नाग और सर्प दोनों में बहुत अंतर होता है। दरअसल ये दोनों मौसेरे भाई है! amrutampatrika.com "अमृतम कालसर्प विशेषांक से प्रकाशित" साँप किसी को काट नहीं सकता। सर्प प्रजाति नि:विष अर्थात जहरीली नहीं होती।


सर्प जाति में दोमुहें सांप, केचुए, अजगर आदि माने जाते हैं। सर्पो का फन नहीं होता। सर्प किसी भी चीज को निगलता है अर्थात खाता-चबाता नहीं हैं।


सर्पों की आयु नागों की अपेक्षा कम होती है।

नाग और सर्प दोनो मौसेरे भाई हैं।

नाग की माँ कद्रू हैं एवं सर्पों की माता क्रोधवशा

हैं। दोनों खास बहिन हैं। ये 60 बहिने ब्रह्माजी के पुत्र राजा दक्ष की पुत्रियां थीं। दक्ष की इन साथ पुत्रियों में से 4 बहनों का विवाह ऋषि तार्क्ष्य कश्यप से हुआ था।

विष्णु पुराण और हरिवंशपुराण के अनुसार इनका एक नाम अरिष्टनेमिः भी बताया गया है। इनकी चार पत्नियों में से नागमाता कद्रू सबसे बड़ी और अत्यंत रूपवती थी।

महाभारत के अनुसार-

!!वव्रे कद्रू:सुतान् नागान् सहस्रं तुल्यवर्चस:!!

अर्थात माँ कद्रू में अपने पति से एक समान तेजस्वी और दिव्य नागों को पुत्र के रूप में पाने का वरदान मांगा। इस प्रकार सृष्टि के सभी नागों का जन्म कद्रू से हुआ। जब कभी किसी को नागों से भाई लगे, तो नागमाता कद्रू का स्मरण कर, नागों से जाने या पलायन का निवेदन करें।


देश-दुनिया में स्थापित माँ मनसा देवी के जो मन्दिर हैं, वह सब कद्रू का ही रूप हैं। मनसा माता ही नागों की माँ या कद्रू हैं। ये परम् शिव भक्त थीं। तुरन्त मनोकामना पूर्ति करने के कारण इन्हें मनसा माँ कहा जाता है।


हरिवंशपुराण के अनुसार-

!! काद्रवेयाश्च बलिन: सहस्त्रममि तौजस:!!

सुपर्णवशगा नागाजज्ञिरेsनेक मस्तका:।।

अर्थात-नागमाता कद्रू से बड़े-बड़े विषधारी, बलशाली, अपार तेजस्वी तथा अनेक फनों वाले एक हजार नाग उत्पन्न हुए। ये सभी नाग अपनी सगी मौसी विनता के पुत्र गरुड़ के वश में रहते थे।

ऋषि तार्क्ष्य कश्यप की 4 पत्नियों से जन्मी सन्ताने-

नागमाता कद्रु से उत्पन्न नागों के नाम-

पांच फ़ंनधारी शेषनाग, वासुकी, अनंत नाग, तक्षक, ऐरावत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापत्र, शङ्ख, कर्कोटक, धनञ्जय, महानील, महाकर्ण, घृतराष्ट्र, बालहक, कुहर, पुष्पदँष्ट, दुर्मुख, सुमुख आदि इन सभी नागों के एक हजार सिर या फन हैं।

दूसरी पत्नी विनता से अरुण और गरुड़ नाम के दो पुत्र हुए। अरुण सूर्य के सारथी तथा गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन हुए।

तीसरी पत्नी- पतंगी से हिंसक पक्षियों को छोड़कर अन्य कीड़े-मकोड़े, मच्छर, कीट-पतंगों का जन्म हुआ।

चौथी पत्नी यामिनी से सभी तरह के शलभों टिड्डी, चमगादड़, ततैया का जन्म जन्म हुआ।

केवल नागों के फन पर कोई शुभ चिन्ह स्वस्तिक या अन्य लोई धार्मिक चिन्ह मिलता है।


नाग के बारे में इस किताब में भी बहुत सी वैज्ञानिक जानकारी बताई हैं।

सर्पों की माता-क्रोधवशा—

राजा दक्ष की साथ पुत्रियों में से तेरह का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। इनमें नोवी कन्या का नाम था-क्रोधवशा। इसी से सर्पों का जन्म हुआ।

