परमाणु जनदायित्व विधेयक यानी परमाणु दायित्व विधेयक परमाणु दुर्घटना की स्थिति में संबंधित पक्षों के दायित्व को निर्धारित करने वाला विधेयक है। 25 अगस्त को सरकार ने इस विधेयक को संसद में प्रस्तुत किया। 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु संधि को लागू कराने की दिशा में इस विधेयक को अंतिम कदमों के रूप में देखा जा रहा है। ये विधेयक उन अमेरिकी कंपनियों के लिए आवश्यक है जो भारत में परमाणु सामाग्री या रिएक्टरों की आपूर्ति करेंगे। परमाणु दुर्घटना की स्थिति में उन कंपनियों को अमेरिका में बीमा का भुगतान मिल सके, इसके लिए ये कानून आवश्यक है। इस विधेयक के अधिनियम बनने के बाद भारत उन देशों की कतार में शामिल हो जाएगा, जिनके पास ये कानून है।

इस विधेयक को लेकर सरकार को विपक्ष की ओर से भारी प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा. विधेयक के कई अंशों पर विपक्ष को आपत्ति रही। वामदलों ने तो विधेयक को असंवैधानिक और जनविरोधी करार दिया। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने अमेरिका के दबाव में इस विधेयक को तैयार किया। इस विधेयक में परमाणु या नाभिकीय संयंत्र संचालक द्वारा दुर्घटना की स्थिति में दिए जाने वाले अधिकतम मुआवजे को पांच सौ करोड़ रुपये रखा गया है।

इस विधेयक के लिए नाभिकीय ऊर्जा अधिनियम-1962 को संशोधित करना पड़ेगा. भोपाल गैस त्रासदी को देखते हुए औद्योगिक दुर्घटना को भारत में संवेदनशील मुद्दा माना जा रहा है, जिसमें पच्चीस हजार से भी ज्यादा लोग मारे गए थे, इसे विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी माना जाता है।

परमाणु जनदायित्व विधेयक की आवश्यकतासंपादित करें

भारत 2020 तक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में विद्युत के उत्पादन को पांच गुना यानी 20,000 मेगावाट तक बढ़ाना चाहता है। 2032 तक इसे 63000 मेगावाट तक ले जाना चाहता है। अगर भारत ऐसा कर लेगा है तो भारत अपनी आवश्यकता का पच्चीस प्रतिशत ऊर्जा परमाणु संयंत्रों से उत्पादन करेगा। वर्तमान में भारत करीब 4000 मेगावाट परमाणु बिजली पैदा कर रहा है। परमाणु ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए इसमें विदेशी कंपनियों और आपूर्तिकर्ताओं को शामिल करना होगा। हालांकि इस तरह के विधयक के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय बाध्यता नहीं है, पर अमेरिकी कंपनियों जनरल मोटर और वेस्टिंग हाउस को इस क्षेत्र में व्यापार के लिए आमंत्रित करने के लिए इस विधेयक की आवश्यकता है। इस विधेयक से ये कंपनियां अपने देश में बीमा का पैसा ले सकेंगे। इसलिए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के लिए क्रियान्वयन के लिए ये विधेयक और कानून जरूरी है। इस विधेयक का दूसरा उद्देश्य दुर्घटना की स्थिति में प्रभावित लोगों की मदद के लिए सरकार और संचालकों को आर्थिक और कानूनी दायित्व अनुबंधित करना है। हालांकि तकनीकी विकास ने दुर्घटना की आशंकाओं को काफी कम कर दिया है, लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को दरकिनार नहीं किया जा सकता है।

इस विधेयक पर पर आपत्ति इस बात को लेकर है कि दुर्घटना की स्थिति में दिया जाने वाला मुआवजा अपर्याप्त और असंतोषजनक है। दूसरी ओर, विधेयक में ऐसे भी प्रावधान है, जो काफी हद तक परमाणु सामाग्री आपूर्तिकर्ताओं और संचालकों को दायित्वों से मुक्त कर देती है।

अनुच्छेद-6संपादित करें

अनुच्छेद-7संपादित करें

अनुच्धेद17संपादित करें

अनुच्छेद-18संपादित करें

अनुच्छेद-35संपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें