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प्राचीन समय से ही संसार के अनेक भागों में विविध प्रकार की शिलाएँ भवननिर्माण के कार्यों में आती रहीं हैं। भारत भी उन कतिपय देशों में हे जो इस कार्य में सहस्रों वर्षों से निपुण रहे हैं और आज भी विभिन्न प्रकार के पत्थरों से निर्मित्त अनेक भवन हमारी सभ्यता और संस्कृति का संदेश दे रहे हैं। मध्यकाल एवं आधुनिक काल में भी अनेक भवन इन पत्थरों से बनाए गए, जो सुंदरता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

भवननिर्माण में प्रयुक्त शिलाओं में कुछ विशेषताएँ होनी आवश्यक हैं, उदाहरणार्थ ऋतुक्षरण रोकने की क्षमता, खनन में सुगमता, वर्ण एवं सुंदरता आदि। निर्माणशिलाओं में निम्नांकित मुख्य है :

बलुआ पत्थरसंपादित करें

यह पत्थर मुख्य रूप से विंध्य पर्वतमाला में प्राप्त होता है। इसके इतने विशाल स्रोत हैं तथा यह इतनी अधिक सुविधा से मिल जाता है कि अनेक कार्यों में इसका उपयोग सहज ही संभव है। विंध्य पर्वतमाला का बलुआ पत्थर समान आकार के सूक्ष्म कणों से निर्मित है तथा इसकी बनावट (texture) भी शिलाओं में लगभग नियमित तथा समान रहती हैं। यह लाल, पीले तथा भूरे आदि अनेक वर्णों में प्राप्य है। अनेक स्थलों पर इसके खननकेंद्र हैं, जहाँ से यह देश के विभिन्न भागों में भवननिर्माण कार्यों में उपयोग के लिए वितरित किया जाता है। मध्यकालीन तथा अर्वाचीन अनेक उत्कृष्ट भवनों का निर्माण इस पत्थर से किया गया है। भारत में उत्खनित सभी पत्थरों में इसका स्थान सर्वोच्च है।

चूना पत्थरसंपादित करें

भारत में चूना पत्थर भी देश के अनेक भागों में प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। कुछ समय पूर्व तक इसकी माँग अधिक नहीं थी, किंतु गत कुछ ही वर्षों में खपत इतनी अधिक बढ़ी है कि अनेक कार्यों में विभिन्न प्रकार के चूना पत्थरों का विशेष उपयोग होने के कारण इस क्षेत्र में पर्याप्त अन्वेषण की आवश्यकता हुई। उत्तम वर्ग का चूना पत्थर आजकल लोह तथा इस्पात उद्योग में द्रावक (flux) के रूप में, अनेक रासायनिक कार्यों में, विरंजन चूर्ण, सोडा क्षार तथा कैल्सियम कार्बाइड आदि के निर्माण में एवं शक्कर और वस्त्रोद्योग में, प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त सीमेंट वर्ग के चूना पत्थरों को विशाल बाँध योजनाओं के समीप भी स्थित करना पड़ता है। इन अनेक उपयोगों के कारण चूना पत्थर के विशाल निक्षेप देश के अनेक भागों में उत्खनित हुए हैं तथा अनेक पर खनन कार्य किया जा रहा है। जिन प्रदेशों में चूना पत्थर का खनन मुख्यत: होता है उनमें उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, पूर्वी पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, मद्रास, महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र सम्मिलित हैं। भारतीय भूतात्विक सर्वक्षण के अन्वेषणों के आधार पर सीमेंट के अनेक कारखाने स्थापित किए गए हैं तथा अनेक का निर्माण कार्य चल रहा है।

रासायनिक वर्ग का चूना पत्थर, जिसकी खपत आजकल अधिकाधिक वृद्धि पर है, उत्तरप्रदेश के देहरादून तथा मिर्जापुर, मध्य प्रदेश के जबलपुर, मद्रास के तिनेवेली जिले, सौराष्ट्र के पोरबंदर तथा जूनागढ़ एवं असम की खासी पहाड़ियों में प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है।