श्रीमद्भागवत के मुताबिक-

दंदशूकादय: सर्पों राजन् क्रोधवशात्मजा:६/६/२८

हे राजन! साँप, बिच्छु, कृमि, केंचुए

संक्रमण, कम विषैले जाति के जीव-जन्तु, मेढ़क, कछुआ आदि क्रोधवशा से उत्पन्न हुए।

इनकी जीवोंबकी संख्या 14000 से अधिक बताई गई है। यह सब वायु पीकर जीवित रह सकते हैं।


आचार्य चाणक्य ने सर्प को खल, दुष्ट, दुराचारी बताया है। यथा-

!सर्प:क्रूर:खल: क्रूर:, सर्पति क्रूरतर खल:!०

शिव सहस्त्र नाम अर्थात महादेव के 1008 नामों में नागों के बारह बार नाम आये हैं। सबसे क्रूर ग्रह राहु भी नागरूप में ही हैं। शिवलिंग के ऊपर फ़ंनधारी नाग होता हैं। कभी सर्प नहीं होता।

गहराई से गौर करें, तो सृष्टि में अधिकांश वस्तुएं नागों के निशान से मेल खाती हैं।


पान और पीपल का पत्ता,


कारीगरों की कन्नी-

नाग का ही फन है।

स्कंदपुराण

रावण रचित मन्त्रमहोदधि आदि

अनेक ग्रन्थों में एसी हजारों चीजों का उल्लेख हैं, जो नाग चिन्ह लिए हैं इसीलिए ही सभी देवताओं न बारम्बार नागों को नमस्कार किया है।


नाग जहरीले होते है, क्यों कि नाग ही फ़नधारी होते हैं। दुनिया में नागों के असंख्य मन्दिर और ज्योतिलिंग हैं।

सर्पों का इस सृष्टि में कोई भी मन्दिर नहीं है।

नाग ही राहु है, राहु ही शिव हैं...


केरल का मन्नारशाला शेषनाग मन्दिर

सृष्टि का सबसे प्राचीन है।

कुम्भकोणम के पास त्रिनागेश्वरम मूल ज्योतिर्लिंग, श्रीकालहस्तीश्वरा शिवालय, तिरुनल्लार शनिमंदिर के पास राहु-केतु स्वयम्भू नाग मन्दिर

आदि वैदिक कालीन हैं।


अभी तक करीब 500 से ज्यादा स्वयम्भू नाग मन्दिरों के दर्शन का सौभाग्य मुझे

मिला है। नागों की सम्पूर्ण जानकारी इसलिये दी जाएगी, ताकि हिन्दू धर्म से अज्ञानता का पलायन हो सके।

आयुर्वेद की सर्पगन्धा बूटी, गरुड़ वृक्ष की छाल और अपमार्ग जड़ी तीनों ही ओषधियाँ नाग काटने के विष को उतारने में कारगर हैं।

अमृतम पत्रिका में लगभग 3100 लेख उपलब्ध हैं। इसमें नाग, राहु, केतु, कालसर्प आदि के बारे में जान पाएंगे।


जिन्हें नागों से बहुत डर लगता हो, वे

!!ॐ आस्तिक मुनि अगस्त्येश्वराय नमः!!

का जप करते रहें। इस मंत्र को लिखकर पॉकेट में रखें, घर की दीवारों पर लगाएं

अमृतम द्वारा प्रकाशित

कालसर्प पोस्टर पास रखें।

देश के अनेक स्थानों पर नागबन्ध, नागदंश काटने के स्थान हैं। राजस्थान में तेजाजी देव, मध्यप्रदेश में बाबा हीरा भूमिया आदि स्थान हैं, जहां भादों के महीने में बंध काटे जाते हैं।

नाग ही धन की रक्षा भी करते हैं। मणिधारी नाग-इच्छाधारी नागिन उसी स्थान पर सहवास करते हैं, जिस भूमि के नीचे खजाना छुपा होता है।

नाग को ही शेषनाग कहा जाता है। यह पांच फन वाले होते हैं, जो पंचतत्व का प्रतीक हैं। सारा संसार नष्ट होने के बाद केवल नाग ही बचते हैं। नाग ही पुनः सृष्टि की रचना में योगदान देते हैं।

