निम्बार्क कोट , निम्बार्क सम्प्रदाय से सम्बद्ध वृन्दावन में स्थित एक मंदिर है। यह मन्दिर बहुत छोटा होते हुए भी वृन्दावन में अपनी अलग पहचान रखता है। यहाँ निम्बार्क जयन्ती के मौके पर मनाये जाने वाले एक मासीय समारोह की बहुत ख्याति है। यह उत्सव यहाँ सन 1924 से मनाया जा रहा है। सन 1923 तक यह उत्सव प्रेम गली स्थित उत्सव कुंज में मनाया जाता था। वर्ष 2019 में इस उत्सव का 176 वां आयोजन किया गया। इस उत्सव का अतिविशेष आकर्षण है वैष्णव संगीत शैली का समाज गायन।

निम्बार्क कोट

निम्बार्क सम्प्रदाय चार मुख्य वैष्णव सम्प्रदायों में से एक है, इस सम्प्रदाय का एक अन्य नाम कुमार सम्प्रदाय भी है। वैष्णव सम्प्रदाय व उनके अनुयायी वे है जो विष्णु या उनके अवतारों राम और कृष्ण को आपने ईष्ट के रूप में पूजने व मानने वाले है। ठीक वैसे ही जैसे महादेव जी (शंकर) की उपासना करने वाले शैव, देवी (शक्ति) को अपना ईष्ट मानने वाले शाक्त और गणेश जी की पूजा करने वाले गाणपत्य कहलाते हैं। बाकी के तीन वैष्णव सम्प्रदाय है-लक्ष्मी या श्री सम्प्रदाय, व्रह्म या गौडीय सम्प्रदाय और रुद्र या विष्णुस्वामी सम्प्रदाय।

विवरणसंपादित करें

 
राधारमण लालजी

मंदिर में गर्भगृह के मध्य सिंहासन पर श्रीराधारमणलालजी के विग्रह विराजमान हैं। युगल सरकार के दोनों ओर निम्बार्क आचार्य पंचायतन विराजमान हैं। दाहिनी ओर निम्बार्क संप्रदाय के आद्य आचार्य श्री हंस भगवान, उनके मानस पुत्र व शिष्य सनकादिक (सनक, सनंदन, सनातन व सनतकुमार। फिर उनके शिष्य जगदगुरु नारद जी, बाईं ओर श्री निम्बार्क भगवान व उनके शिष्य निवासाचार्य की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। मंदिर के गर्भगृह के आगे जगमोहन और उसके आगे आंगन है। दोनों का फर्श काले-सफेद संगमरमर का बना है। जगमोहन में मंदिर के संस्थापक श्री बाल गोविंद दास जी व उनके लघुभ्राता श्री हरिदास श्रृंगारी के चित्रपट हैं। गर्भगृह के बाहर की ओर दो खिड़कियों में चरणपादुकाएं बनी हैं, जहां श्री गोपालदास जी महाराज और उनके शिष्य श्री हंसदास जी महाराज के चित्रपट हैं। जगमोहन में अनेक प्राचीन चित्र लगे हैं जिनमें निम्बार्क भगवान का सर्वेश्वर भगवान की आराधना करते हुए रंगीन चित्र बेहद सुंदर व प्राचीन धरोहर सरीखा है। गर्भगृह में ठाकुर श्री राधारमण लाल जी के ठीक पीछे सिंहासन पीठ पर ही दो चित्र श्रृंखलाएं हैं जो करीब दो सौ साल पुरानी हैं, इनमें निम्बार्क भगवान के विविध रूपों का चित्रण हैं।

मंदिर की स्थितिसंपादित करें

वृन्दावन में इस मन्दिर को ढूंढ़ना बहुत आसान है। यहाँ का बनखंडी चौराहा प्रसिद्ध है, इस चौराहे से एक गली पूर्व दिशा में जाती है, इस गली में प्रवेश करते ही आपके दाहिनी ओर पांचवां दरवाजा इसी मन्दिर का है। यह इस मन्दिर का उत्तरी द्वार है। मंदिर में प्रवेश का एक दरवाजा पुराना बजाजा से भी है, यह दक्षिणी द्वार है। दक्षिणी द्वार की पहचान यह है कि इसके ठीक सामने ऋषि बाल्मीकि स्कूल और सब-स्टेशन नं 3 है। आमतौर पर इस दरवाजे के नीचे फल व सब्जी वाले बैठते है।

नेशनल हाइवे नम्बर २ (दिल्ली से आगरा) पर छटीकरा मोड से वृन्दावन की ओर आ सकते हैं। इसके अलावा यमुना एक्सप्रेस हाइवे से भी वृंदावन कट से यमुना का पुल पार करके परिक्रमा मार्ग में टटिया स्थान या अटल्ला से निम्बार्क कोट आ सकते हैं।

वैष्णव समाज गायनसंपादित करें

समाज गायन : ब्रज की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरसंपादित करें

कार्तिक मास में निम्बार्क कोट में हर शाम को होने वाला समाज गायन निबार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव का विशेष आकर्षण है। बताते हैं कि निम्बार्क संप्रदाय में विक्रम संवत की पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी के मध्य से ही समाज गायन की परंपरा चली आ रही है। वहीं निबार्क कोट में समाज गायन की परंपरा का इतिहास लगभग 176 साल से कुछ अधिक अधिक पुराना है। यहां की समाज गायन परंपरा का श्रीगणेश स्वामी गोपाल दास जी महाराज ने विक्रम संवत् 1901 (ईस्वी सन् 1843) में तब किया था, जब उन्होंने श्री निम्बार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव की स्थापना की। तब से यहां महोत्सव में समाज गायन की परंपरा अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।

 
निम्बार्क कोट में समाज गायन

समाज गायन प्राचीन भारतीय शास्त्रीय संगीत के गायन की एक वैष्णवी शैली है, जिसमें संत समूह में मिलकर आचार्यों की वाणी पदों का गायन करते हैं। रसिक संतों व आचार्यों द्वारा राधाकृष्ण के युगल स्वरूप की दिव्य लीलाओं की जो काव्यमय अभिव्यक्ति है, वही वाणी है और इन वाणियों का सामूहिक गायन ही समाज गान है।

समाज गायन के समय सभी साधु संत दो दलों में विभक्त होकर दो पंक्तियों में आमने-सामने बैठते हैं। दोनों पंक्तियां अपने सेव्य विग्रह के सामने दांयी और बांयी ओर होती है। दाहिनी ओर वाले दल को मुखिया दल और बांयी ओर वाले दल को झेला दल कहते हैं। मुखिया दल के सबसे निपुण कलाकार को मुखिया पुकारा जाता है। मुखिया पहले तानपूरा लेकर बैठते थे पर आजकल हारमोनियम के इस्तेमाल करने का चलन हो गया है। उनके अगल-बगल में कई अन्य श्रेष्ठ साधु-संत कुछ अन्य वाद्य जैसे सारंगी, सितार, तानपूरा, बांसुरी आदि लेकर बैठते हैं। सेव्य विग्रह के बांयी ओर झेला दल में एक या अधिक संत झांझ या मजीरा आदि बजाते हैं। दोनों पंतियों के मध्य में रिक्त स्थान पर अंतिम छोर पर मृदंग वादक बैठता है, जो सेव्य विग्रह के बिल्कुल समुख होता है। दोनों दलों के मध्य ऊंची चौकी पर रखी वाणी को समाज श्रंखला के नाम से जाना जाता है। अन्य समाजियों के समाने भी ऊंची चौकी पर अथवा रेहल पर वाणी की प्रतिलिपियां रखी होती हैं। जो पहले हस्तलिखित हुआ करती थी पर आजकल मुद्रित भी होती हैं।

परंपरागत रूप से सर्वप्रथम मुखिया व अन्य एक दो वरिष्ठ संत समाज का शुभारंभ करते हैं। सर्वप्रथम मंगलाचरण के रूप में मंगल के दो पद गाए जाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-छोटा मंगल व बडा मंगल। बडा मंगल पहले गाया जाता है, जो सूहा विलावल में गाया जाता है। इस बडे मंगल में तद्तद् आचार्य का उत्कर्ष गाया जाता है। जबकि बाद में गाया जाने वाला छोटा मंगल प्रणामात्मक व मंगल सूचक होता है।

समाज के आरंभ में होने पर कुछ समय पश्चात पुजारी बाबा द्वारा वाणी जी व अन्य समाजियों का माला, चंदन इत्र इत्यादि से आदर सत्कार किया जाता है। वह समाजियों को गायन के मध्य में ही मिश्री, काली मिर्च, पान-बीरी, इलाइची आदि का भोग देते हैं। मंगल के दोनों पदों के गायन के उपरांत श्रीभट्ट जी की रचना युगल शतक से किसी एक पद का गायन होता है। युगल शतक में 100 पद हैं। फिर श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी की रचना महावाणी से एक पद गाया जाता है। फिर आचार्यों की बधाइयां हंसवंश यश सागर व अन्य बधाई की पुस्तकों के पदों द्वारा गाई जाती हैं।

निबार्क संप्रदाय की समाज गायन में मुख्य रूप से सूहा विलावल, यमन कल्याण, श्याम कल्याण, देव गंधार, काफी, मल्हार, बिहाग, भूपाली, मालकौश, केदार, बहार, भीमपलासी, सोरठ, सिहानो, पीलू मारू, वृंदावनी सारंग, आसावरी, भैरवी, देश, भैरव, रामकली, चैती गौरी, धनाी, खमाज, वरवा, खट, वागेश्र्वरी, अडाना, विहागडा व दरवारी आदि रागों का प्रयोग किया जाता है। तालों में प्रमुख रूप से चौताल (ध्रुपद), चर्चरी, झप, तीन ताल, कहरवा, दादरा, रूपक, दीपचंदी आदि का प्रयोग होता है। समाज गायन में गाए जाने वाले पद का प्रस्तुतिकरण दो प्रकार की लय में किया जाता है। पद को विलंबित लय में शुरू करके द्रुत लय में ले जाते हैं।

निम्बार्क संप्रदाय में मुखिया व झेला का क्रम कब से चला आ रहा है, यह तो शोध का विष्य है किंतु निबार्क कोट में समाज गायन में मुखियाओं की परंपरा इस प्रकार रही है- श्रीरमन दास, गोपाल दास, गोकुल दास, पूरन दास, प्रेमदास, गोविंद दास, रूप किशोर दास, रसिक दास व वृंदावन बिहारी।

निम्बार्क कोट घराने की समाज गायन के वर्तमान मुखिया वृंदावन बिहारी के मुताबिक दंडक गायन इस घराने की विशेष शैली है। दंडक का अर्थ है दंड के समान लंबा। झप ताल में गाए जाने वाली इस शैली में कवित्त आदि छंदों की लंबी-लंबी पंक्तियों का प्रयोग होता है। यह निम्बार्क कोट के समाज गायन के अंतर्गत कार्तिक शुक्ल दशवीं व एकादशी को यहां गाया जाता है।

वृन्दावन बिहारी के मुताबिक समाज गायन की मूलधारा श्रद्धा व उपासना पर आधारित है। यह किसी राजा इत्यादि के सामने गाए जाने वाली मनोरंजन प्रधान गायकी नहीं है। उन्होंने कहा कि अमूमन समाज गायन के लिए राग के ज्ञान की नहीं अनुराग मय ध्यान की आवश्यकता है। वस्तुत: जिस समय एकाग्र मन से संत जन गाने लगते हैं तो सारा वातावरण ही दिव्य हो जाता है। समाज गायन ब्रज की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है।

वृन्दावन बिहारीसंपादित करें

 
वृंदावन बिहारी जी

श्री वृंदावन बिहारी शर्मा (84) वृंदावन (मथुरा) स्थित करीब 100 वर्ष पुराने मंदिर ‘निम्बार्क कोट’ के सेवायत हैं। इन्होंने ब्रज के समाज गायन, रासलीला और ब्रज के हस्तलिखित साहित्य के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई है। वृंदावन बिहारी जी 14-15 वर्ष की आयु से ही मंदिर का कामकाज संभाल रहे हैं। यह मंदिर वृंदावन में निम्बार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव के आयोजन के लिए विख्यात है जो कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) में पूरे महीने मनाया जाता है। यह महोत्सव 175 वर्ष (सन् 1843) से अधिक वर्षों से वृंदावन में आयोजित होता है। इस महोत्सव की विशेषता है इसमें दैनिक होने वाला समाज गायन और नित्य रासलीला। समाज गायन ब्रज के भक्त कवियों की पद रचनाओं का शास्त्रीय व लोक शैली में सामूहिक गायन है। नित्य रासलीला ब्रज के भक्तों की रचित श्रीकृष्ण की किशोर लीलाएं हैं, इन लीलाओं का मंचन अब केवल निम्बार्क कोट में ही होता है। समाज गायन व नित्य रासलीला ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर है, इस महोत्सव के आयोजन के जरिए इनका संरक्षण हो रहा है। समाज गायन सदियों से ब्रज के मंदिरों में होता है, ब्रज में मौजूद सभी वैष्णव संप्रदायों की अपनी शैलियां हैं लेकिन निम्बार्क संप्रदाय के समाज गायन ने सभी शैलियों में एक विशेष दर्जा हासिल किया है तो यह केवल वृंदावन बिहारी जी का निजी प्रयास है। उन्होंंने अपने पैतृक मंदिर में एक मासीय निम्बार्क जयंती आयोजन में हर दिन न सिर्फ समाज गायन में कौन-सा पद, किस राग व शैली में गाया जाए, बल्कि रास लीलाओं के क्रम को भी तय किया ताकि प्राचीन शैली व परंपरा ही बरकरार रहे। वे स्वयं समाज गायन के अच्छे गायक और समाज गायन के साधु-संतों की टोली के मुखिया हैं। आज भी दो घंटे तक गाए जाने वाले लंबे पदों को ठाकुरजी के सामने गाते हैं। उनकी गायन शैली इतनी असरदार है कि समाज गायन से अनजान व्यक्ति भी उसे सुनकर बिना किसी योगक्रिया के एकाग्रचित्त व शांत मन:स्थिति में पहुुंच जाए। उन्होंने उत्सव के दौरान उन नित्य रासलीलाओं के मंचन को प्रोत्साहित किया जिनका मंचन अब ब्रज में भी कहीं नहीं होता है। विशेष बात यह है कि इसके लिए उन्होंने किसी सरकारी या निजी संस्था से कभी मदद नहीं ली बल्कि स्वयं श्रीमद्भागवत के कथावाचन के परिश्रम से धन एकत्र कर सभी संचालन किया। उन्हें संस्कृत में आचार्य और दर्शनशास्त्र में एमए की उपाधि हासिल है।

