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उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, मेलों और त्यौहारों का हिस्सा है। मेले और त्यौहार बडे़ उत्साह के साथ निरन्तर रूप से मनाये जाते है। मेले और त्यौहार यहाँ के स्थानीय लोगों के आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध करते है। बहुत से मेले और त्यौहार भिन्न प्रकृति और रंगो के है। गढवाल को त्यौहारों की भूमि कहा जाता है। कुछ मेले जो पूरी तरह से क्षेत्र में लोकप्रिय है वें है-:

झण्डा मेलासंपादित करें

यह इस क्षेत्र के सबसे लोकप्रिय मेलो में से एक है जो हिन्दू, सिख और मुस्लिम संस्कृति को प्रदर्शित करता है और स्पष्ट रूप से बहुसंख्यक प्रकृति का प्रतीक है। वार्षिक झण्डा मेला गुरू रामराय जो दून घाटी में सातवें सिख गुरू हर राय के सबसे बडे़ बेटे के आने से शुरू हुआ है। यह चैत्र माह की पंचमी से (होली से 5 दिन बाद) शुरू होता है, यह गुरू रामराय का जन्मदिन है। यह सम्वत् 1733 (1676 ई0) की चैत्र वदी की पंचमी को दून में उनके आगमन से है।.

प्रत्येक वर्ष देहरादून में श्री गुरू रामराय दरबार के आँगन में पवित्र मूर्ति को उठाया जाता है, जहाँ गुरू ने अपना डेरा स्थापित किया था। भक्तों का बहुत बड़ा समूह पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलो, उत्तराखण्ड तथा हिमाचल प्रदेश से लोग इस विशेष अवसर पर हिस्सा लेने आते है। भिन्न-भिन्न आयु के बच्चे औरते तथा पुरूषो के समूह इस मेले में हिस्सा लेते है, उसे संगत कहते है, एकादशी को गुरू रामराय दरबार का महन्त रायवाला हरियाणा में यमुना किनारे (45 किलोमीटर दूर) संगत को आमन्त्रित और स्वागत करने जाता है।

पवित्र मूर्ति (झण्डा जी) की पूजा की जाती है। और सुबह को नीचे उतारा जाता है। उसके पुराने वस्त्र स्कार्फ, रूमाल हटाये जाते है। मूर्ति (मास्ट) को दूध, दही और गंगा के पवित्र पानी में स्नान कराया जाता है और सजाया जाता है। मूर्ति को फिर से नये वस्त्रों स्कार्फ, रूमालों से ढका जाता है। मजबूत रस्सी में बाँध कर मूर्ति को ऊपर उठाते है। झण्डा उठाने की रस्म कुछ घण्टों तक की जाती है।

झण्डा का ऊपर उठाना आकर्षक और स्मरणीय है। महन्‍त इस रंगपूर्ण और पवित्र सजे हुऐ झण्डे को दोपहर बाद उठाता है। दरबार साहिब के सामने सरोवर (तालाब) में गोता लगाने के बाद हजारों भक्त घण्टों झण्डा साहिब के दर्शन के लिये इकट्ठा होने लगते है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों और समुदायों से इस अवसर पर लोग आमन्त्रित होते है। भिन्न-भिन्न समाज के लोग दरबार साहिब में सेवा करते है। दरबार साहिब में लोगों के खाने और सोने का प्रबन्ध किया जाता है। भोजन बनाया जाता है और भिन्न-भिन्न समुदायों की रसोइयो (लंगर) का प्रबन्ध किया जाता है। लंगर के समय संगत की जाती है। महन्‍त विशेष प्रार्थना करता है। और पवित्र प्रसाद बाँटता है। दरबार साहिब का महन्त शहर के चारों ओर जलूस का नेतृत्व करता है। जिसमें हजारो भक्त उस पवित्र परिक्रमा में सम्मिलित होते है जो सप्तमी को होती है। संगत अष्टमी के दिन उनकी प्रसन्नता के लिये प्रसाद तैयार करती है। नवमी के दिन संगत का समापन किया जाता है।

झण्डा मेला जो दरवार साहिब में लगता है मुगलकाल के वैभव को प्रतिविम्बित करता है और 15-20 दिन तक चलता है। यह स्थानीय जनता को बडी संख्या में आकर्षित करता है। इस स्थान पर दुकाने, नुमायश, झुले और सभी प्रकार के मनोरंजन का आयोजन होते है। मेले में गहरें विश्वास के साथ भक्तो के द्धारा भिन्न-भिन्न स्थानों पर पूजा की जाती है।

टपकेश्‍वर मेलाः टोम नदी के पूर्वी तट पर स्थित यह ऐतिहासित स्थल इस क्षेत्र में लगने वाले सबसे प्रसिद्ध मेलों में से एक का गवाह है। दंतकथा के अनुसार यह द्रोणाचार्य का निवास हुआ करता था।

पांडवों और कौरवों के गुरु बनने से पहले द्रोणाचार्य काफी गरीब थे। वे इतने गरीब थे कि अपने पुत्र के लिए दूध की व्यवस्था भी नहीं कर पाते थे और जब उनका पुत्र दूध की जिद करता तो वे उसे भगवान शिव की उपासना करने की सलाह देते।

बच्चे की गंभीर तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया और अश्‍वस्‍थामा को शिवलिंग से बूंद-बूंद दूध मिलने लगा। चूकि अश्‍वस्‍थामा ने शिव की उपासना तपकेश्‍वर के रूप में की थी, इसलिए यह जगह तपकेश्‍वर के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक साल शिवरात्रि के अवसर पर यहां पर एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें बड़ी संख्या में लोग दूर-दराज से आते हैं।

नाट्य महोत्सवसंपादित करें

देहरादून में हर साल आयोजित किया जाने वाला नाट्य महोत्सव मई के महीने में चार दिनों के लिए होता है। इस महोत्सव में विभिन्न राज्यों के लगभग 25-30 नाट्य व लोकनृत्य दलों के कलाकार प्रस्तुतियाँ देते हैं। देहरादून के टाउन हाल में आयोजित होने वाले कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिदिन सुबह लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं व शाम को नाटकों का मंचन किया जाता है। 20 मई को राजधानी में सभी रंगकर्मी और लोककलाकार रंगयात्रा निकालते हैं। इसमें कलाकार अपनी पारंपरिक वेशभूषाओं में लोकनृत्य और झांकियों का प्रदर्शन करते हैं। इस समारोह का आयोजन आज की युवा पीढ़ी पीढ़ी को अपनी सभ्यता और लोक परंपराओं की जानकारी देने व उसके संरक्षण को जागरूक करने के उद्देश्य से किया जाता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि युवक एवं युवतियाँ इन आयोजनों में खुलकर भागीदारी करते हैं।

बिस्सू मेलेसंपादित करें

देहरादून के चकराता ब्लॉक के केंट क्षेत्र के झांडा ग्राउंड में लगने वाला यह मेला इस क्षेत्र में फसलों की कटाई के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है। यह मेला स्थानीय लोगों की खुशहाली को भी प्रदर्शित करता है। इस मेले में टिहरी, उत्तरकाशी और सहारनपुर जिलों के श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में आते हैं।

लक्ष्मण सिद्ध मेलासंपादित करें

देहरादून के आसपास स्थित चार सिद्ध पीठों में से यह एक है। इसका काफी अधिक धार्मिक महत्व है। यह मेला प्रत्येक रविवार को लगता है। लेकिन अप्रैल का अंतिम रविवार कुछ विशेष होता है जब बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्ति भाव समर्पित करने के लिए यहां आते हैं।