दुनिया में अनेकों सिद्ध नाग मन्दिर हैं, जो चमत्कारी हैं।


हिमाचल में डलहौजी के पास खजियार में लकड़ी से निर्मित नागमन्दिर अद्भुत है।

जम्मू के नजदीक पटनीटॉप के पास गवाह नाग बाबा का एक तांत्रिक नागमन्दिर है। इस स्थान पर झूठी गवाही देने पर 24 घण्टे में नाद दस लेता है। जहां से फोटो लेना ना है, लेने पर नाग आ जाते हैं। यही पर नजदीक सुध महादेव का शिवालय है, जहां त्रिशूल गढ़ा है।

त्रिनागेश्वरम ज्योतिर्लिंग में राहु रूपी नाग का जब दूध से अभोषेक होता है, तो दूध का रंग नीला हो जाता है।

दुनिया का अद्भुत और दुर्लभ शिवमंदिर, जहां सूर्यग्रहण के समय होती है शिवपूजा- ‎क्या आप दुनिया में एक मात्र राहु के शिवालय के बारे में जानते है, जहां सूर्यग्रहण के समय भी भगवान भोलेनाथ शिव का रुद्राभिषेक किया जाता है।

दक्षिण भारत में राहु के कुछ शिवालय और मंदिरों में सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण के समय तथा सूतक व दुष्काल के समय विशेष पूजा-प्रार्थना, ‎कालसर्प की शांति, अनुष्ठान आदि ‎किये जाते हैं । राहु के ‎इन तीर्थों, शिवमंदिर और शिवालय के नाम ‎इस प्रकार हैं -


5 लाख वर्ष पुराना शिवालय -- 【1】 ‎ श्री कालहस्तीश्वर मन्दिर , यह तिरुपति बालाजी से लगभग 35 km दूर है। मंदिर में सौ स्तंभों वाला मंडप है, जो अपने आप में अनोखा है। अंदर सहस्त्र शिवलिंग भी स्थापित है। श्रीकालहस्ती मन्दिर का उल्लेख शिवपुराण स्कंध पुराण तथा लिंग पुराण जैसे पुराने पुराणों में भी मिलता है। यह मंदिर राहुकाल पूजा के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इस मंदिर में श्री गणेश श्रीकृष्ण, श्री राम, लक्ष्मण, सीता, सप्तऋषि, यमराज, नाग, हाथी, शनिदेव, भगवान और कार्तिकेय द्वारा स्थापित शिंवलिंग के दर्शन कर सकते है। यहां एक पाताल गणपति का मन्दिर भी है, जो जमीन से 100 फुट गहरा है। नीचे जाने के लिए 1 फिट का जीना है। किस्सा है कि इस स्थान का नाम तीन पशुओं

- के नाम पर किया गया है। - श्री का अर्थ है मकड़ी, - काल कहते हैं नाग को और - तथा हस्ती को संस्कृत में हाथी कहा जाता है। ये तीनों ही यहां शिव की आराधना करके मुक्त हुए थे। पुराणों के अनुसार श्री यानि मकड़ी ने शिवलिंग पर तपस्या करते हुए जाल बनाया था और नाग ने शिवलिंग से लिपटकर शिव आराधना की और हाथी ने शिवलिंग को जल से स्नान करवाया था। श्लोक शिंवलिंग- महर्षि व्यास द्वारा इस शिंवलिंग पर 18 पुराण, चारों वेद का उच्चारण करते हुए रुद्राभिषेक किया था। यह मंदिर लगभग 5 km में फेला हुआ है। श्री कालहस्ती के आसपास के प्राचीन तीर्थ


