नौसैनिक तोपखाना (Naval artillery) वह तोपखाना है जो युद्धपोतों पर लगा होता है। पहले इसका उपयोग केवल नौसैनिक युद्ध में किया जाता था किन्तु बाद में समुद्रतट पर बमबारी करने के लिए तथा वायुयानों को मार-गिराने के लिए भी किया जाने लगा। नौसैनिक तोपखाने के अन्तर्गत प्रायः नालों से छोड़े गए प्रक्षेपात्रो को सम्मिलित किया जाता है जबकि टॉरपीडो, रॉकेट और मिसाइल आदि इसके अन्तर्गत नहीं आते। परम्परागत नाविक तोपंदाजी अपने उत्कर्ष पर पहुँच चुकी हैं और अब हम नियंत्रित अस्त्र-शस्त्र (guided missiles) के युग में प्रवेश कर चुके हैं।

BB61 USS Iowa BB61 पर तोपखाने का परीक्षण (१५ अगस्त, १९८४ ; पोर्टो रिको)
एच एम एस विक्ट्री का गन-डेक (Gun Deck)

जब से तोप का आविष्कार हुआ और समुद्री तल पर उसका उपयोग करना सम्भव हो गया तभी से युद्ध के लिए जहाजों पर तोप का प्रयोग किया जाने लगा। प्रारम्भिक समुद्री युद्ध में तोप के प्रयोग से शत्रु को डराकर खदेड़ना, शत्रु कार्मिकों को क्षतिग्रस्त करना, या जहाज रोककर लूटना और उसे नष्ट करना होता था। बाद में गोले की घातक शक्ति के बढ़ने पर तोप की प्रक्षेप दूरी या परास भी बढ़ा और आजकल तो पचासों किलोमीटर तक के जहाजों पर गोले फेंके जा सकते हैं।

आधुनिक तोप और उसके आरोपण का क्रमविकाससंपादित करें

आज से सदियों पहले भरण तोप और उच्च विस्फोट गोलों की कल्पना और उपयोग हो चुका था, किन्तु इनका वास्तविक विकास १९वीं शती के उत्तरार्ध में ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के समय हुआ। तब तक तोपें काँसे या लोहे की ढली और बिना झिरी कटी (unrifled) होती थीं। इन्हें स्फान (wedges) के प्रयोग से उठाया या झुकाया जाता था। इन्हें हाथ से ही नालमुख द्वारा भरा जाता था। जहाज में बने झरोखों से तोप के निकलने पर घिरनी तंत्र (pulley system) द्वारा प्रतिक्षेप (पीछे की तरफ गति) रोका जाता था। निशाना साधने के यंत्रों की व्यवस्था नहीं थी। लक्ष्य पर प्रहार करने के लिए समूचा जहाज घुमाना पड़ता था। १८५० ई. के बाद उत्कृष्ट इस्पात की बनी अधिक मजबूत आधुनिक तोपों से वे प्रतिस्थापित हो गए।

अधिक मजबूत तोपों के आगमन से भारी नोदक प्रभार का प्रयोग सम्भव हो गया, जिससे उच्चतर प्रक्षेपवेग तथा उच्चतर प्रतिक्षेपबल (recoil forces) प्राप्त हुए। इसके साथ ही अभिकल्प का इतना विकास हुआ कि आधुनिक आरोपण प्रतिक्षेप की किसी मात्रा को सहन कर सकता है। नालमुखवेग (muzzle velocity) की वृद्धि होने पर, उत्थापन की सुधरी व्यवस्था से परास में वृद्धि हुई। इस प्रगति के फलस्वरूप, जहाज की स्थिति परिवर्तित किए बिना ही तोप को घुमाने (विनयन) के लिए परिवर्तन की आवश्यकता पड़ गई।

नौसेना में प्रयुक्त होनेवाली तोपें तीन प्रकार की होती हैं, भारी, मध्यम और हलकी। भारी तोपें वे है जिनका व्यास (calibre) ६ इंच या इससे अधिक होता है। इनका प्रयोग तललक्ष्य तथा समुद्रतट पर बमबारी के लिए होता है। विशाल रणपोतों के ये ही प्रमुख अस्त्रशस्त्र होते हैं। मध्यम तोपों ६ इंच से ४ इंच व्यास की होती हैं। इनका प्रयोग तलीय लक्ष्यों के विरुद्ध होता है, पर वायुयानों के विरुद्ध भी ये प्रयुक्त हो सकती हैं। हल्की तोपें निकट परास हवामारों (antiaircraft fitre) के लिए प्रयुक्त होती हैं। जहाजों पर भारी तोपों के लादने की एक सीमा होती है। किसी रणपोत की मारक शक्ति (striking power) गोलाबारी की द्रुतता पर भी निर्भर होती है। तोप जितनी ही बड़ी होगी, उसकी भराई उतनी ही देर में होगी, जिसके कारण गोलाबारी का मध्यान्तर बढ़ जाएगी। चूँकि फायर किए गए गोला-बारूद का एक छोटा अंश ही लक्ष्य पर आघात करता है, अतः हलके गोलों से शीघ्रता से गोलाबारी करना भारी गोलों द्वारा धीरे-धीरे गोलाबारी करने की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी होता है।

तोप के गोला बारूद में प्रक्षेप्य या गोला (उच्च विस्फोटक जैसे टी.एन.टी.) और कॉर्डाइट होता है, जो तोप से प्रक्षेप्य को फायर करता है। प्रक्षेप्य और भरण का भार तोप के आकार पर निर्भर करता है। गोलाबारूद विस्फोटक होता है। अत: रणपोत के निचले भाग में स्थित कवचरक्षित बारूदधर (मैगजिन) में यह शत्रुओं की गोलाबारी से सुरक्षित रखा जाता है। बारूधर से गोला बारूद को तोपों में पहुँचाने के लिए उत्थापक (hoist) रहता है।

