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लोकतंत्र (शाब्दिक अर्थ "लोगों का शासन", संस्कृत में लोक, "जनता" तथा तंत्र, "शासन",) या प्रजातंत्र एक ऐसी शासन व्यव व्यवस्था और लोकतांत्रिक राज्य दोनों के लिये प्रयुक्त होता है। यद्यपि लोकतंत्र शब्द का प्रयोग राजनीतिक सन्दर्भ में किया जाता है, किन्तु लोकतंत्र का सिद्धान्त दूसरे समूहों और संगठनों के लिये भी संगत है। मूलतः लोकतंत्र भिन्न-भिन्न सिद्धान्तो के मिश्रण से बनते है।

अनुक्रम

लोकतंत्र के प्रकारसंपादित करें

लोकतंत्र की परिभाषा के अनुसार यह "जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है"। लेकिन अलग-अलग देशकाल और परिस्थितियों में अलग-अलग धारणाओं के प्रयोग से इसकी अवधारणा कुछ जटिल हो गयी है। प्राचीनकाल से ही लोकतंत्र के सन्दर्भ में कई प्रस्ताव रखे गये हैं, पर इनमें से कई कभी क्रियान्वित नहीं हुए।

Orange colour denoted bhartiye democracy. Yellow colour denoted Soslism

प्रतिनिधि लोकतंत्रसंपादित करें

एक नग्न बालक और एक युवा स्त्री का चित्र - बालक के हाथ में एक पुस्तिका है और वह गणराज्य का प्रतीक है और युवती लोकतंत्र की।

प्रतिनिधि लोकतंत्र में जनता सरकारी अधिकारियों को सीधे चुनती है। प्रतिनिधि किसी जिले या संसदीय क्षेत्र से चुने जाते हैं या कई समानुपातिक व्यवस्थाओं में सभी मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुछ देशों में मिश्रित व्यवस्था प्रयुक्त होती है। यद्यपि इस तरह के लोकतंत्र में प्रतिनिधि जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं, लेकिन जनता के हित में कार्य करने की नीतियां प्रतिनिधि स्वयं तय करते हैं। यद्यपि दलगत नीतियां, मतदाताओं में छवि, पुनः चुनाव जैसे कुछ कारक प्रतिनिधियों पर असर डालते हैं, किन्तु सामान्यतः इनमें से कुछ ही बाध्यकारी अनुदेश होते हैं।

इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जनादेश का दबाव नीतिगत विचलनों पर रोक का काम करता है, क्योंकि नियमित अंतरालों पर सत्ता की वैधता हेतु चुनाव अनिवार्य हैं।

उदार लोकतंत्रसंपादित करें

एक तरह का प्रतिनिधि लोकतंत्र है, जिसमें स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव होते हैं। उदार लोकतंत्र के चरित्रगत लक्षणों में, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, कानून व्यवस्था, शक्तियों के वितरण आदि के अलावा अभिव्यक्ति, भाषा, सभा, धर्म और संपत्ति की स्वतंत्रता प्रमुख है।

प्रत्यक्ष लोकतंत्रसंपादित करें

प्रत्यक्ष लोकतंत्र में सभी नागरिक सारे महत्वपुर्ण नीतिगत फैसलों पर मतदान करते हैं। इसे प्रत्यक्ष कहा जाता है क्योंकि सैद्धांतिक रूप से इसमें कोई प्रतिनिधि या मध्यस्थ नहीं होता। सभी प्रत्यक्ष लोकतंत्र छोटे समुदाय या नगर-राष्ट्रों में हैं। उदाहरण - स्विट्जरलैंड

भारत में लोकतंत्र के प्राचीनतम प्रयोगसंपादित करें

प्राचीन काल मे भारत में सुदृढ़ व्यवस्था विद्यमान थी। इसके साक्ष्य हमें प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों से प्राप्त होते हैं। विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के वर्णन में भी इस बात के प्रमाण हैं।

