वीर पत्ता जी चुंडा के पुत्र कान्धल का प्रपौत्र थे और आमेट (राजसमन्द) ठिकाने वालो के पूर्वज थे|

चित्तौड़ पर अकबर का आक्रमण और जयमल और पत्ता का चितौड़ के दुर्ग की रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान

सन 1569 में अकबर के चितौड़ दुर्ग पर जब अकबर ने आक्रमण किया और महाराणा उदयसिंह जी के प्रमुख सरदारों की सभा में सर्वसम्मती से ये निर्णय लिया की चूँकि अकबर की सेना अत्यंत विशाल है और इस समय महाराणा का अपने परिवार और कुछ सेना के साथ पहाडो में चले जाना उचित होगा और बाकी सरदार 8000 की सेना के साथ चितौड़ दुर्ग की रक्षा के निमित वही रहेंगे तब इस निर्णय पर अमल करते हुवे चितौड़ की रक्षा का भार महाराणा ने वीर जयमल जी और पत्ता जी पर छोड़ा उन्हें सेनाअध्यक्ष बना कर महाराणा अपने परिवार और रावत नैतसी और कुछ अन्य सरदारों के साथ उदयपुर के पहाडो की तरफ चले गए|

अकबर के साथ हुवे युद्ध में एक दिन साबातो(बारूदी सुरंग) के विस्फोट के कारण दुर्ग की क्षतिग्रस्त दीवारों की निगरानी करते हुवे अकबर की बन्दुक की गोली से घायल होकर लंगड़े होने के बावजूद वीर जयमल जी ने अदम्य साहस और अप्रितम वीरता का परिचय दिया | कहते है अकबर की गोली लगने के कारण जब जयमल जी लंगड़े हो गए तो वो अपने कुटुम्बी कल्लाजी से बोले लमी लंगडा होने के कारण घोड़े पर तो चढ़ नहीं सकता हु और मुग़ल सेना के साथ युद्ध करने की तो मन में ही रह गई तो वीरवर कल्लाजी ने उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया और बोले अब आप अपने मन की पूरी कीजिये और दोनों ने तलवारों से वीरता पूर्वक युद्ध किया और हनुमान पोल और भैरव पोल के बीच में काम आये जहा आज भी उनकी समाधिया बनी हुई है|

इसी प्रकार वीर पत्ता जी जग्गावत ने रामपोल दरवाजे के अन्दर मुग़ल सेना से लड़ते हुवे वीरगति को प्राप्त हुवे उन्हें अकबर के हाथी ने अपनी सुन्ड में उठा कर पटक दिया था जहा वो वीर गति को प्राप्त हुवे वहा आज भी उनका स्मारक बना हुवा है|

अकबर के चितौड़ आक्रमण के दौरान चितौड़ दुर्ग की रक्षार्थ जो वीरता जयमल जी और पत्ताजी ने दिखाई थी उससे मुग्ध होकर अकबर ने आगरा के किले केमुख्य दरवाजे के बाहर जय्मल्जी और पत्ताजी की हाथी पर बैठे आदमकद पाषाण की प्रतिमा लगवाई थी जिसे बाद में औरंगजेब ने हटवा दी थी | इसी प्रकार की उनकी एक प्रतिमा बीकानेर के जूनागढ़ में भी लगवाई गई थी|