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नाड़ी परीक्षा

नाड़ी परीक्षा हृदयगति (पल्स) जाँचने की भारतीय पद्धति है। इसका उपयोग आयुर्वेद, सिद्ध आदि चिकित्सापद्धतियों में होता है। यह आधुनिक पद्धति से भिन्न है।

इसमें तर्जनी, माध्यिका तथा अनामिका अंगुलियों को रोगी के कलाई के पास बहि:प्रकोष्‍ठिका धमनी (radial artery) पर रखते हैं और अलग-अलग दाब देकर वैद्य कफ, वात तथा पित्त- इन तीन दोषों का पता लगाता है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

  • हाथ के अंगूठे के मूल में जो धमनी नाड़ी है वही चैतन्य की साक्षिणी है, अर्थात् नाड़ी का स्पन्दन बताता है कि इस शरीर में जीव है कि नहीं इसी की गति से मानव का शारीरिक सुख या दुख जानना चाहिए। "अचिन्त्य चित्तस्वरूपत्वादचेतन इव स्थिते ।चैतन्ये चेतना हेतुस्ताम् वन्दे शक्तिमद्भताम्। " एक अचिन्त्य शक्ति है जो कि ह्रदय को प्रतिक्षण समान्दोलित करती है ह्रदय की गति ही नाड़ी में बोलती है, ह्रदय गति के द्वारा ही समस्त शरीर की धमनी शिराओं में रक्त का परिसंचरण होता है, अतः यह धमनी नाम से पुकारी जाती है। मानव शरीर में कोई भी गड़बड़ होने के पहले ह्रदय ही प्रभावित होता है, अतः जहाँ तक गति का सम्बन्ध होता है ह्रदय तथा अंगूठे की जड़ में स्थित नाड़ी की गति मे कभी अन्तर नहीं होता,अतः किन -किन दोषों के कुपित होने से नाड़ी की गति कैसी होती है इसका वर्णन करते हैं।

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