प्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्था में आजकल की तरह ही शासक एवं शासन के अन्य पदाधिकारियों के लिए निर्वाचन प्रणाली थी। योग्यता एवं गुणों के आधार पर इनके चुनाव की प्रक्रिया आज के दौर से थोड़ी भिन्न जरूर थी। सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। ऋग्वेद तथा कौटिल्य साहित्य ने चुनाव पद्धति की पुष्टि की है परंतु उन्होंने वोट देने के अधिकार पर रोशनी नहीं डाली है।

वर्तमान संसद की तरह ही प्राचीन समय में परिषदों का निर्माण किया गया था जो वर्तमान संसदीय प्रणाली से मिलता-जुलता था। गणराज्य या संघ की नीतियों का संचालन इन्हीं परिषदों द्वारा होता था। इसके सदस्यों की संख्या विशाल थी। उस समय के सबसे प्रसिद्ध गणराज्य लिच्छवि की केंद्रीय परिषद में 7707 सदस्य थे। वहीं यौधेय की केन्द्रीय परिषद के 5000 सदस्य थे। वर्तमान संसदीय सत्र की तरह ही परिषदों के अधिवेशन नियमित रूप से होते थे।

किसी भी मुद्दे पर निर्णय होने से पूर्व सदस्यों के बीच में इस पर खुलकर चर्चा होती थी। सही-गलत के आकलन के लिए पक्ष-विपक्ष पर जोरदार बहस होती थी। उसके बाद ही सर्वसम्मति से निर्णय का प्रतिपादन किया जाता था। सबकी सहमति न होने पर बहुमत प्रक्रिया अपनायी जाती थी। कई जगह तो सर्वसम्मति होना अनिवार्य होता था। बहुमत से लिये गये निर्णय को ‘भूयिसिक्किम’ कहा जाता था। इसके लिए वोटिंग का सहारा लेना पड़ता था। तत्कालीन समय में वोट को 'छन्द' कहा जाता था। निर्वाचन आयुक्त की भांति इस चुनाव की देख-रेख करने वाला भी एक अधिकारी होता था जिसे 'शलाकाग्राहक; कहते थे। वोट देने के लिए तीन प्रणालियां थीं-

(1) गूढ़क (गुप्त रूप से) – अर्थात अपना मत किसी पत्र पर लिखकर जिसमें वोट देने वाले व्यक्ति का नाम नहीं आता था।

(2) विवृतक (प्रकट रूप से) – इस प्रक्रिया में व्यक्ति संबंधित विषय के प्रति अपने विचार सबके सामने प्रकट करता था। अर्थात खुले आम घोषणा।

(3) संकर्णजल्पक (शलाकाग्राहक के कान में चुपके से कहना) - सदस्य इन तीनों में से कोई भी एक प्रक्रिया अपनाने के लिए स्वतंत्र थे। शलाकाग्राहक पूरी मुस्तैदी एवं ईमानदारी से इन वोटों का हिसाब करता था।

इस तरह हम पाते हैं कि प्राचीन काल से ही हमारे देश में गौरवशाली लोकतंत्रीय परम्परा थी। इसके अलावा सुव्यवस्थित शासन के संचालन हेतु अनेक मंत्रालयों का भी निर्माण किया गया था। उत्तम गुणों एवं योग्यता के आधार पर इन मंत्रालयों के अधिकारियों का चुनाव किया जाता था।

मंत्रालयों के प्रमुख विभाग थे-

(1) औद्योगिक तथा शिल्प संबंधी विभाग

(2) विदेश विभाग

(3) जनगणना

(4) क्रय-विक्रय के नियमों का निर्धारण

मंत्रिमंडल का उल्लेख हमें अर्थशास्त्र, मनुस्मृति, शुक्रनीति, महाभारत, इत्यादि में प्राप्त होता है। यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रंथों में इन्हें 'रत्नि' कहा गया। महाभारत के अनुसार मंत्रिमंडल में 6 सदस्य होते थे। मनु के अनुसार सदस्य संख्या 7-8 होती थी। शुक्र ने इसके लिए 10 की संख्या निर्धारित की थी।

