टेट्रोड (tetrode) या चतुराग्र एक निर्वात नली है जिसमें चार सक्रिय एलेक्ट्रोड होते हैं। प्रायः दो कंट्रोल ग्रिडों वाले निर्वात नलियों को ही 'टेट्रोड' कहते हैं।। इसमें ट्रायोड (त्रिअग्र) में मौजूद तीन एलेक्ट्रोड तो होते ही हैं, इनके अतिरिक्त एक 'स्क्रीन ग्रिड' (आवरण ग्रिड) भी होती है जिसके कारण इसके गुण टेट्रोड से काफी अलग होते हैं।

टेट्रोड का एलेक्ट्रॉनिक प्रतीक

उच्च आवृत्ति-प्रवर्धन-क्रिया में त्रिध्रुवी के प्रयोग से यह हानि होती है कि पट्टिक और ग्रिड के बीच के मध्यध्रुवी (इंटर इलेक्ट्रोड) धारित्र (कपैसिटेंस) के कारण दोनों के परिपथ युग्मित हो जाते हैं। इस कारण उच्च आवृत्ति पर त्रिध्रुवी का कार्य अस्थिर हो जाता है। इस युग्मन के कारण वाल्व दोलन उत्पन्न करने लगता है, जिससे बेसुरी ध्वनि आने लगती हैं। इस विघ्नकारी अंश को चतुर्ध्रुवी में धनाग्र और ग्रिड के बीच में एक और ग्रिड लगाकर दूर किया जाता है। इस ग्रिड को धन विभव पर रखते हैं। यह विभव पट्टिक के विभव से कम होता है। इस ग्रिड की उपस्थिति में धनाग्र परिपथ तथा ग्रिड परिपथ युग्मित नहीं होते और दोलन नहीं उत्पन्न होता। इस ग्रिड को आवरण ग्रिड (स्क्रीन ग्रिड) कहते हैं।

आवरण ग्रिड की उपस्थिति से एक और लाभ होता है। त्रिध्रुवी की अपेक्षा धनाग्र इलेक्ट्रान बहाव के नियत्रंण में कम सुचेतन होता है, क्योंकि आवरण ग्रिड धनाग्र की अपेक्षा ऋणाग्र के अधिक पास होने के कारण अधिक प्रभावशाली होता है। इससे प्रवर्धन बढ़ जाता है।

चतुर्ध्रुवी में त्रिधुवी के समान ही नियंत्रण ग्रिड (कंट्रोल ग्रिड) और ऋणाग्र स्थापित होते हैं। इसलिए दोनों ही नलियों में ग्रिड-पट्टिक चालकता प्राय: समान होती हैं परंतु चतुर्ध्रुवी में पट्टिक प्रतिरोध त्रिध्रुवी की अपेक्षा पर्याप्त अधिक होता है। इसका कारण, जैसा ऊपर लिखा जा चुका है, पट्टिक वोल्टता पर पट्टिक धारा का न्यूनतम प्रभाव है।

वैशिष्ट्य (कैरेक्टरिस्टिक्स)

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टेट्रोड प्लेट-वोल्टता के साथ प्लेट-धारा का परिवर्तन वक्र ; इसमे कुछ स्थानों पर वक्र नीचे झुक रहे हैं जो 'ऋणात्मक प्रतिरोध' दर्शा रहे हैं। परिपथ डिजान में इसका ध्यान रखना पड़ता है।

इन्हें भी देखें

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