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नमाज़ ए-जनाज़ा या सलात अल-जनाज़ा (अरबी: صلاة الجنازة) इस्लामिक अंतिम संस्कार प्रार्थना है; इस्लामिक अंतिम संस्कार का एक हिस्सा। मृतक और सभी मृत मुसलमानों के लिए क्षमा मांगने के लिए प्रार्थना मण्डली में की जाती है सलात अल-जनाज़ह मुसलमानों (फ़र्ज़ अल-किफाया) पर सामूहिक दायित्व है, यदि कुछ मुसलमान इसे करने की ज़िम्मेदारी लेते हैं, तो दायित्व पूरा हो जाता है, लेकिन अगर कोई भी इसे पूरा नहीं करता, तो सभी मुसलमान जवाबदेह होंगे।

हनफ़ी और मालिकी मज़हब में आम तौर पर ग़ायबाना नमाज़-ए-जनाज़ा की अनुमति नहीं है' तो हंबली मज़हब में अनुमति दी जाती है, और शाफ़ई मज़हब में सिफारिश की जाती है।

विवरणसंपादित करें

यह बेहतर है कि शरीर इमाम के सामने रखा जाए। यदि एक से अधिक शरीर हैं, तो इन्हें दूसरे के सामने रखना चाहिए। इमाम के पीछे लोग खड़े होना चाहिए। नमाज़ चुपचाप पढ़ना चाहिए। इस नमाज़ में सजदा शामिल नहीं है। सिर्फ दुआ है।

हज़रत मुहम्मद और उनके साथियों ने समझाया कि किस प्रकार नमाज़ ए-जनाज़ा अदा की जानी चाहिए, [1]

इस नमाज़ का तरीका यह है।

1. अपने दिल में उपयुक्त नियत (इरादा) करने के बाद, तकबीर पढ़ते हुवे आप अपने दोनों हाथों को उठायें, फिर अपने हाथों को नाभि के क़रीब सामान्य तरीके से रख देते हैं, बायां हाथ पर दाहिने हाथ को रखना, अल्लाहु अकबर कहना, फिर बिस्मिल्लाह पढ़ना, फिर सूरा ए-फ़ातिहा पढ़ना.

2. बाद में तकबीर और दुरूद शरीफ़ पढ़ना

3. फिर आप एक तीसरी मर्तबा तकबीर पढ़ना और मय्यत के लिए दुआ पढ़ना।

हज़रत मुहम्मद ने यह दुआ पढी थी:

"या अल्लाह, हमारे जीवित और हमारे मरे हुओं की मगफीरत कर दो, जो हमारे बीच मौजूद हैं और जो अनुपस्थित हैं, हमारे युवा और हमारे बूढ़े, हमारे पुरुषों और हमारी स्त्रीयों, या अल्लाह , जो कोई भी जीवित हैं, उन्हें इस्लाम में जीवित रखो, और हे अल्लाह, हमें इनाम से वंचित न करो और हमें भटकने से बचा लो। हे अल्लाह, इसे क्षमा करें और उस पर दया करें, उसे सुरक्षित रखें, और उसे माफ कर दो, उसके आराम का सम्मान करें और अपनी करुना के द्वार खोल दें। उसे स्वर्ग में स्वीकार करें और उसे कब्र की पीड़ा और नरक की पीड़ा से बचायें, उसकी कब्र को विशाल बनायें और उसे प्रकाश से भर दें।

4. फिर एक चौथे मर्तबा तकबीर पढ़ा जाता है। उसके बाद एक छोटा विराम होता है, फिर तस्लीम किया जाता है (अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह)

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Kitaab Majmoo’ Fataawa wa Maqaalaat Mutanawwi’ah li Samaahat al-Shaykh ‘Abd al-‘Azeez ibn ‘Abd-Allaah ibn Baaz, vol 13, p. 141