इनके कार्य इस प्रकार थे:-

(1) पुरोहित- यह राजा का गुरु माना जाता था। राजनीति और धर्म दोनों में निपुण व्यक्ति को ही यह पद दिया जाता था।

(2) उपराज (राजप्रतिनिधि)- इसका कार्य राजा की अनुपस्थिति में शासन व्यवस्था का संचालन करना था।

(3) प्रधान- प्रधान अथवा प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य था। वह सभी विभागों की देखभाल करता था।

(4) सचिव- वर्तमान के रक्षा मंत्री की तरह ही इसका काम राज्य की सुरक्षा व्यवस्था संबंधी कार्यों को देखना था।

(5) सुमन्त्र- राज्य के आय-व्यय का हिसाब रखना इसका कार्य था। चाणक्य ने इसको समर्हत्ता कहा।

(6) अमात्य- अमात्य का कार्य संपूर्ण राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का नियमन करना था।

(7) दूत- वर्तमान काल की इंटेलीजेंसी की तरह दूत का कार्य गुप्तचर विभाग को संगठित करना था। यह राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील विभाग माना जाता था।

इनके अलावा भी कई विभाग थे। इतना ही नहीं वर्तमान काल की तरह ही पंचायती व्यवस्था भी हमें अपने देश में देखने को मिलती है। शासन की मूल इकाई गांवों को ही माना गया था। प्रत्येक गांव में एक ग्राम-सभा होती थी। जो गांव की प्रशासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था से लेकर गांव के प्रत्येक कल्याणकारी काम को अंजाम देती थी। इनका कार्य गांव की प्रत्येक समस्या का निपटारा करना, आर्थिक उन्नति, रक्षा कार्य, समुन्नत शासन व्यवस्था की स्थापना कर एक आदर्श गांव तैयार करना था। ग्रामसभा के प्रमुख को ग्रामणी कहा जाता था।

सारा राज्य छोटी-छोटी शासन इकाइयों में बंटा था और प्रत्येक इकाई अपने में एक छोटे राज्य सी थी और स्थानिक शासन के निमित्त अपने में पूर्ण थी। समस्त राज्य की शासन सत्ता एक सभा के अधीन थी, जिसके सदस्य उन शासन-इकाइयों के प्रधान होते थे।

एक निश्चित काल के लिए सबका एक मुख्य अथवा अध्यक्ष निर्वाचित होता था। यदि सभा बड़ी होती तो उसके सदस्यों में से कुछ लोगों को मिलाकर एक कार्यकारी समिति निर्वाचित होती थी। यह शासन व्यवस्था एथेन्स में क्लाइस्थेनीज के संविधान से मिलती-जुलती थी। सभा में युवा एवं वृद्ध हर उम्र के लोग होते थे। उनकी बैठक एक भवन में होती थी, जो सभागार कहलाता था।

एक प्राचीन उल्लेख के अनुसार अपराधी पहले विचारार्थ 'विनिच्चयमहामात्र' नामक अधिकारी के पास उपस्थित किया जाता था। निरपराध होने पर अभियुक्त को वह मुक्त कर सकता था पर दण्ड नहीं दे सकता था। उसे अपने से ऊंचे न्यायालय भेज देता था। इस तरह अभियुक्त को छः उच्च न्यायालयों के सम्मुख उपस्थित होना पड़ता था। केवल राजा को दण्ड देने का अधिकार था। धर्मशास्त्र और पूर्व की नजीरों के आधार पर ही दण्ड होता था।

देश में कई गणराज्य विद्यमान थे। मौर्य साम्राज्य का उदय इन गणराज्यों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। परन्तु मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात कुछ नये लोकतांत्रिक राज्यों ने जन्म लिया। यथा यौधेय, मानव और आर्जुनीयन इत्यादि।