गोलाबारी नियंत्रणसंपादित करें

युद्ध के समय अनेक तोपें एक साथ ही लक्ष्य पर गोलाबारी करती हैं, इसलिए जहाज के यथासंभव उच्चतम स्थान पर निर्देशक या प्रधान द्रष्टा (master sight) नामक केंद्रीय नियंत्रण स्थापित रहता है। इसमें द्विनेत्री (binocular) लगी रहती है, जहाँ दो परिचालक, जिन्हें ट्रेनर (Trainer) और लेयर (Layer) कहते हैं, बैठे रहते हैं। वे निदेशक को निदेश देते और उत्थापन से लक्ष्य को पकड़ते हैं तथा लक्ष्य संबंधी आँकड़े (लक्ष्य की स्थिति और उसका व्यवहार, जैसे परास, चाल, दिक्स्थिति आदि) नीचे पारेषणकेंद्र (Transmitting Station) नामक निर्देश स्थान पर भेजते हैं। यहीं गोलाबारी नियंत्रण संगणक (Computer), स्थायित्वकारी (stabiliser) और रेडार परासतंत्र (radar ranging system) रहते हैं।

गोलाबारी नियंत्रण का हलसंपादित करें

चित्र:Robins gunnery.jpg
तोपखाने पर बहुत से प्रयोग करने के बाद ब्रिटिश इंजीनियर बेंजामिन रोबिन्स ने सन १७४२ में में तोपखाने के ने सिद्धान्त (New Principles in Gunnery) नामक पुस्तक लिखी जिसमें तोपखाने के सभी वैज्ञानिक पहलुओं का वर्णन था। यह पुस्तक यूरोप के नौसैनिक तोपखाने के विकास में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।

लक्ष्य और जहाज दोनों चलते रहते हैं। इसलिए किसी निश्चित लक्ष्य पर तोप छोड़ने पर वह लक्ष्य से पूर्णतया चूक जाएगा, क्येंकि गोले के लक्ष्य तक पहुँचते पहुँचते लक्ष्य ऐसी स्थिति में आ जाएगा जिसे भावी स्थिति कहते हैं। संगणक प्राप्य आँकड़ों से लक्ष्य की भावी स्थिति की प्राग्युक्ति और लक्ष्य करने के लिए आवश्यक तोप उत्थापन या तोप विनयन की गणना करता है। अर्थ यह हुआ कि वांछित परिणा प्राप्त करने लिए दर्शा (sight) उत्थापन और दर्शा विनयन का संशोधन आवश्यक है। इसकी विधियाँ हैं :

रेडार द्वारा मापित प्रस्तुत परास में संगणक गोले के उड़ान का में, अपने जहाज और लक्ष्य की फायर रेख में गति और वायुवेग का संशोधन जोड़कर सुधार कर लेता है। भावी परास को तोप के लिए टैजेंट उन्नयन (elevation) में परिणत कर लिया जाता है। इसे दृश उन्नयन में जोड़कर तोप उन्नयन प्राप्त किया जाता है।

उड़ानकाल में अपने लक्ष्य और हवा के वेग के फायर रेखा के आड़े विचलन और अपवहन (drift) संशोधन की गणना की जाती है। इस चिलन को दर्शा विनयन में जोड़ने पर तोप विनयन प्राप्त होता है। इनके अतिरिक्त निदेशित्र तंत्र के प्रयोग के कारण नति (dip.) स्थापन, झुकाय, अभिसरण (convergence) जैसे अनेक सुधारों की अवश्यकता होती है। इन्हें गणना द्वारा ज्ञात करके तोप उन्नयन और तोप विनयन में मिलाते हैं। गणना में वायुमंडलीय परिस्थिति और आकार के संदर्भ में गोले का प्रत्याशित व्यवहार भी विचारणीय होता है।

 
381 mm कैलिबर BL 15 इंच मार्क I ब्रिटिश तोप का कार्य करने का चलचित्र। यह १९१३ से १९५९ तक सेवा में थी।

तोप के किसी स्थिर मंच पर स्थित न होकर समुद्री लहरों पर तैरते गतिशील जहाज पर स्थित होने के कारण स्थिरीकरण त्रुटियों का प्रवेश हो जाता है। पारेषण केंद्र में इनकी गणना करके इन त्रुटियों को सुधार लिया जाता है।

उपर्युक्त समस्याएँ पृष्ठ की हैं। इसी प्रकार हवामार समस्याओं को भी हल किया जाता है। अंतर यही है कि इसमें फ्यूज की भी प्राग्युक्ति की जाती है, क्योंकि वायुयान में सभी गोलों के वायुयान पर लगने की संभावना नहीं होती। लक्ष्य की भावी स्थिति में मार गिराने के लिए प्रागुक्त समय के अनुसार फ्यूज़ किया जाता है, ताकि गोले लक्ष्यभ्रष्ट होकर भी वायुयान के निकट ही फटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दें।

तोपखने का रेडार अंधपथन (blind tracking) करता है और आवश्यकता पड़ने पर इसी स्थिति से तोप फायर भी किया जा सकता है। उस उपकरण पारेषण केंद्र में स्थित होता है और रेडार एरियल निदेशित्र में होते हैं।

सन्दर्भसंपादित करें