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जैमिनी ज्योतिष ऋषि जैमिनी की देन है। जैमिनि ज्योतिष में मुख्य रूप से फलित करने के लिये कारक, राशियों की द्रष्टियां, राशियों कि दशाओं, तथा दशाओं का क्रम भी (सव्य, अपसव्य) हो सकता है। इसके साथ ही दशाओं की अवधि भी स्थिर नहीं है, यह बदलती रहती है। जैमिनी ज्योतिष में इसके अतिरिक्त फलित के लिये कारकांश का प्रयोग किया जाता है। जैमिनि ज्योतिष में पद या आरुढ लग्न भी फलित का एक महत्वपूर्ण भाग है।

जैमिनी ज्योतिष कारक जैमिनी ज्योतिष सात कारको पर आधारित है। इन कारकों में राहू-केतु को छोडकर, अन्य सभी सात ग्रह अपने- अपने अंश -कला-विकला के अनुसार अवरोही क्रम में निम्नलिखित सात कारक बनते है। सात कारक निम्न है। 1. आत्मकारक 2. अमात्यकारक 3. भ्रातृकारक 4. मातृकारक 5. पुत्रकारक 6. ज्ञातिकारक 7. दाराकारक हैं। इसमें आत्मकारक-शरीर, अमात्यकारक-आजीविका, भ्रातृ्कारक - भाई / मित्र, मातृ्कारक - माता, पुत्रकारक- संतान, ज्ञातिकारक- रोग/ऋण, दाराकारक- जीवन साथी का प्रतिनिधित्व करता है।

जैमिनी ज्योतिष दृष्टियां जैमिनी ज्योतिष में राशियों को दृष्टियां दी गई है। सभी चर राशियां अपने समीप की स्थिर राशि को छोडकर अन्य सभी स्थिर राशियों को देखती है। इसी प्रकार स्थिर राशियां अपने करीब की चर राशि को छोडकर अन्य सभी स्थिर राशियों को देखती है। परन्तु द्विस्वभाव राशियां केवल एक - दुसरे को देखती है।

जैमिनी ज्योतिष दशाएं जैमिनी ज्योतिष में 12 राशियों पर आधारित 12 दशाएं होती है। जैसे मेष, वृ्षभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला... अन्य इसी प्रकार

जैमिनी ज्योतिष दशाओं का क्रम इन 12 राशियों में 06 राशियों की दशाओं का क्रम सव्य व शेष 06 राशियों का क्रम अपसव्य होता है। तथा दशा अवधि अधिकतम 12 वर्ष से 1 वर्ष के मध्य हो सकती है।

जैमिनी ज्योतिष कारकांश जैमिनी पद्वति में कारकांश के माध्यम से ही फलित किया जाता है। इसमें आत्मकारक (जिस ग्रह के सर्वाधिक अंश हों) वह ग्रह नवमांश कुण्डली में जिस राशि में स्थित हो, वह राशि कारकांश कहलाती है। इसका प्रयोग महत्वपूर्ण भविष्यवाणियां करने के लिये किया जाता है।

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