अधिकांश व्यक्ति इस कथन से परिचित हैं कि देवनागरी लिपि सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। लेकिन जब कभी भी इस लिपि की वैज्ञानिकता की चर्चा होती है तब हिंदी का प्रखर समर्थक भी देवनागरी के पक्ष में अपनी बात को तर्को और तथ्यों से पुष्ट नहीं कर पाता। आईए! इस बात से परिचित होते हैं कि हिंदी सहित अन्य कई भारतीय भाषाओं को अभिव्यक्त करने वाली देवनागरी लिपि दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि क्यों है।

ध्वन्यात्मक लिपि

यह एक ध्वन्यात्मक लिपि है अर्थात इसमें जैसे बोला जाता है, वैसे ही लिखा जाता है। दूसरे शब्दों में इसके प्रत्येक अक्षर का जो नाम है वही उसका उच्चारण है। यथा ‘क’ का नाम व उच्चारण भी क है इत्यादि। जबकि अन्य लिपियों में ऐसा नहीं है। रोमन लिपि में अक्षर ‘H’ का नाम एच है, परंतु उच्चारण ‘ह’ होता है। ‘W’ का नाम डब्ल्यू है, परंतु उच्चारण ‘व’ होता है ‘G’ का नाम तो ‘जी’ है परंतु इसका उपयोग प्रायः ‘ग’ के लिए होता है। केवल ‘O’ के अतिरिक्त सभी अक्षरों का उच्चारण उनके नाम से पृथक है, यहां तक कि कई शब्दों में O का उच्चारण भी ‘ओ’ नहीं होता है, जैसे colour (कलर)। ग्रीक लिपि में अ उच्चारण के लिए काम लिया जाने वाला अक्षर अल्फा अ के लिए, ब के लिए बीटा , ग के लिए गामा इत्यादि अक्षर हैं। ग्रीक लिपि के अन्य अक्षरों के नाम थीटा, पाई, सिगमा, ऐप्सिलोन, लेम्डा , म्यू , फाई, साई, ओमेगा इत्यादि हैं। प्रकट है कि इन अक्षरों के नाम दो तीन या अधिक अक्षरों से उच्चारित होते हैं। अरबी लिपि में अलिफ, बे, पे, ते, से इत्यादि अक्षर हैं, जो भी एक से अधिक वर्णों से बनते हैं। यही स्थिति, भारतीय मूल की लिपियों से इतर, अन्य लिपियों की भी है।

एक अक्षर-एक उच्चारण

इस लिपि की दूसरी विशेषता यह है कि यहां किसी भी अक्षर का एक ही उच्चारण है और साथ ही एक उच्चारण के लिए एक ही अक्षर है। अर्थात इस लिपि में ऐसी अव्यवस्था नहीं है कि किसी अक्षर का उच्चारण एक शब्द में तो एक प्रकार का हो और दूसरे शब्द में दूसरे प्रकार का हो। इसी प्रकार ऐसी अव्यवस्था भी नहीं है कि किसी उच्चारण के लिए एक शब्द में तो एक अक्षर का प्रयोग का हो और दूसरे शब्द में दूसरे प्रकार का हो। यह अव्यवस्था भी नहीं है कि किसी उच्चारण के लिए एक शब्द में तो एक अक्षर का प्रयोग किया जाए, जबकि उसी उच्चारण के लिए दूसरे शब्द में किसी अन्य अक्षर का प्रयोग कर लिया जाए अथवा एक ही शब्द में एक ही उच्चारण के लिए भिन्न-भिन्न अक्षरों का प्रयोग कर लिया जाए। अक्षरों के एक समूह (शब्द) का सदैव एक ही उच्चारण होगा। उदाहरण के लिए रोमन लिपि में ‘व’ के उच्चारण के लिए कभी ‘V’ का और कभी ‘W’ का अक्षरों का प्रयोग किया जाता है। यहां तक कि एक ही शब्द ‘Vowel’ (वोवेल) में प्रथम बार ‘व’ के लिए ‘V’ का तथा द्वितीय बार ‘ब’ के लिए ‘W’ का प्रयोग किया जाता है। अक्षर ‘C’ कभी ‘क’ के लिए Camel (कैमल) तो कभी ‘स’ Call (सैल) के लिए प्रयुक्त होता है। सामान्यतः ‘Ch’ का उपयोग ‘च’ के लिए होता है, किंतु Chemistry (कैमेस्ट्री), Chlorine (क्लोरीन) जैसे अनेक शब्दों में ‘Ch’ का प्रयोग ‘क’ के लिए हो जाता है। रोमन लिपि में Read भी रैड है और Red भी रैड है। Right भी राइट है तथा Write भी राइट है। रोमन लिपि में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, कहां तक गिनाएं।