इस स्थान के आसपास अनेको प्राचीन धार्मिक स्थल हैं। विश्वनाथ मंदिर, भक्त कणप्पा मंदिर, मणिकणिका मंदिर, सूर्यनारायण मंदिर, महर्षि भारद्वाज तीर्थम, कृष्णदेवार्या मंडप, श्री सुकब्रह्माश्रम, वैय्यालिंगाकोण (सहस्त्र लिंगों की घाटी), पीछे के पर्वत पर तिरुमलय स्थितहै। यहां नजदीक में दुर्गम मंदिर और दक्षिण काली मंदिर प्रमुख हैं। एक हैरान करती सच्चाई- 【2】 ‎त्रिनागेश्वरम- राहु मन्दिर जो मूल ‎नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भी है । इस मंदिर में चढ़ाया गया दूध, अपना रंग बदल लेता है। एक हैरान करती सच्चाई यह कुंभकोणम (तमिलनाडु) से 8 या 9 km है। यहां प्रतिदिन राहुकाल में शिवरूपी राहु नाग प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है। विशेष बात यह है कि जो दूध अर्पित करते है, तो वह जहरीला यानि नीले रंग का हो जाता है। जब भगवान शिव का दूध से अभिषेक किया जाता है तो दूध नीले रंग में बदल जाता है जो साफ दिखता है। यहां ईश्वर को नागनाथ स्वामी तथा माता पार्वती को गजअंबिका के नाम से जाना जाता है। राहु की हैं दो पत्नियाँ- राहु यहां अपनी दो पत्नी नागवली व नागकणि के साथ है। यहां की विशेषता यह है कि यहां राहु मानव चेहरे में है। यहां राहुदेव ने शाप से छुटने हेतु भगवान भोलेनाथ की पूजा की थी इस मन्दिर परिसर में 12 दुर्लभ पानी के तीर्थ है। जिनके नाम हैं- 1- सूर्य पुष्पकरिणी, 2- गौतमतीर्थ, ३- पराशर तीर्थ, 4- इन्द्रतीर्थ, 5- भृगुतीर्थ, 6- कन्व्यतीर्थ, 7- वशिष्ठ आदि। समय पर शादी कराता है राहु- कहते है कि राहु काल में प्रतिदिन डेढ़ घंटा दूध द्वारा राहु का अभिषेक करने से शादी समय पर हो जाती है। जिन्हें बच्चे नहीं होते उनको सन्तति मिलती है। वैवाहिक जीवन की तकलीफ दूर होती है।


तीसरा है शेषनाग शिवालय -- यहां राहुकाल में जलाए जाते हैं, हजारों दीपक ‎【3】केरल के हरिपद में ‎मन्नारशाला नागमन्दिर है यह केरल में नाग की पूजा करनेवाले सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। ‎यहां करीब 50 हजार नाग प्रतिमाएँ हैं। यह मंदिर नागराज और नागयक्षि को समर्पित है साथ ही भारत के 7 आश्चर्यों में एक है। इस मंदिर में यहां तक नजर जाती है, वहां तक केवल और केवल नाग ही दिखाई देते हैं। ‎इन सभी राहु शिवालयों में यहां प्रतिदिन राहुकाल ‎में तथा ग्रहण काल में राहुकी तेल के हजारों ‎दीप जलाकर दीपम पूजा, दीपदान पूजा विधान ‎किये जाते हैं। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के अलावा यहां प्रतिदिन कालसर्प, पितृदोष शान्ति हेतु राहुकाल में ‎इसकी शांति हेतु ‎विशेष पूजा-अर्चना की जाती है जिससे बड़े से बड़े दुःख-दुर्भाग्य का नाश होता है।


【4】राहु का मन्दिर- राहु का कटा सिर इसी स्थान पर गिरा था। उत्तराखंड के कोटद्वार से लगभग 150 किलोमीटर दूर पैठाणी गांव में स्थित इस राहु मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन के दौरान राहू ने देवताओं का रूप रखकर छल से अमृतपान किया था, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया, ताकि वह अमर न हो जाए। ऐसी मान्यता है कि राहू की कैसी भी दशा हो यहां आकर पूजा करने से महादशा दूर हो जाती है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण की माने, तो राहु का देश राठपुर था जिस कारण यह क्षेत्र राठ तथा राहु के गोत्र पैठीनसि से इस गांव का नाम पैठाणी पड़ा होगा।

पश्चिम मुखी इस प्राचीन मंदिर के बारे में यहां के लोगों का मानना है कि राहू की दशा की शान्ति और भगवान शिव की आराधना के लिए यह मंदिर पूरी दुनिया में सबसे उपयुक्त स्थान है।

नवग्रहों की नम्रता- जीवन में नवग्रहों (देवता) का प्रभाव अति महत्वपूर्ण है। ये नवग्रह सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु है। सूर्य सभी ग्रहों का प्रधान है तथा बाकी ग्रह सूर्य से ही ऊर्जा पाते हैं। ज्योतिष ग्रन्थ जातक-परिजातक के अनुसार सूर्य केंद्र में स्थित रहते हैं। चन्द्रमा सूर्य के दक्षिण पूर्व में यानि आग्नेय कोण में रहते हैं।

