मुख्य मेनू खोलें

जनभाषाओं में साहित्यसर्जन का प्रारंभ प्राय: मौखिक परंपरा के रूप में ही होता है। डोगरी में लोकसाहित्य की यह थाती काफी समृद्ध है। डोगरी संस्था के अनुशासन में उत्साही साहित्यिकों ने इस समय तक से 500 से अधिक लोकगीत इकट्ठे किए हैं। इन गीतों में भाव तथा संगीत दोनों दृष्टियों से अभिनंदनीय कलात्मकता तथा विविधता है। डोगरों के सामाजिक जीवन की बहुरंगी प्रतिक्रया इनमें अत्यंत सजीव होकर व्यक्त हुई है। डोगरी संस्था की त्रैमासिक पत्रिका (नई चेतना) के प्रत्येक अंक में पाँच-पाँच लाकगीत छपते रहे हैं। संस्था ने ही विवाह संबंधी गीतों के एक संग्रह खारे मिट्ठे अत्थरूं नाम से प्रकाशित किया है। डॉ॰ कर्ण सिंह द्वारा संपादित एक डोगरी लोकगीत संग्रह (अंग्रेजी हिंदी अनुवाद तथा गीतों की मौलिक स्वरलिपि सहित) शैडो ऐंड सनलाइट नाम से ऐशिया पाब्लिशिंग हाउस बंबई द्वारा प्रकाशित किया गया है।

रियासत की कल्चरल अकैडमी भी इन लाकगीतों का संग्रह करने में योग दे रही है।

इसी तरह डोगरी लोककथाओं के संग्रह के लिये भी प्रयत्न हुए हैं। इस समय तक तीन संग्रह छप चुके हैं:

1. डोगरी लोककत्था (संपा॰ श्री बंशीलाल)

2. इक हा राजा (संपा॰ रामनाथ शास्त्री)

3. नमियाँ पौंगरा (संपा॰ अनंतराम शासी)

दूसरे वर्ग की उपलब्ध पूँजी परिणाम में नगणय होकर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस वर्ग के ज्ञात कवि ये हैं-

1. कवि देवीदिता (या कवि दतु - रचनाकाल 1750 ई॰) दत्त् मुख्यतया ब्रजभाषा के कवि थे। उनके ब्रजभाषा में लिखित "वीरविलास", "बारहमासा" तथा "ब्रजराज पंचासिका" नाम की रचनाएँ उपलब्ध हुई हैं। डोगरी में उनके कुछ फुटकर पद्य भी उपलब्ध हुए है।

2. पं॰ गंगाराम (सन् 1777ई॰- 1858ई॰)

इक्के गल्ल सच्चै दीसै, लाड़िया गलाई दित्ती,
सबने थे कच्चा लोको, कंडिया दा बस्सना
(सच्ची बात तो बस घर की बहू ने कह दी है कि- ए लोगों, कंडी के प्रदेश का निवास सबसे बुरा है।)- एक डोगरी कविता का अंश)

3. ला॰ रामधन (मृत्यु 1900 ई॰ के लगभग)

दिक्खी लै रामघना, प्रीतै दी रीतै गी,
लटकना कच्चिया तंदे कन्ने। (एक लंगी डोगरी कविता का अंश)
हे रामघन, प्रेम की इस रीति को देखो जिसमें प्रेमियों को मानों कच्चे धागे पर लटकना पड़ता है।)

नई चेतना के इस तीसरे चरण का प्रारंभ हरदत्त जी की काव्य साधना से हुआ। इनका जन्म सन् 1890 तथा मृत्यु 1956 में हुई। आप जनकवि थे तथा आपकी डोगरी काव्यसाधना डुगर की दरिद्रता तथा रूढिग्रस्तता की वेदना से अनुप्राणित है।

कियां गुजारा तेरा होगा, ओ डोगरेआ देसा।
(कैसे गुजारा तुम्हारा होगा, ऐ डोगरे देस !)

हरदत्त ने डोगरी कविता के प्रति लोकरुचि को जगाया। वे सुधारवादी थे, हास्य-व्यंग्य के प्रयोग में कुशल। डोगरी में इनके लगभग 100 मुक्तक प्रकाशित हुए।

हरदत्त जी ने इस काव्यसाधना को अकेले ही प्रारंभ किया परंतु 1940 ई॰ के अनंतर इस क्षेत्र में दूसरे साधकों ने भी प्रवेश किया और शनैः शनैः डोगरी काव्यसाधना, इस धरती की सांस्कृ तिक नवचेतना को वाणी देनेवाला बड़ा जोरदार आंदोलन बनकर उमड़ पड़ी। इस नवचेतना में प्रारंभिक प्रधान स्वर, अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक परंपरा की अनुरक्ति तथा जातीय गौरवभावना से मुखरित हुए। इस प्रवृति में क्रमश्: आवेश की उग्रता कोमल होती गई और सांस्कृतिक आलोक की स्निग्वता उत्तरोत्तर बढ़ती गई, जिसने आगे चलकर मानवता की मूल आकांक्षाओं की विशाल परिधि में प्रवेश पाने की उत्सुकता कारूप धारण किया।

डोगरी कविता में गत पाँच-छः दशकों (की सीमित अवधि) में भावविकास के साथ साथ कलाप्रयोगों की विवधिता भी दर्शनीय है। डोगरी कवियों की रचनाओं में हमें जो विषय प्रमुख दिखाई देते हैं वे हैं डुग्गर की हीन दशा पर वेदना, डुग्गर के अतीत के प्रति गौरवभाव, डुग्गर की सांस्कृतिक उपलब्धियों (विशेष रूप से पहाड़ी चित्रकला तथा पहाड़ी संगीत) की प्रशस्ति, डुग्गर की निर्धनता और पिछड़ेपन पर रोप, डुग्गर का प्राकृतिक सौंदर्य, डुग्गर के सुंदर भविष्य की कल्पना, युद्ध और शांति, शोषण की भर्त्सना, भारत की महानता, लोकतंत्र का अभिनंदन, मानवता की विजयाशा, जीवनदर्शन की व्यावहारिक व्याख्या आदि। इसी तरह डोगरी कविता के कलापक्षीय प्रयोगों में भी विकास की झलक बड़ी स्पष्ट होकर प्रकट हुई है। डोगरी के पास अपने छंद ववही थे जो उसके लाककाव्य के विविध अंगो में प्रयुक्त हुए हैं। प्रारंभ में इन्हीं छंदों का प्रयोग हुआ, विशेष रूप से गेय पदों मे। इसके अनंतर लेखक, हिंदी उर्दू तथा पंजाबी से प्रभावित होकर इन भाषाओं के छंदों का भी सहज ही प्रयोग करने लगे। हिंदी के कवित्त, सवैया, दोहा, कुंडलिया आदि छंदों के प्रयोग किए गए। उर्दू छंदों की गतिमयता ने कवियों को अधिक प्रभावित किया। मुक्तकों में कवियों का छंदप्रयोग प्राय: लय तथा गति को ही कसौटी बनाकर होता रहा। छंदों के विषय में अभी तक काई मौलिक अध्ययन नहीं हुआ, परंतु नए नए प्राग लगातार चल रहे हैं। उर्दू की गजल, किता, रुवाई आदि के प्रयोगो की प्रवृति में स्थानीय उर्दू कविसंमेल्लनों का स्पष्ट प्रभाव लक्षित हाता है।

गद्य साहित्य (नया साहित्य)संपादित करें

कथा उपन्याससंपादित करें

डोगरी साहित्यजीवन का उषाकाल यद्यपि काव्य की अरुणिमा लेकर प्रकट हुआ तथापि उसके स्थिर विकास के लिये जो गद्यसाधना अपेक्षित थी, वह अनुकूल परिस्थिति में प्रत्यक्ष होने लगी। जैसे पद्य के क्षेत्र में नवोन्मेप हरिदत्त की साधना से हुआ, उसी तरह गद्य के क्षेत्र में कथालेखक के रूप में भगवत प्रसाद साठे अग्रणी हैं।

इस समय तक डोगरी में ये प्रमुख कहानीसंग्रह प्रकाशित हुए है:

1. कुड़ में दा लाहमा (समधियों का उलाहना) श्री भगवतप्रसाद साठे

2. सूई तागा कुमारी ललिता महता

3. कीलें दियाँ लीकरां (कोयले की रेखाएँ) श्री नरेंद्र खजूरिया

4. खीरला मानु (अंतिम मानव) श्री मदन मोहन शर्मा

5. काले हथ (काले हाथ) श्री वेद राही

6. चाननी (चांदनी) श्री मदनमोहन

7. पैरें दे नशान (पाँव के निशान) श्री रामकुमार अबरोल

8. रोचक कहानियाँ (बच्चों के लिये) श्री नरेंद्र खजूरिया

9. फुल बनीगे ंोर (फूल बन गए अंगोर) श्री रामकुमार अबरोल

10. उच्चियाँ धारां (ऊँची पर्वतमालाएँ) श्री धर्मचंद्र प्रशांत

11. इक्की कहानियाँ (टैगोर की इक्कीस कहानियों का डोगरी रूपांतर - श्री वेद राही)