मात्राओं द्वारा व्यंजनों का सुनिश्चित परिवर्तन

देवनागरी लिपि की एक अन्य विशेषता यह भी है कि इसमें व्यंजनों पर केवल मात्रा लगाने मात्र से उनका उच्चारण परिवर्तित हो जाता है, कोई अन्य अक्षर नहीं लिखना पड़ता है। साथ ही प्रत्येक मात्रा प्रत्येक व्यंजन के साथ सभी समय एक ही प्रकार का परिवर्तन हो जाता है, कोई अन्य अक्षर नहीं लिखना पड़ता है। प्रत्येक मात्रा प्रत्येक व्यंजन के साथ सभी समय एक ही प्रकार का परिवर्तन करती है, भिन्न-भिन्न प्रकार के परिवर्तन नहीं होते हैं। जैसे अंगे्रजी में Put तो पुट होता है, परंतु But बट और Cut कट ही रह जाता है, अर्थात But और Cut में ‘U’ प्रभावहीन हो जाता है। Kite काइट होता है, किंतु Sit सिट होता है। देवनागरी लिपि में ऐसा भ्रम कभी भी नहीं होता है।

मूक अक्षर नहीं होते

देवनागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर का उच्चारण होता है, कोई अक्षर उच्चारण विहीन नहीं होता है। रोमन लिपि में Light Bright में ‘Gh’ तथा Know व Knife में ‘K’ मूक अक्षर हैं। देवनागरी लिपि की ये चारों विशेषताएं तो वास्तव में सबसे गौण अर्थात सबसे कम महत्त्वपूर्ण विशेषताएं हैं। इसकी वास्तविक और मुख्य विशेषताएं तो बहुत ही अधिक वैज्ञानिक विशेषताएं हैं। वैसे देवनागरी लिपि की वैज्ञानिक विशेषताएं इतनी विस्तृत हैं कि उन्हें कुछ पंक्तियों में अथवा दो-चार पृष्ठों में व्यक्त करना एक दुष्कर कार्य है तथापि अत्यंत ही संक्षेप में उनका वर्णन निम्नानुसार किया जा सकता है।

वर्ण की अवधारणा

भारतीय मूल की लिपियों के अतिरिक्त अन्य लिपियों में अक्षर तो होते हैं, किंतु वर्ण नहीं होते हैं। केवल देवनागरी लिपि तथा भारतीय मूल की कुछ अन्य लिपियों में वर्ण की अवधारणा है। वर्ण की गहन व्याख्या एक कठिन तथा दीर्घ समय साध्य कार्य है, अतः अधिक विस्तार में न जाते हुए संक्षेप में इतना लिखना पर्याप्त होगा कि एक वर्ण एक अक्षर से छोटी इकाई है। वर्ण वस्तुतः एक मूल ध्वनि है, एक आधार ध्वनि है। एक अक्षर में एक, दो, तीन या इससे भी अधिक वर्ण हो सकते हैं, किंतु एक वर्ण में एक से अधिक अक्षर नहीं हो सकते हैं। अंगे्रजी (रोमन लिपि) के अल्फाबेट्स में ‘B’ के नाम में ‘ब्’ तथा ‘ई’, ‘C’ के नाम में ‘स्’ तथा ‘ई’ दो-दो वर्ण हैं, जबकि ‘L’ के नाम में ‘ऐ’ ‘ल्’ एवं ‘अ’ तीन वर्ण हैं इत्यादि। जबकि देवनागरी लिपि की वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर केवल एक वर्ण को प्रदर्शित करता है।