मंगलग्रह सूर्य के दक्षिण में, बुधग्रह सूर्य के उत्तर पूर्व यानि ईशान कोण में, बृहस्पति अर्थात गुरु ग्रह सूर्य के उत्तर दिशा में, शुक्रदेव सूर्य के पूर्व दिशा में, शनि सूर्य के पश्चिम दिशा में, राहु सूर्य के दक्षिण-पश्चिम में यानि नैऋत्य कोण और केतु सूर्य के के उत्तर-पश्चिम में (वायव्य कोण) में स्थित होते हैं। इनमें किसी भी देवता का मुख एक दूसरे की तरफ नहीं होता।

लेकिन दुनिया का एक मात्र मन्दिर है, जहां सभी नवग्रह एक ही सीध यानी एक लाइन में स्थापित हैं। इस ज्योतिर्लिंग के बारे में अगले ब्लॉग में पढ़े। राहु को जल्दी प्रसन्न करना है, तो करें इस मन्त्र का जाप !! ॐ शम्भूतेजसे नमः !! !! ह्रीं ॐ नमः शिवाय ह्रीं !! राहु का रत्न-गोमेद, तत्व-छाया, रंग-धुम्र, धातु-शीशा होते हैं।

पूरे विश्व में "केतु का एक मात्र मन्दिर" के बारे में जानने के लिए

गूगल पर सर्च करें दुःख-दारिद्र मिटाने और राहु-केतु की पीड़ा से पीछा छुड़ाने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय: कैसे मिले सुख और सफलता --

जीवन में सफलता के लिए पंचतत्व की कृपा बहुत आवश्यक है, क्यों कि इन पर राहु का अधिकार है। पंचमहाभूतों की दया पाने के लिए रोज राहुकाल में "राहुकी तेल" का दीपदान कर, बड़े से बड़े दुर्भाग्य को दूर किया जा सकता है।

कैसे बनता है राहुकी तेल- अमृतम फार्मास्युटिकल्स ने राहु की शान्ति के लिए राहुदोष नाशक जड़ीबूटियों जैसे नागबल्ली, चिड़चिड़ा, वंग, नागदमणि, काले तिल सर्पपुंखा, गरुण छाल, वरुण छाल, सर्पगंधा, अश्वगंधा आदि का काढ़ा निकालकर कर पंचमी तिथि को राहु के "आद्रा नक्षत्र" में काढ़ें से भगवान शिवकल्यानेश्वर का राहुकाल के दरम्यान वेद ध्वनि से रुद्राभिषेक कराकर काढ़े को तिल, सरसों, बादाम, के तेल में 18 दिन तक पकाया जाता है।

राहुकी तेल में राहु के दुष्ट और दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए बहुत सी वस्तुओं को मिलाया गया है। "राहुकी तेल" के रोज 5 दीपक 56 दिन तक नियमित जलाना सौभाग्य में सहायक होता है।

दक्षिण भारत के कुम्भकोणम से 30 km दूर एलनगुड़ी नामक गुरु शिवालय में नाग काटे व्यक्ति को ले जाकर 24 परिक्रमा लगवाने से वह जीवित हो उठता है।

दुनिया के सभी मार्ग नाग नागिन की आकृति के होते हैं।

आकाश में बिजली चमकते समय उसका आकार नाग की तरह होता है।

अतिशीघ्र गरीबी मिटाने का विशेष उपाय --

हर महीने की दोनों पंचमी, अष्टमी, एवं चतुदर्शी तिथियों में अपने घर या शिवमंदिर में "राहुकी तेल" के अपनी उम्र के अनुसार दीपक जलावें।

‎अभी और भी "राहु के रहस्य" बाकी हैं।


कर्नाटक के मैंगलोर से लगभग 70 किलोमीटर दूर कुक्के श्री नामक तीर्थ पर शेषनाग ने शिवजी का घनघोर तप करके अपने फन पर पृथ्वी धारण करने का वरदान मांगा था। यहां कालसर्प की शांति भी होती है। 100 फीसदी लाभ के लिए एक बार यहां अवश्य जाएं।


माँ मनसा का एक मंदिर चंडीगढ़ से 10 km पंचकूला में भी है, जो 100 एकड़ में फैला हुआ है।