प्राचीन भारत के कुछ प्रमुख गणराज्यों का ब्योरा इस प्रकार है:-

शाक्य- शाक्य गणराज्य वर्तमान बस्ती और गोरखपुर जिला (उत्तर प्रदेश) के क्षेत्र में स्थित था। इस गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी। यह सात दीवारों से घिरा हुआ सुन्दर और सुरक्षित नगर था। इस संघ में अस्सी हजार कुल और पांच लाख जन थे। इनकी राजसभा, शाक्य परिषद के 500 सदस्य थे। ये सभा प्रशासन और न्याय दोनों कार्य करती थी। सभाभवन को सन्यागार कहते थे। यहां विशेषज्ञ एवं विशिष्ट जन विचार-विमर्श कर कोई निर्णय देते थे। शाक्य परिषद का अध्यक्ष राजा कहलाता था। भगवान बुद्ध के पिता शुद्धोदन शाक्य क्षत्रिय राजा थे। कौसल के राजा प्रसेनजित के पुत्र विडक्घभ ने इस गणराज्य पर आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया था।

लिच्छवि- लिच्छवि गणराज्य गंगा के उत्तर में (वर्तमान उत्तरी बिहार क्षेत्र) स्थित था। इसकी राजधानी का नाम वैशाली था। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बसाढ़ ग्राम में इसके अवशेष प्राप्त होते हैं। लिच्छवि क्षत्रिय वर्ण के थे। वर्द्धमान महावीर का जन्म इसी गणराज्य में हुआ था। इस गणराज्य का वर्णन जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में प्रमुख रूप से मिलता है। वैशाली की राज्य परिषद में 7707 सदस्य होते थे। इसी से इसकी विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। शासन कार्य के लिए दो समितियां होती थीं। पहली नौ सदस्यों की समिति वैदेशिक सम्बन्धों की देखभाल करती थी। दूसरी आठ सदस्यों की समिति प्रशासन का संचालन करती थी। इसे इष्टकुल कहा जाता था। इस व्यवस्था में तीन प्रकार के विशेषज्ञ होते थे- विनिश्चय महामात्र, व्यावहारिक और सूत्राधार।

लिच्छवि गणराज्य तत्कालीन समय का बहुत शक्तिशाली राज्य था। बार-बार इस पर अनेक आक्रमण हुए। अन्तत: मगधराज अजातशत्रु ने इस पर आक्रमण करके इसे नष्ट कर दिया। परंतु चतुर्थ शताब्दी ई. में यह पुनः एक शक्तिशाली गणराज्य बन गया।

वज्जि- लिच्छवि, विदेह, कुण्डग्राम के ज्ञातृक गण तथा अन्य पांच छोटे गणराज्यों ने मिलकर जो संघ बनाया उसी को वज्जि संघ कहा जाता था। मगध के शासक निरन्तर इस पर आक्रमण करते रहे। अन्त में यह संघ मगध के अधीन हो गया।

अम्बष्ठ- पंजाब में स्थित इस गणराज्य ने सिकन्दर से युद्ध न करके संधि कर ली थी।

अग्रेय- वर्तमान अग्रवाल जाति का विकास इसी गणराज्य से हुआ है। इस गणराज्य में सिकंदर की सेनाओं का डटकर मुकाबला किया। जब उन्हें लगा कि वे युद्ध में जीत हासिल नहीं कर पायेंगे तब उन्होंने स्वयं अपनी नगरी को जला लिया।

इनके अलावा अरिष्ट, औटुम्वर, कठ, कुणिन्द, क्षुद्रक, पातानप्रस्थ इत्यादि गणराज्यों का उल्लेख भी प्राचीन गंथों में मिलता है।

लोकतंत्र की अवधारणासंपादित करें

प्रत्येक राज्य चाहे वह उदारवादी हो या समाजवादी या साम्यवादी, यहां तक कि सेना के जनरल द्वारा शासित पाकिस्तान का अधिनायकवादी भी अपने को लोकतांत्रिक कहता है। सच पूछा जाए तो आज के युग में लोकतांत्रिक होने को दावा करना एक फैशन सा हो गया है।

लोकतंत्र की पूर्णतः सही और सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है। क्रैन्स्टन ने ठीक ही कहा है कि लोकतंत्र के संबंध में अलग-अलग धारणाएं है। लिण्सेट की परिभाषा अधिक व्यापक प्रतीत होती हैं उसके अनुसार, “लोकतंत्र एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है जो पदाधिकारियों को बदल देने के नियमित सांविधानिक अवसर प्रदान करती है और एक ऐसे रचनातंत्र का प्रावधान करती है जिसके तहत जनसंख्या का एक विशाल हिस्सा राजनीतिक प्रभार प्राप्त करने के इच्छुक प्रतियोगियों में से मनोनुकूल चयन कर महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करती है।” मैक्फर्सन ने लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए इसे ‘एक मात्र ऐसा रचनातंत्र माना है जिसमें सरकारों को चयनित और प्राधिकृत किया जाता है अथवा किसी अन्य रूप में कानून बनाए और निर्णय लिए जाते हैं।‘ शूप्टर के अनुसार, ‘लोकतांत्रिक विधि राजनीतिक निर्णय लेने हेतु ऐसी संस्थागत व्यवस्था है जो जनता की सामान्य इच्छा को क्रियान्वित करने हेतु तत्पर लोगों को चयनित कर सामान्य हित को साधने का कार्य करती है। वास्तव में, लोकतंत्र मूलतः नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए सहभागी राजनीति से संबद्ध प्रणाली है। लोकतंत्र की अवधारणा के संबंध में प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

1. लोकतंत्र का पुरातन उदारवादी सिद्धान्त
2. लोकतंत्र का अभिजनवादी सिद्धान्त
3. लोकतंत्र का बहुलवादी सिद्धान्त
4. प्रतिभागी लोकतंत्र का सिद्धान्त
5. लोकतंत्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त अथवा जनता का लोकतंत्र