प्रत्येक वर्ण की एक सुनिश्चित ध्वनि

इसकी अगली महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक विशेषता यह है कि इसके प्रत्येक वर्ण की ध्वनि एक सुनिश्चित ध्वनि है। ध्वनि भौतिकी (sound physics) की दृष्टि से इसके प्रत्येक वर्ण की तरङ्ग की आवृत्ति व अंतराल (frequency & pitch) लगभग निश्चित होता है, क्योंकि वह उच्चारण में उपयोग किए जाने वाले अङ्गों, उपयोग की नई श्वास की मात्रा, उच्चारण में लगने वाली अवधि तथा अन्य प्रयत्नों पर निर्भर होती है, जिस पर ध्वनि भौतिकी के वैज्ञानिकों द्वारा विस्तृत शोध किया जाना चाहिए। अपनी इस विशेषता के कारण ही यह श्रव्य सङ्गणक (audio computer) एवं श्रव्य मुद्रक सङ्गणक (audio printer computers) अर्थात केवल सुनकर मुद्रण करने वाले कम्प्यूटर्स के लिए श्रेष्ठ लिपि है। सूचना प्रौद्योगिकी (Infromation Technology) के विशेषज्ञों से इस क्षेत्र में विशेष प्रयत्न किए जाने की अपेक्षा है।

विश्व की समस्त भाषाओं को शुद्धतापूर्वक व्यक्त करने की क्षमता

देवनागरी लिपि की एक अन्य विशेषता यह है कि इसकी मूल वर्णमाला में संस्कृत के समस्त शब्दों के शुद्धतापूर्वक उच्चारण करने की क्षमता थी, परंतु देश, आहार (खान-पान), जलवायु व अन्य परिस्थितियों के कारण अन्य भाषाओं में कुछ ऐसे उच्चारण व्याप्त हैं, जिनको हम मूल वर्णमाला के वर्णों के माध्यम से व्यक्त नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार देवनागरी लिपि संसार के किसी भी कोने में प्रयोग की जाने वाली भाषा के उच्चारणों को शुद्धतापूर्वक व्यक्त करने में सक्षम लिपि है। इसलिए वैश्वीकरण के इस युग में अंतर्जाल ( Internet) के लिए यह सर्वोत्तम लिपि सिद्ध हो सकती है। मैं सूचना प्रौद्योगिकी (Information technology) के विशेषज्ञ मेरे भाई-बहनों से विनम्र प्रार्थना करता हूं कि यदि उनमें स्वदेश के प्रति किंचित मात्र भी पे्रम है तो उन्हें देवनागरी लिपि को अंतर्जाल की मूल लिपि बनाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा करके वे न केवल अपने देश का गौरव बढ़ाएंगे अपितु संपूर्ण विश्व को एक करने के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाकर अविस्मरणीय ख्याति भी प्राप्त करेंगे।

वर्णमाला में प्रत्येक वर्ण का विज्ञान सम्मत सुनिश्चित स्थान

इस लिपि की ऊपर वर्णित विशेषताओं से भी अधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी वर्णमाला में प्रत्येक वर्ण द्वारा पाए जाने वाला स्थान है। इसकी वर्णमाला में प्रत्येक वर्ण को उसके उच्चारण में प्रयोग किए जाने वाले अङ्गों के विभिन्न प्रकार के प्रयत्नों के आधार पर स्थान दिया गया है और इसे ध्वनि भौतिकी की भाषा में कहा जा सकता है कि देवनागरी लिपि की वर्णमाला में प्रत्येक वर्ण को उसकी तरङ्ग की आवृत्ति और अंतराल के आधार पर स्थान दिया गया है। इसकी वर्णमाला में किसी भी वर्ण का स्थान सुनिश्चित है, अर्थात वह परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। उदाहरणार्थ ‘अ’ के पश्चात ‘आ’ क्यों आया, ‘आ’ के पश्चात ‘इ’ क्यों आई और ‘ई’ क्यों आई? इसी प्रकार ‘क’ के पश्चात ‘ख’ क्यों आया, ‘ख’ के पश्चात ‘ग’ क्यों आया? ‘प’ के पश्चात ‘फ’ क्यों आया? इत्यादि। इन सबके पीछे इतने ठोस वैज्ञानिक आधार हैं, जिन्हें हम अपनी इच्छानुसार परिवर्तित नहीं कर सकते हैं।

         -त्रिलोक र. राठीराजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर