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शीतऋतु निष्क्रयता में कुछ वनस्पति अपनी अपनी चयापचय प्रक्रियाओं को लगभग पूरी तरह रोक लेते हैं। इसमें वातावरण के कम तापमान का प्रयोग कर के रासायनिक क्रियाओं को भी बहुत धीमे कर लिया जाता है।[1]

निष्क्रयता (Dormancy) किसी जीव के जीवनचक्र में ऐसा कोई चरण होता है जिसमें उस जीव का विकास और बहुत-सी अन्य क्रियाएँ कुछ काल के लिए रोक दी जाती हैं। प्राणियों में इस अवस्था में प्राणी सोया हुआ प्रतीत हो सकता है। निष्क्रयता से कठिन परिस्थितियों के समय में जीव अपनी चयापचय प्रक्रियाओं को धीमा कर लेता है जिस से उसमें ऊर्जा-व्यय बहुत कम हो जाता है। जब परिस्थितियाँ सुधर जाती हैं (मसलन सर्दियों के बाद तापमान का बढ़ना तथा आहार की अधिक उपलब्धि हो जाना), तो निष्क्रयता जीव फिर से सक्रीय हो सकता है।[2][3] भालू जैसे प्राणियों में शीतनिष्क्रियता (हाइबर्नेशन) देखी जाती है, जिसमें प्राणी शीतऋतु से पहले बहुत आहार ग्रहण कर के अपना वज़न बढ़ाता है और फिर सर्दी के आगमन पर सुप्तावस्था में रहकर ऊर्जा बचाता है। इस काल में कुछ प्राणी अपने हृदय की दर 95% घटा लेते हैं और शरीर का तापमान भी कम कर लेते हैं।[4]

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. Capon, Brian (2005). Botany for gardeners. Timber Press: Timber Press. पृ॰ 146. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-88192-655-8. अभिगमन तिथि 2009-09-12.
  2. Bewley, J. D. and Black, M. (1994). Seeds: physiology of development and germination, 2nd edn. New York, London: Plenum Press.
  3. Black, M.; Butler, J. and Hughes, M. (1987). "Control and development of dormancy in cereals". In: Mares DJ, ed. Fourth International Symposium on Pre-Harvest Sprouting in Cereals, Boulder, Co., USA: Westview Press, 379-92.
  4. Bert B. Boyer, Brian M. Barnes (1999). "Molecular andMetabolic Aspects of Mammalian Hibernation" (PDF). www.colby.edu.