नागराज एक संस्कृत शब्द है जो कि नाग तथा राज (राजा) से मिलकर बना है अर्थात नागों का राजा। यह मुख्य रूप से तीन देवताओं हेतु प्रयुक्त होता है - अनन्त (शेषनाग), तक्षक तथा वासुकि। अनन्त, तक्षक तथा वासुकि तीनों भाई महर्षि कश्यप, तथा उनकी पत्नी कद्रु के पुत्र थे जो कि सभी साँपों के जनक माने जाते हैं। मान्यता के अनुसार नाग का वास पाताललोक में है।

सबसे बड़े भाई अनन्त भगवान विष्णु के भक्त हैं एवं साँपों का मित्रतापूर्ण पहलू प्रस्तुत करते हैं क्योंकि वे चूहे आदि जीवों से खाद्यान्न की रक्षा करते हैं। भगवान विष्णु जब क्षीरसागर में योगनिद्रा में होते हैं तो अनन्त उनका आसन बनते हैं तथा उनकी यह मुद्रा अनन्तशयनम् कहलाती है। अनन्त ने अपने सिर पर पृथ्वी को धारण किया हुआ है। उन्होंने भगवान विष्णु के साथ रामायण काल में राम के छोटे भाई लक्ष्मण तथा महाभारत काल में कृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में अवतार लिया। इसके अतिरिक्त रामानुज तथा नित्यानन्द भी उनके अवतार कहे जाते हैं।

छोटे भाई वासुकि भगवान शिव के भक्त हैं, भगवान शिव हमेशा उन्हें गर्दन में पहने रहते हैं। तक्षक साँपों के खतरनाक पहलू को प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि उनके जहर के कारण सभी उनसे डरते हैं।

गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के थानगढ़ तहसील में नाग देवता वासुकि का एक प्राचीन मंदिर है। इस क्षेत्र में नाग वासुकि की पूजा ग्राम्य देवता के तौर पर की जाती है। यह भूमि सर्प भूमि भी कहलाती है। थानगढ़ के आस पास और भी अन्य नाग देवता के मंदिर मौजूद है।

देवभूमि उत्तराखण्ड में नाग के छोटे-बड़े अनेक मन्दिर हैं। वहाँ नागराज को आमतौर पर नाग देवता कहा जाता है और नागराज शब्द का प्रयोग यहां के लोगों द्वारा नहीं किया जाता है। उत्तराखण्ड में सिर्फ नागराजा शब्द का प्रयोग होता है और सेम मुखेम नागराजा उत्तराखण्ड का सबसे प्रसिद्ध तीर्थ है जहां कृष्ण भगवान नागराजा के रूप में पूजे जाते हैं और यह उत्तराकाशी जिले में है तथा श्रद्धालुओं में सेम नागराजा के नाम से प्रसिद्ध है। एक अन्य प्रसिद्ध मन्दिर डाण्डा नागराज पौड़ी जिले में है। उत्तरकाशी में दो नाग कालिया और वासुकि नाग को नागराज के स्वरूप में पूजा जाता है। कालिया नाग को डोडीताल क्षेत्र में पूजा जाता है और वासुकि नाग को बदगद्दी में तथा टेक्नॉर में पूजा जाता है। मान्यता है कि वासुकि नाग का मुँह गनेशपुर में और पूँछ मानपुर में स्तिथ है ।

तमिलनाडु के जिले के नागरकोइल में नागराज को समर्पित एक मन्दिर है। इसके अतिरिक्त एक अन्य प्रसिद्ध मन्दिर मान्नारशाला मन्दिर केरल के अलीप्पी जिले में है। इस मन्दिर में अनन्त तथा वासुकि दोनों के सम्मिलित रूप में देवता हैं।

केरल के तिरुअनन्तपुरम् जिले के पूजाप्पुरा में एक नागराज को समर्पित एक मन्दिर है। यह पूजाप्पुरा नगरुकावु मन्दिर के नाम से जाना जाता है। इस मन्दिर की अद्वितीयता यह है कि इसमें यहाँ नागराज का परिवार जिनमें नागरम्मा, नागों की रानी तथा नागकन्या, नाग राजशाही की राजकुमारी शामिल है, एक ही मन्दिर में रखे गये हैं।

सन्दर्भसंपादित करें

  • H.Oldenberg: TheVinaya Pitakam. London 1879, pp.24-25

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