सीमेंट उद्योगसंपादित करें

वर्तमान तथा भविष्य में आवश्यक सीमेंट के लिये भारत में मूल कच्चा माल (चूना पत्थर, जिप्सम, बाक्साइट, लैटराइट, मिट्टी तथा कोयला) पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। आजकल सीमेंट चूना पत्थर तथा मृत्तिका, अथवा शेल के अत्यंत सूक्ष्म पिसे हुए मिश्रण द्वारा, जिसमें दोनों अवयवों का अनुपात सदैव समान रखा जाता है, निर्मित होता है। मिश्रित पदार्थ, जो पंकक (slurry) के रूप में होता है, प्रारंभिक द्रवण (incipient fusion) तक, इस्पात के 8-10 फुट व्यास की लंबी, रंभ के आकार की भट्ठियों में तप्त किया जाता है। इन भट्ठियों में भीतर की ओर उष्मारोधी पदार्थों की ईटें लगी होती है तथा भट्ठियाँ स्वयं ही एक ओर को थोड़ी झुकी रहती हैं, जिससे मिश्रण धीरे धीरे सर्वाधिक संतप्त भाग की ओर बढ़े। इस संतप्त भाग को नियमित रूप से तप्त करने के लिए चूर्णित कोयला तथा निस्तप्त पदार्थों से निकलने वाली गैसों के जलने से उत्पन्न उष्मा का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार तप्त मिश्रण को जिप्सम के चूर्ण की उपयुक्त मात्रा के साथ मिलाकर ‘बाल एवं ट ्यूब चक्की’ (Ball end Tube Mills) में अवकृत किया जाता है। सूक्ष्म चूर्ण के रूप में इसी को ‘सीमेंट’ कहते हैं।

भारत में सीमेंट के कारखाने अपने कार्य में देशी चूना पत्थर का प्रयोग करते हैं। परिवहन सुविधा को दृष्टि में रखते हुए देश में सीमेंट के कुछ नवीन कारखाने स्थापित करने के प्रयत्न हो रहे हैं।

जिप्समसंपादित करें

गत कई वर्षों से भारत में जिप्सम की खपत दिन पर दिन बढ़ रही है। सिंदरी खाद संयंत्र स्थापित होने के पूर्व जिप्सम के उत्पादन का अर्धांश केवल सीमेंट उद्योग में प्रयुक्त होता था। सन्‌ 1948 से त्रावंकोर में एक खाद संयंत्र ने ऐमोनियम सल्फेट का उत्पादन मध्यम स्तर पर प्रारंभ कर दिया। इसी प्रकार 31 अक्टूबर सन्‌ 1951 से सिंदरी के खाद संयंत्र में भी ऐमोनियम सल्फेट का उत्पादन प्रारंभ हुआ, जिसमें प्रति दिन 1500-2000 टन जिप्सम की आवश्यकता होती है।

भारत विभाजन से पूर्व पश्चिमी पंजाब में लवणश्रृंखला ही जिप्सम का मुख्य स्रोत समझी जाती थी, किंतु इसके पश्चात यह भाग पाकिस्तान में चला गया तथा भारत को अन्य स्रोतों की आवश्यकता का अनुभव हुआ, जो बढ़ती हुई जिप्सम की खपत को पूरा कर सकें। परिणामस्वरूप भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण ने राजस्थान, मद्रास तथा सौराष्ट्र में जिप्सम के निक्षेपों का विस्तृत अध्ययन प्रारंभ कर दिया।

राजस्थान के जिप्सम निक्षेप जिप्साइट (Gypsite) के रूप में बीकानेर तथा जोधपुर में पाए जाते हैं। इन निक्षेपों में जमसर का निक्षेप सर्वाधिक विशाल तथा महत्वपूर्ण है और यह स्रोत आजकल सिंदरी के खाद संयंत्र की आवश्यकतापूर्ति करता है। मद्रास के तिरुचिरपल्ली जिले के अंतर्गत क्रिटेशियस शिलाओं (Cretaceous rocks) की अनियमित पट्टिकाओं (Veins) में जिप्सम मिला है।

सौराष्ट्र में मृत्तिकाओं तथा अवमृद (marls) में तृतीयक युग के ‘गज’ चूनापत्थरों के आधार के समीप जिप्सम के प्राप्तिस्थान हैं। विशालतम निक्षेपों में, जो हलर जिले में खाड़ी के समीप मिले हैं, 25 लाख टन जिप्सम की मात्रा होने का अनुमान है।

