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द्रविड़ शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है-

  • दक्षिण एशिया से संबंधित शब्द है: स्कन्दपुराण के अनुसार विन्ध्याचल से दक्षिण भरत का समग्र भूभाग 'पंचद्रविड' कहलाता है। प्राचीन भारत के इतिहास मे विन्ध्याचल की उत्पत्ति से ही वैदिक ब्राह्मण दो तरफ हो गये | उत्तर में औत्तरीयपथ के अनुयायी 'पंचगौड' और दक्षिण में दाक्षिणात्यपथ के अनुयायी 'पंचद्रविड'। पंचगौड में - गौड, सारस्वत, कान्यकुब्ज, मैथिल और औत्कल हैं। उसी प्रकार पंचद्रविड मे- द्रविड, कार्णाटक, तैलंग, महाराष्ट्र और गौर्जर हैं। भारतके सभी ब्राह्मण जाति इन्ही दश वर्ग में आते हैं।



द्रविड़ दलितो के ऐतिहासिक स्वरूप को समझने के लिए आर्यो के आगमन से पूर्व की समाज व्यवस्था के अंतर्गत हमे मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास पर दृष्टिपात करना होगा। इतिहासज्ञ,नृतत्ववेता और समाज शास्त्री सिंधु घाटी सभ्यता के पूर्व की आदिम समाज व्यवस्था के विकास की एक धुंधली सी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। इसमें ऐतिहासिकता कम,कल्पना और अनुमान दोनों का अधिक सम्मिश्रण है। फिर भी यह माना जा सकता है कि सरस्वती नदी के प्रवाह के प्राचीन उल्लेख और सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में मिले साक्ष्य आर्य पूर्व के द्रविड़-मूल निवासियों की सभ्यता और संस्कृति की एक स्पष्ट झलक प्रस्तुत करने में समर्थ हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत जातियों,धर्मो और विभिन्न संस्कृतियो की एक प्रयोगशाला हैं। प्राचीन काल से विदेशी मूल के लोग भारत की ओर आकर्षित होते रहे हैं,जिन्हें बाहरी या ठीक से आक्रांता भी कहा जा सकता है। इतिहासविदो,नृतत्वशास्त्रियो और समाज वैज्ञानिकों के विचार में आर्य आक्रमणकारियों से पूर्व के भागों से इस भूभाग पर बसने के लिए द्रविड़ आए। ऐसी मान्यता है कि भारत के आदिम निवासी द्रविड़-पूर्व के मूल बाशिंदे थे। इसे एक बर्बर और आदिकालीन समाज के रूप में देखा जाता था ।

सामाजिक विकास एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है इसकी प्राक्-ऐतिहासिक अवस्था में भारतीय जीवन और वैचारिकता के सूत्र निहित हैं। किसी सुदूर अंधकार युग में मानव नग्नवस्था और बर्बरता की स्थिति में जीता था। धीरे-धीरे मनुष्य ने आदिम बर्बर समाज से सभ्य समाज में जीना सीखा। प्रकृत सहजता,क्षुधा शांत करने के क्रिया-कलाप और स्वछंद यौन आचरण आदिम समाज में परिव्याप्त थे। लोगों का मानना है कि भारत के सर्वाधिक प्राचीन निवासी पुरापाषाण युगीन आदिम सभ्यता के लोग थे। जो पेड़ो और प्राकृतिक खोहो में रहते थे। धीरे-धीरे उन्होंने पर्वत की घाटियों,जंगलों एवं नदियों के तट पर पेड़ो के नीचे अपने निवास बनाए। कंद-मूल,फल खाने के साथ साथ उन्होंने वन्य पशुओं-पक्षियों,मछलियों के मांस को पकाना सिखा। इसके अलावा उन्हें और भी कई चीजें का ज्ञान हुआ परन्तु उनकी जिंदगी संगठित नहीं थी।

पुरापाषाण संस्कृति के बाद मध्यपाषाण संस्कृति का आविर्भाव व विकास हुआ। मध्यपाषाण संस्कृति के लोग शिकार करके जीवन निर्वाह करते थे। शिकार के साथ साथ खाने के लिए मछली भी पकड़ते थे। ये लोग भी जंगली फल,कंद-मूल खाकर रहते थे। डॉ.आर.सी.मजूमदार ने इन लोगों के सन्दर्भ में कहा है कि इन लोगों ने मिट्टी के बर्तन बनाना सीख लिया जो एक बड़ी उपलब्धि थी। उनका जीवन भी कठोर और संघर्षपूर्ण था।

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