70 के दशक में वृंदावन में ब्रज के हस्तलिखित ग्रंथों के संरक्षण के लिए शोध संस्थान की स्थापना हुई तो इन्होंने उसमें कैटलॉग तैयार करने की जिम्मेदारी ली ताकि उन्हें ब्रज के हस्तलिखित ग्रंथों को पढ़ने का मौका मिलता रहे। सामान्य कैटलॉगिंग से कहीं बढ़कर इन्होंने अनेक विशिष्ट मानक तय करके ग्रंथों की संक्षिप्त विवरण तैयार किया। यह ग्रंथ ब्रज, संस्कृत, हिंदी, बंगाली, गुजराती, मराठी व उर्दू आदि भाषाओं में हैं। इन्होंने वृंदावन के तमाम मंदिरों को भी इस बात सहमत कराया कि उनके पास जो भी हस्तलिखित पांडुलिपियां हैं उन्हें वृंदावन शोध संस्थान में दान कर दें ताकि वे वहां भविष्य के लिए वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित रह सकें और आने वाली पीढ़ियों को उपलब्ध हों। शोध संस्थान में काम करने के दौरान इन्होंने करीब 25 वर्षों के दौरान हजारों हस्तलिखित ग्रंथों का अध्ययन करके हिंदी व अंग्रेजी में एक दर्जन कैटलॉग तैयार किए जो संस्थान की एक विशेष पूंजी है क्योंकि देश के किसी भी हस्तलिखित संग्रहालय में ऐसा ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, यमुना के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा का परिचय देते हुए उन्होंने न केवल बल्लभाचार्य व अन्य संतों की भांति स्वयं का एक यमुनाष्टक लिखा बल्कि अब तक उपलब्ध सभी यमुनाष्टकों का एकत्र करके और यमुना पर विस्तार से शोधपरक पुस्तक ‘यमुना एवं यमुनाष्टक’ लिखी है। इसमें यमुना के प्रदूषण दूर करने के लिए इसकी अविरल निर्मल धारा को बनाए रखने की सरकार से अपील की है। दिल्ली व आगरा के विश्वविद्यालयों से लेकर वृंदावन व आसपास के इलाकों के हिंदी, संस्कृत, ब्रज भाषा व दर्शनशास्त्र पीएचडी शोधार्थी इनके पास मार्गदर्शन के लिए आते रहते हैं। यूरोप, अफ्रीका, आष्ट्रेलिया व तमाम एशियाई देशों के विदेशी जिज्ञासु पर्यटक भी इनके पास अपने प्रश्नों के समाधान के लिए मिलने आते रहते हैं। वृंदावन की विद्वत गोष्ठियों-सम्मेलनों में इन्हें विशेष रूप से भाषण के लिए आमंत्रित किया जाता है, हिंदी, संस्कृत, इंग्लिश व अन्य कई भाषाओं में समान पकड़ होने के चलते उद्धरण व आख्यानो से भरमार इनका प्रभावशाली धाराप्रवाह भाषण इनकी विशिष्ट पहचान है। इन्हें ब्रज के अनेक सम्मानों व उपाधियों से नवाजा गया है। अपनी बेहद सादी वेशभूषा (धोती-बगलबंदी) व सत्यनिष्ठ, मृदु, विनम्र, करुणामयी, किसी की भी मदद के लिए सदैव तैयार वयोवृद्ध वृंदावन बिहारी जी ब्रज की विभूति व निधि हैं।