कुछ विशाल निक्षेप हिमालय के कतिपय भागों, जैसे कश्मीर, सिक्किम, तथा भूटान एवं भारत के अन्य भागों में प्राप्त हुए हैं। कश्मीर के निक्षेप तो अत्यंत आशाजनक हैं, यद्यपि परिवहन के अभाव के कारण इनका उपयोग अभी निकट भविष्य में संभव नहीं है, तथापि सुनियोजित कार्यक्रम के पश्चात ये निक्षेप अत्यंत लाभप्रद होंगे, इसमें संदेह नहीं।

संगमरमरसंपादित करें

प्राचीन, मध्यकालीन एवं अर्वाचीन काल में भारत में अनेक भव्य भवन संगमरमर से निर्मित हुए। यद्यपि भारत में अनेक स्थानों पर संगमरमर प्राप्त होता है, तथापि उत्तरी पश्चिमी भारत का संगमरमर अपने गुणों में अद्वितीय है। नागौर जिले में मकराना नामक स्थान का संगमरमर अत्यंत सुंदर होता है, जो आगरा स्थित ताजमहल के निर्माण में प्रयुक्त हुआ था। राजस्थान के अनेक भागों में विभिन्न वर्णों एवं विभिन्न आकार के कणों द्वारा निर्मित्त संगमरमर प्राप्त होता है। इसके प्राप्तिस्थान जोधपुर, जयपुर, उदयपुर, तथा अलवर आदि हैं।

मद्रास के कोयंबूटर तथा मैसूर के चितालद्रुग और मैसूर जिलों में भूरे श्वेत वर्ण का संगमरमर मिलता है। कुछ निक्षेप सेलम, मदुराई तिरुनेलवेली जिलों में भी हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर, बेतूल और छिदवाड़ा तथा महाराष्ट्र के नागपुर तथा सिवनी जिलों में भी संगमरमर के उपयोगी निक्षेप प्राप्त हुए है। बड़ौदा से सुंदर हरा, गुलाबी तथा श्वेत, रीवाकंठ से काला, आंध्र में कुर्नूल जिले से पीत-हरा तथा पीला एवं कृष्णा तथा गुंटूर जिलों की नारंगी विरचनाओं से लेकर पीत-समुद्रीहरा आदि वर्णों तक के संगमरमर मिले हैं।

स्लेट पत्थरसंपादित करें

बाह्य हिमालय के कुमाऊँ, गढ़वाल, काँगड़ा तथा चंबा आदि में स्लेट पत्थर का खनन किया जाता है तथा इसको घरों की छतों के निर्माणकार्य में प्रयोग किया जाता है। धोलाधर श्रृंखला का स्लेट पत्थर अत्यंत उपयोगी है तथा विविध आकारों में प्राप्त होता है। यहाँ स्लेट के पत्थर पूर्णतया शुद्ध सिलिकीय शिला (siliceous rock) के रूप में मिलता है, जिसका वर्ण पीला भूरा है। काँगड़ा घाटी स्थित पंजाब के धर्मशाला जिले में कुनपारा नामक स्थान पर स्लेट का खनन होता है। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की चिचोट तहसील में तथा पांडोह के समीप भी स्लेट पत्थर निकाला जाता है। पूर्वी पंजाब के गुड़गाँव जिले में रेवाड़ी के पास भी खनन कार्य किया जाता है। कुछ स्लेट पत्थर बिहार के सिंहभूम और मुंगेर जिलों में भी हैं, किंतु इनका अधिक उपयोग नहीं होता। आंध्र के कुर्नूल जिले में मरकापुर नामक स्थान पर स्कूल स्लेट का खनन किया जाता है। नेल्लोर जिले में भी स्लेट के कुछ निक्षेप हैं।

विभिन्न वर्गों का स्लेट पत्थर महाराष्ट्र, कश्मीर, मध्य प्रदेश, मैसूर तथा असम आदि प्रदेशों में प्राप्त होता है।

भवननिर्माण के अन्य पत्थरसंपादित करें

ग्रैनाइट, बेसाल्ट, चारनोकाइट तथा अन्य अनेक शिलाएँ भारत के विभिन्न भागों से मिलती हैं तथा सुविधानुसार खनन स्थानों के समीप के क्षेत्रों में ही इनका प्रयोग भवन निर्माण के कार्यों में किया जाता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें