गोरखा

नेपाली क्षत्रिय

गोरखा (नेपाली: गोरखाली) नेपाल के लोग हैं।[1] जिन्होने ये नाम 8 वीं शताब्दी के हिन्दू योद्धा संत श्री गुरु गोरखनाथ से प्राप्त किया था।[2] उनके शिष्य बप्पा रावल ने राजकुमार कलभोज राज/राजकुमार शैलाधिश को जन्माया था, जिनका घर मेवाड़, राजस्थान (राजपुताना) में पाया गया था। बाद में बप्पा रावल के वंश सुदूर पूर्व के तरफ बढ़ें और गोरखा में अपना राज्य स्थापित किया और बाद में उन्होने नेपाल अधिराज्य को स्थापित किया। उस वंश में चितौड़गढ़ के मनमथ राणाजी राव के पुत्र भूपाल राणाजी राव नेपाल के रिडी पहुंचे। [3] गोरखा जिला आधुनिक नेपाल के 75 जिलों में से एक है।

गोरखा
भारतीय सेना की 5वीं गोरखा राइफल्स (फ्रंटियर फोर्स) की दूसरी बटालियन के गोरखा रेजिमेंट के सैनिक 2013 में अमेरिकी सेना के 82वें एयरबोर्न डिवीजन के सैनिकों के साथ काम कर रहे थे।
कुल जनसंख्या
30,666,598 (2022 estimate)
विशेष निवासक्षेत्र
Nepal · Sikkim · Darjeeling · Assam · Dehradun
भाषाएँ
Nepali
धर्म
Hinduism · Buddhism · Kirant Mundhum · Christian
सम्बन्धित सजातीय समूह
Burmese Gorkha · Indian people · Nepali people · Sikkimese people
यह लेख गोरखा या गोरखाली लोगों के बारे में है, अन्य प्रयोग के लिए देखें गोरखा (बहुविकल्प)
गोरखा के राजा पृथ्वीनारायण शाह क्षेत्री जो बादमें नेपाल के शासक बनगए, जिसके सैनिक गोरखाली कहलाते हैं
इंग्लैण्ड के रक्षा मंत्रालय के बाहर स्थापित एक गोरखा की मूर्ति,हॉर्स गार्डस अवेन्यु, वेस्टमिन्सटर शहर, लण्डन.

खास्तोर्पे नेपाल के पश्चिम के पहाडी जातिया जैसे कि छेत्री ( क्षत्रिय ([[पहाडी लडाकु गोर्खालि जातिया (खस क्षेत्री और खस ठकुरी) और पूर्व से किरात जातिया होति हैं। गोरखाली लोग अपने साहस और हिम्मत के लिए विख्यात हैं और वे नेपाली आर्मी और भारतीय आर्मी के गोरखा रेजिमेन्ट और ब्रिटिश आर्मी के गोरखा ब्रिगेज के लिए भी खुब जाने जाते हैं। गोरखालीयों को ब्रिटिश भारत के अधिकारियों ने मार्शल रेस की उपाधि दी थी। उनके अनुसार गोरखाली प्राकृतिक रूप से ही योद्धा होते हैं और युद्ध में आक्रामक होते हैं, वफादारी और साहस का गुण रखते हैं, आत्म निर्भर होते हैं, भौतिक रूप से मजबूत और फुर्तीले, सुव्यवस्थित होते हैं, लम्बे समय तक कड़ी मेहनत करने वाले, हठी लड़ाकू, मिलेट्री रणनीतिके होते हैं।

गोरखाके प्रसिद्ध सेनापति एवम् काजी (मन्त्री) कालु पांंडे क्षत्रीय खुकुरी के साथ, उनका देहान्त कीर्तिपुरमें हुआ

ब्रिटिश भारतीय आर्मी में इन "मार्शल रेसेज़" को भारी मात्रा में भर्ती किया गया था। भारतीय आर्मी के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल सैम मानेकशॉ ने एक बार प्रख्यात रूप से कहा था:-

If a man says he is not afraid of dying, he is either lying or is a Gurkha.

अर्थात: "यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता, वह या तो झूठ बोल रहा है या गोरखा है।"[2]

4th Gurkha Rifles. Rearguard Action, 1909

अंग्रेजों ने अपनी फौज में 1857 से पहले ही गोरखा सैनिकों को रखना आरम्भ कर दिया था। 1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इन्होंने ब्रिटिश सेना का साथ दिया था क्योंकि उस समय वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए अनुबंध पर काम करते थे। महाराजा रणजीत सिंह ने भी इन्हें अपनी सेना में स्थान दिया। अंग्रेजों के लिए गोरखों ने दोनों विश्वयुद्धों में अपने अप्रतिम साहस और युद्ध कौशल का परिचय दिया। पहले विश्व युद्ध में दो लाख गोरखा सैनिकों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से लगभग 20 हजार ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की। दूसरे विश्वयुद्ध में लगभग ढाई लाख गोरखा जवान सीरिया, उत्तर अफ्रीका, इटली, ग्रीस व बर्मा भी भेजे गए थे। उस विश्वयुद्ध में 32 हजार से अधिक गोरखों ने शहादत दी थी। भारत के लिए भी गोरखा जवानों ने पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हुई सभी लड़ाइयों में शत्रु के सामने अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया था। गोरखा रेजिमेंट को इन युद्धों में अनेक पदको़ व सम्मानों से अलंकृत किया गया, जिनमें महावीर चक्र और परम वीर चक्र भी शामिल हैं।[2]

वर्तमान में हर वर्ष लगभग 1200-1300 नेपाली गोरखे भारतीय सेना में शामिल होते है। गोरखा राइफल्स में लगभग 80 हजार नेपाली गोरखा सैनिक हैं, जो कुल संख्या का लगभग 70 प्रतिशत है। शेष 30 प्रतिशत में देहरादून, दार्जिलिंग और धर्मशाला असम आदि के स्थानीय भारतीय गोरखे शामिल हैं। इसके अतिरिक्त रिटायर्ड गोरखा जवानों और असम राइफल्स में गोरखों की संख्या करीब एक लाख है।[2]

  1. "Gurkhas form the major population group in Nepal." Debnath, Monojit; Tapas K. Chaudhuri
  2. "गोरखों के बिना कैसी लगेगी फौज?". नवभारत टाईम्स. 1 मार्च 2014. मूल से 26 मार्च 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2014.
  3. "संग्रहीत प्रति". मूल से 26 जून 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 25 जून 2017.