पुष्प प्रदर्शनीसंपादित करें

देहरादून में प्रतिवर्ष बसन्त ऋतु में पुष्प प्रदर्शन का आयोजन किया जाता है, इसका आयोजन राजभवन में उत्तराखण्ड के माननीय गर्वनर की उपस्थिति में किया जाता है। यह प्रदर्शन सन् 1993 में शुरू किया गया। इस प्रदर्शन का लाभ देहरादून को मिलता है, उत्तराखण्ड एक राज्य है जहाँ प्रकृति के दर्शन होते है और जो लोगों के जीवन का हिस्सा है। लोग निकट और दूर से उसे देखने के लिये आते है और इस प्रदर्शनी में भाग लेते है। विभिन्न किस्म के फूल इस प्रदर्शन का आकर्षण होते है और बाद के वर्षो में यह प्रदर्शित करता है कि उत्तराखण्ड में अधिक से अधिक फूल व्यापारिक दृष्टि से उगाये जाते है। और देश के बाहर बडे-बडे शहरों में बेचा जाता है।

उत्तराखण्ड महोत्सवसंपादित करें

उत्तराखण्ड महोत्सव प्रति दो वर्ष बाद देहरादून में मनाया जाता है। निकट और दूर के लोग इस महोत्सव को देखने और इसमें हिस्सा लेने के लिये आते है। कलाकार इस महोत्सव में अपनी प्रतिभाओं को प्रस्तुत करते है। कवि सम्मेलन, गीत, लोक नृत्य इस उत्सव में प्रस्तुत किये जाते है। कला, संस्कृति और परम्परागत वेशभूषा इस समारोह का प्रमुख आर्कषण होती है। झाँकी विशेष रूप से इस समारोह में सजायी जाती है जो गाँधी पार्क से शुरू होती है और रेंजर मैदान पर समाप्त होती है। यह महोत्सव सात दिन तक निरन्तर मनाया जाता है। लोग इस महोत्सव का बहुत आन्नद लेते है।

विरासतसंपादित करें

विरासत लोक जीवन भारत की कला और संस्‍कृति का त्यौहार है। संसार विभिन्न कलाओं को अपने शौकेस से निकाल कर २ सप्ताह के लिये उस उत्सव में भेजता है। विरासत इस देश की संस्कृति को दर्शाती है।

यह प्राचीन यूनान के थेबन आयोजन की तरह है। इस अन्तर्राष्टीय त्यौहार का मुख्य उदे्श्य ज्ञान और सच्ची कला के बहाव को बढा़ना है। यह प्रयास नौजवानों में बुद्धि को बढा़ने के लिये हैं कि जो पाश्चात्य जीवन के तरीके की ओर तथा भारतीयता से दूर हट रहे हैं।

इसका तात्पर्य कला और भारतीय शिल्पकला महाकाव्य, पौराणिक कथायें, दर्शन ज्ञान के लिये हैं। विरासत आठ लाख से अधिक लोगों के सम्मिलित होने को, जो लोक जीवन का आन्नद लेने के लिये आते है, आकर्षित करती है। देश के विभिन्न हिस्सो से 50000 हजार विधार्थी 15 दिन के लिये इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिये यहाँ आते है। इसका आयोजन वर्षा ऋतु के बाद और सर्दी से पहले मनाया जाता है।

वीर केसरी चंद्र मेलासंपादित करें

इस मेले का आयोजन चकराता तहसील के नागर ग्राम सभा के रामताल में मनाया जाता है। यह महान स्वतंत्रता सेनानी केसरी चंद्र को समर्पित है। प्रत्येक साल नवरात्र के दौरान यहां पर एक बड़े मेले का आयोजन महान देशभक्त के त्याग का गुणगान करने के लिए किया जाता है। इस स्थल पर केसरी चंद्र को समर्पित एक मंदिर और एक स्मारक है।

महासू देवता का मेलासंपादित करें

इस मेले का आयोजन चकाराता त्‍यूनी रोड से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर हनोल में प्रत्येक साल अगस्त में होता है। इस अवसर पर शहर में भगवान महासू का जुलूस निकाला जाता है। जौनसारी जनजाति के इस स्थानीय मेले में टिहरी, उत्तरकाशी और सहारनपुर जिलों के भी सैंकड़ों श्रद्धालु आते हैं।