ढोलकी यह महाराष्ट्र का लोकप्रिय लोकवाद्य है इसे महाराष्ट्र के लोकसंगीत का प्राण भी कहाँ जाता है | वाद्यशास्त्रीय वर्गीकरण के नुसार यह अवनद्ध वाद्य इस वर्गीकृत श्रेणी में आता है | यह वाद्य महाराष्ट्र के तमाशा, लावणी, पोवाडा, आदि लोककला प्रकारों में बजाया जाता है | ढोलकी में इस्तमाल होने वाली लकड़ी खैर,शीसम,आम और नीम की होती है | ढोलकी को दो मुह होते है जिसे बाया और चाटी कहते है, चाटी को तबले जैसी श्याही लगी होती है और बाया की साईड में अन्दर की तरफ से चिकनी तेलयुक्त मिट्टी जिसे मसाला या मेनी कहाँ जाता है वो लगाते है | ढोलकी की लम्बाई कम से कम बीस इंच की होती है, चाटी की साईड का व्यास सव्वा पांच इंच और बाया की साईड का व्यास कम से कम सव्वा आठ इंच होता है |