उपन्याससंपादित करें

1. शान्ते (सामाजिक) श्री नरेंद्र खजूरिया

2. धारां ते धूड़ां (पर्वतमालाएँ और धुंध) श्री मदनमोहन शर्मा

3. हाड़ बेड़ी दे पत्तप (सामाजिक) श्री वेद राही

4. रूकमणी (सामाजिक) श्री धर्मचंद्र प्रशांत

5. वादियाँ वीराने (मूल उर्दू से स्वयं लेखक श्री ठाकुर पुंछी द्वारा डोगरी में रूपांतरित)

नाटकसंपादित करें

डुग्गर में रंगमंच की परंपरा केवल फ़ रामायणफ़ के वार्षिक प्रदर्शन तक ही सीमित थी। इस नव सांस्कृतिक चेतना ने रंगमंच के लोकप्रिय साधन का भी सफलतापूर्वक प्रयोग किया। इसके लिये नई परिस्थिति की अपेक्षाओं के अनुकूल नए नाटक लिखे गए-

1. नयाँ ग्राँ (नया गाँव) ले॰ रामनाथ शास्त्री, दीनु भाई और रा॰ कु॰ अवरोल (लगभग 50 बार खेला गया)

2. सरपंच (ऐतिहासिक नाटक) ले॰ दीनू भाई पंत

3. अस भाग जगाने आले आं ले॰ नरेंद्र खजूरिया

4. देव का जन्म (पौराणिक) श्री ध॰ च॰ प्रशांत

5. देहरी (सामाजिक) श्री रा॰कु॰ अबरोल

6. धारें दे अत्थरूं (, ) श्री वेद राही

निबंध तथा गद्यानुवादसंपादित करें

1. त्रिवेणी (साहित्यिक निबंध) श्रीमती शक्ति शर्मा एम॰ए॰, श्री श्यामलाल बी॰ए॰

2. बाल भागवत (अनुवाद) श्रीमती शक्ति शर्मा एम॰ए॰, श्री श्यामलाल बी॰ए॰

3. पंचतंत्र (संक्षिप्तानुवाद) श्री अनंतराम शास्त्री

4. गीता (अनुवाद) श्री गौरीशंकर

5. दुर्गा सप्तशती (मूल सहित, डोगरी अनुवाद) स्व॰ श्री कृपाराम शास्त्री

व्याकरण कोशसंपादित करें

1. डीगरी कहावत कोश श्री तारा स्मैलपुरी

2. डोगरी भाषा और व्याकरण श्री बंसीलाल गुप्त (अप्रकाशित)

लोकसाहित्यसंपादित करें

1. डोगरी लोक कत्थां (तबी प्रकाशन, नई दिल्ली) संपा॰ श्री बंशीलाल गुप्त एम॰ए॰

2. इक हा राजा (लोककथाएँ) डोगरी संस्था, जम्मू, संपा॰ रामनाथ शास्त्री

3. खारे मिट्ठे अत्थरूं (लोकगीत) संपा॰ सुशीला सलाथिया

4. Sunshine and Shadow (लोकगीत) डॉ॰ कर्णसिंह

5. नमियाँ पौंगराँ (धर्मस्थानों की कथाएँ) डोगरी मंउल, जम्मू

6. अमर बलिदान (लोक काव्यात्मक गाथा का गद्यरूप), ,

पत्रपत्रिकाएँसंपादित करें

1. नई चेतना (त्रैमासिक) केवल चार अंक प्रकाशित हुए।

2. रेखा (द्विमासिक) चार अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

फुटकल रचनाएँसंपादित करें

1. जगदियाँ जोताँ (उूर्द) डोगरी कवियों का परिचय

2. डोगरी भाषा (16 पृष्ठों की पुस्तिका) ठा॰ रघुनाथ सिंह

3. ई॰ 1857(प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष संबंधी कविताएँ)

4. अलमस्त की चार काव्य पुस्तिकाएँ

5. सपोलिया की चार काव्यपुस्तिकाएँ

6. जम्मू प्रांत के तीन कालेजों की पत्रिकाओं (तवी, त्रिकुरा तथा द्विगर्त) के डोगरी विभाग

7. शिक्षा विभाग द्वारा प्राइमरी कक्षाओं के लिये प्रकाशित चार डोगरी रीडर- श्री रामनाथ शास्त्री

इन्हें भी देखेंसंपादित करें