झारखण्डे राय

भारतीय राजनीतिज्ञ

झारखंडे राय : जिसकी अर्थी भी चंदे से उठी..!

० एक बार मंत्री, 3 बार सांसद और 4 बार विधायक रहे इस जननेता ने आजादी के बाद भी 18 बार जेल यात्राएं की ० ब्रितानिया हुकूमत ने उन्हें 21 साल का कारवास की सजा दी थी.

"उन्हें मित्रों, परिचितों और सरकारों को चिट्ठियां लिखने का बहुत शौक था. चिट्ठियों के लिखने के उनके खास तरीके से सभी सम्मोहित हो जाते थे. उनकी चिट्ठियों में खास बात यह होती थी कि वह जिस स्थान से चिट्ठी लिखते, उस स्थान-विशेष के नाम का उल्लेख जरूर करते, जैसे यदि किसी ट्रेन में यात्रा के दौरान चिट्ठी लिख रहे हैं तो, उसमें ऊपर लिखतेंं.. " फलां ट्रेन से चिट्ठी..". ईमानदार इतना कि दिल्ली में जब निधन हुआ तो उनके शव को गांव लाने भर के पैसे नहीं थे, और बेटे अशोक को लोगो से चंदा मांग कर उन्हें अमिला लाना पड़ा. शुभचिंतकों और मित्रों ने जब उनके बैंक खातों को खंगाला तो उसमें फूटी कौड़ी तक नहीं थी. यही नहीं जिस जमीदार परिवार में पैदा हुए. 'जमीदारी प्रथा' के उन्मूलन के लिए शोषितों, मजदूरों, किसानों और वंचितों को लेकर उन्हीं जमीदारों के विरुद्ध आंदोलन किए . कामरेड जय बहादुर के बाद आजमगढ़ में वामपंथी जमीन को सींचने और ऊर्वर करने वाले इस नेता का घर आज भी खंडहर से ज्यादा कुछ भी नहीं है, जबकि वह घोसी सीट से 3 बार सांसद, 4 बार विधायक और चौधरी चरण सिंह के साथ खाद्य रसद मंत्री रह चुके था".

दरअसल, बात हो रही है सादगी और ईमानदारी का दूसरा नाम 'झारखंडे राय' की. 

गुलाम भारत में पूरब की धरती आजमगढ़ के अमिला में 1914 में जन्म लेने वाले झारखंडे राय मेधावी, क्रांतिकारी और वैचारिक छात्र भी थे. शुरुआती शिक्षा गवर्नमेंट हाइस्कूल बस्ती, जुबली हाईस्कूल गोरखपुर होते हुए उच्च शिक्षा हेतु इलाहाबाद में इविंग क्रिश्चिशन कालेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. यहाँ पर वे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी(RSP) में बड़े नेता के रूप में कार्य किया. ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए उन्होंने 8 बरस का कारावास की सजा भी भोगी. 1938 में 'पिपरीडीह ट्रेन डकैती' कर अंग्रेजी खजाना लूटने वाले कामरेड जय बहादुर सिंह, कामरेड झारखंडे राय, मुक्तिनाथ उपाध्याय, कृष्णदेव राय, जामिल अली और इश्तेयाक आब्दी में से एक थे. बताया जाता है कि लूटकांड को अंजाम देने के लिए क्रांतिकारियों के इस गुट में जो बंदूक आयी थी, वह इश्तेयाक आब्दी की थी, जो अपने पिता की चोरी से घर से लेकर भाग आए थे. बाद में यही इश्तेयाक आब्दी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हुए. इन मामलों के अतिरिक्त 'गाजीपुर हथियार षणयंत्र केस', और 'लखनऊ षणयंत्र केस' में अंग्रेजी सरकार द्वारा झारखंडे राय को कुल 21 बरस की सजा हुई, लेकिन आजादी के बाद वे इन मामलों से रिहा हो गयें. यहीं नहीं आजादी के लड़ाई का यह नायक आजादी के बाद, आजाद भारत में भी गरीबों और मज़लूमों की आवाज उठाने के लिए 18 बार जेल गया. झारखंडे राय आजीवन किसानों और मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे.पूर्वाचल के सभी जिलों में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार ही उनके जीवन का मिशन रहा. लोकसभा में उन्होंने जब भी कोई मुद्दा उठाया, वह गरीबों और किसानों से ही जुड़ा रहा.स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वह किसान सभा की गतिविधियों से सक्रियता से जुड़े. सामन्तों और ब्रिटिश शासन के खिलाफ गांव-गांव में किसानों को एकजुट किया.1939 में गाजीपुर में किसान सभा के कार्यालय से पुलिस ने प्रतिबंधित साहित्य रखने के आरोप में पकड़ लिया. 1940-41 में गाजीपुर में देवरीकांड हुआ, जिसमें झारखण्डे राय को नजरबंद कर दिया गया.उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि जमींदार परिवार की थी.इसके बावजूद उन्होंने जमींदारी उन्मूलन के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया. इसके लिए जय बहादुर सिंह व सरजू पाण्डे के साथ किसान सभा के जरिए बड़ी संख्या में किसानों को जोड़ा.आंदोलन को आगे बढ़ाया.किसानों व आम लोगों में वह काफी लोकप्रिय थे.यही वजह थी कि वह लगातार चुनाव जीतते रहे. सच कहें तो उनका पूरा जीवन ही सादगी भरा था। अपना काम खुद करना उन्हें पसंद था.यहां तक कि अपना कुर्ता-धोती भी वह खुद ही धोते थे.सूखने पर उसे तह करके तकिया के नीचे रख देते थे और एक दिन बाद उसे पहनते थे.किताबों से उन्हें बहुत लगाव था.काम करने के बाद मिलने वाला समय किताबों को देते थे.क्रान्तिकारियों पर कुछ किताबें भी लिखी थीं. जो इतिहास और राजनीति पर आधारित थी. उनमें से प्रमुख रूप से 'अगस्त विद्रोह', 'क्रांतिकारी जनवादी', 'भूमि सुधार और भूमि आंदोलन', 'गोपालन के नाम खुला पत्र', 'क्रांतिकारियों के संस्मरण', 'पंतशाही को चुनौती', 'भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन: एक विश्लेषण', तथा 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस' आदि थीं. इतना ही नहीं वह कार्यकर्ताओं को किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी करते थे. 67 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में जब उन्हें खाद्य मंत्री बनने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने गन्ना किसानों को लाभ दिलाने के लिए पूर्वाचल में चीनी मिलों की स्थापना का प्रयास किया। किसानों को अधिक से अधिक गन्ने की खेती के लिए प्रेरित किया. इस समय के लोग उनके चीनी को लेकर पूर्वांचल को प्रोत्साहित करने पर प्रायः चाय खानों और दुकानों पर जाकर बोलते सुने जाते कि- भाई! झारखंडी चाय पिलाओ.' आखिर यह 'झारखंडी चाय' क्या थी.? दरअसल ईख वाले इस पूर्वी पट्टी में तूरपीन से राब यानि चीनी बनाने का चलन शुरू हुआ था. प्रायः बड़े दुकानदारों या बनियों के यहां यह मशीन रहती थी. चीनी बनाने की विधियों का तेजी से इस्तेमाल होना शुरू हुआ था- जिसको लेकर लेकर चाय में गुड़ या राब के स्थान पर चीनी का प्रयोग शुरू हुआ था. इस लिए इस चाय को झारखंडी चाय कहा गया. दिग्गज कम्युनिस्ट नेता जयबहादुर सिंह के निधन के बाद पूर्वाचल में लाल झण्डे की कमान उनके हाथ में आ गई थी.

लखनऊ में पेपर मिल कॉलोनी में रहते थे तो बिना किसी तामझाम के लोगों से मिलते थे.लोगों की मदद करने में वे कोई संकोच नहीं करते थे.उन्होंने कभी भी उसूलों से रत्ती भर समझौता नहीं किया. यही कारण है की चौधरी चरण सरकार में भूमिहीनों को भूमि वितरण में उनके विचारों से विभिन्नता होने पर सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.18 मार्च 1987 को यह जननेता भारत माता की गोद में हमेशा हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया.

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