परती परिकथा एक उपन्यास है जिसके रचयिता फणीश्वर नाथ रेणु हैं। मैला आँचल के बाद यह रेणु का दूसरा आंचलिक उपन्यास है। इस उपन्यास के साथ ही हिंदी साहित्य जगत दो भागों में विभक्त हो गया: पहला वर्ग तो इसको मैला आँचल से भी बेहतर उपन्यास मानता था, वहीँ, दूसरा वर्ग इसे उपन्यास ही नहीं मानता था। सच में अगर उपन्यास के पारंपरिक मानकों से देखा जाये तो परती परिकथा में काफी अलगाव दिखेगा। यह मैला आँचल जैसा भी एकरेखीय धारा में नहीं चलता, वरन यह तो देश-काल का अतिक्रमण कर एक ही समय में सारे काल को प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों करता है। यह जितना दिखाता है उससे भी ज्यादा छिपाता है। कभी यह पाठकों की परीक्षा लेता है तो कभी यह उसे बिलकुल भौचक ही कर देता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

परती परिकथा  
लेखक फणीश्वरनाथ रेणु
मूल शीर्षक परती परिकथा
भाषा हिंदी
प्रकार उपन्यास
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन तिथि 21 सितम्बर 1957
पृष्ठ 379

जिस प्रकार मैला आँचल में पूरा का पूरा अंचल ही नायक था उसी प्रकार यहाँ भी नायकत्व किसी खास पात्र की बजाय अंचल को ही माना जायेगा किन्तु यहाँ पर कुछ पात्र जैसेकि-जीतेन्द्र मिश्र को नायकत्व के करीब माना जा सकता है। या यूँ कहें कि आंचलिकता को धारण करते हुए भी इस कहानी में मिसर परिवार ही केंद्रीय तत्त्व है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

इसमें पारनपुर गांव कथा के केंद्र में है। गांव में जातियों और उपजातियों की स्थिति वैसे ही है। विभिन्न सरकारी योजनाओं, ग्राम समाज सुधार और विकास योजनाएं, जमींदारी उन्मूलन, लैंड सर्वे ऑपरेशन, कोसी योजना आदि के प्रति लोगों में अपार उत्साह है। उपन्यास का नायक जितेंद्र जित्तन अपने निजी अनुभव से राजनीति की कटुता और षड़यंत्र को बुरा समझता है और सदा उससे दूर रहता है, लेखक ने इसे ही एक आदर्श स्थिति मानकर प्रस्तुत किया है। परती परिकथा के कथा सूत्र जित्तन और उसके पिता शिवेंद्र नाथ मिश्र से जुड़कर ग्राम समाज के प्रतिनिधि अंकन को एक रोचक प्रेम कथा में परिवर्तित कर देते हैं। पूरी कथा को शिवेंद्र तथा ताजमनी और जीत्तन तथा इरावती की प्रेम कथा में सीमित कर दिया गया है।