,

एवं पूजन कब होता है

विशेषकर गारी समाज के लोग अश्विन महा सितंबर अक्टूबर महा में महानवमी की पूजा के बाद गारी समाज के लोग दूध वह दूध से बनी हुई चीजें का सेवन नहीं करते इस दिन सभी समाज के लोग 7 दिन तक दूध को जमा कर

(दही) केलिया पूर्णिमा के दिन विशेष पूजा कर दही से मक्खन निकालकर उसका घी बनाते हैं

किवदंती के अनुसार गारी समाज के लोग

आसन बिठाकर पूजा करने से घर में संपन्न ता एवं दूध दही घी की कमी नहीं होती

2) विष्णु के अवतार भगवान श्री देवनारायण जब उज्जैन पधारे थे तब उनकी माता साडू उनको छोड़कर जंगल में चली गई थी तब भगवान को भूख लगी तो रोने लगे तब शेरनी ने आकर भगवान श्री देवनारायण को दूध पिलाना शुरू किया तब माता साडू डर गई एवं कहने लगी कि मैं 7 दिनों तक आसन बिठाकर के लिए पूर्णिमा तक पूजन पाठ करूंगी उस समय दूध का सेवन व से बनी चीजें नहीं खाऊंगी उन्हीं की याद में आज गारी समाज के लोग आसन पूजा करते हैं

सन्दर्भसंपादित करें

  1. तनेगारिया, राहुल. "मेवाड़ में जातिगत सामाजिक ढ़ाँचा : एक विश्लेषण". ignca.nic.in. अभिगमन तिथि 6 जनवरी 2018.
  2. "पांच जातियों को फिर से अन्य पिछडा वर्ग में शामिल करने की अधिसूचना जारी की". नवभारत टाइम्स. 19 मई 2017. अभिगमन तिथि 6 जनवरी 2018.