लोकतंत्र का पुरातन उदारवादी सिद्धान्तसंपादित करें

लोकतंत्र की उदारवादी परंपरा में स्वतंत्रता, समानता, अधिकार, धर्म निरपेक्षता और न्याय जैसी अवधारणाओं का प्रमुख स्थान रहा है और उदारवादी चिंतक आरंभ से ही इन अवधारणाओं को मूर्त रूप देने वाली सर्वोत्तम प्रणाली के रूप में लोकतंत्र की वकालत करते रहे हैं। नृपतियों और सामंती प्रभुओं से मुक्ति के बाद समाज के शासन-संचालन की दृष्टि से लोकतंत्र को स्वाभाविक राजनीतिक प्रणाली के रूप में स्वीकार किया गया। मैक्फर्सन का कहना है कि पाश्चात्य जगत में लोकतंत्र के आगमन के पहले ही चयन की राजनीति, प्रतियोगी राज्य व्यवस्था और मार्किट की राज्यव्यवस्था जैसी अवधारणाएं विकसित हो चुकी थीं। हकीकत में इस अर्थ में उदार राज्य का ही लोकतंत्रीकरण हो गया, न कि लोकतंत्र का उदारीकरण। लोकतांत्रिक भावना के आंरभिक चिह्न टॉमसमूर (यूटोपिया, 1616) और विंस्टैनले जैसे अंग्रेज विचारकों और अंग्रेज अतिविशुद्धतावाद (प्यूरिटैनिजन्म) के साहित्य में पाया जा सकता है, किन्तु लोकतांत्रिक भावना की सही शुरुआत सामाजिक संविदा के सिद्धान्त के जन्म के साथ हुई, क्योंकि नागरिकों के सामाजिक अनुबंध की अन्तर्निहित भावना ही सभी व्यक्तियों की समानता है। थॉमस हॉब्स ने अपनी पुस्तक ‘लेवियाथन‘ (1651) में प्रमुख लोकतांत्रिक सिद्धान्त की वकालत करते हुए लिखा कि सरकार का निर्माण जनता द्वारा एक सामाजिक संविदा के तहत होता है। जॉन लॉक का कहना था कि सरकार जनता के द्वारा और उसी के हित के लिए होनी चाहिए। एडम स्मिथ ने मुक्त बाजार का प्रतिमान इस लोकतांत्रिक आधार पर ही प्रस्तुत किया कि प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादन करने, खरीदने और बेचने की स्वतंत्रता है। प्रसिद्ध उपयोगितावादी दार्शनिक मिल और बेंथम ने पूरी तरह लोकतंत्र का समर्थन किया और उपयोगितावाद के माध्यम से इसे प्रभावी बौद्धिक आधार प्रदान किया। उनके अनुसार, लोकतंत्र उपयोगितावाद अर्थात् अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को अधिकतम संरक्षण प्रदान करता है, क्योंकि लोग अपने शासकों से तथा एक दूसरे से संरक्षण की अपेक्षा रखते हैं और इस संरक्षण को सुनिश्चित करने के सर्वोत्तम तरीके हैं, प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र, संवैधानिक सरकार, नियमित चुनाव, गुप्त मतदान, प्रतियोगी दलीय राजनीति और बहुमत के द्वारा शासन। जे. एस. मिल ने बेंथम द्वारा लोकतंत्र के पक्ष में प्रस्तुत तर्क में एक और बिन्दु जोड़ते हुए कहा कि लोकतंत्र किसी भी अन्य शासन-प्रणाली की तुलना में मानवजाति के नैतिक विकास में सर्वाधिक योगदान करता है। उसकी दृष्टि में लोकतंत्र नैतिक आत्मोत्थान और वैयक्तिक क्षमताओं के विकास एवं विस्तार का सर्वोच्च माध्यम है। इस संबंध में यह उल्लेख्य है कि बेंथम और मिल दोनों में कोई भी सार्वभौम वयस्क मताधिकार अथवा एक व्यक्ति एक मत के पक्षधर नहीं थे। 1802 तक बेंथम ने सीमित मताधिकार की वकालत की और 1809 में सिर्फ संपन्न वर्गों के गृहस्वामियों के लिए सीमित मताधिकार का नारा दिया और अंततोगत्वा 1817 में सार्वभौम मताधिकार का आह्वान किया, लेकिन इस अधिकार को मर्दों तक ही सीमित रखा। इसी प्रकार मिल भी सार्वभौम वयस्क मताधिकार के पक्ष में नही था, क्योंकि उसे आशंका थी कि एक वर्ग के लोग बहुसंख्यक होने की स्थिति अपना प्रभुत्व कायम कर सकते है और अन्य वर्गों के हित के विरुद्ध सिर्फ अपने हित के नियम-कानून बना सकते हैं। आगे चलकर उसने अपनी पुस्तक ‘रिप्रेजेंटेंटिव गवर्नमेंट‘ (प्रतिनिधिमूलक सरकार, 1816) में उसने कुछ लोगों के लिए एक से अधिक मतदान की वकालत की लेकिन खैरात पाने वाले अकिंचनों, निरक्षरों, दिवालियों, कर नहीं चुकाने वालों को, अर्थात् उन सभी लोगों को जो संयुक्त रूप से श्रमिक वर्ग का निर्माण करते हैं, इससे वंचित रखा। वह सिर्फ एक ऐसी प्रतिनिधिमूलक सरकार का हिमायती था जो आधारभूत समानताओं में दखलअंदाजी नही करती और मुक्त बाजार और हस्तक्षेप की नीति अपना कर चलती है। बाद के उदारवादी विचारक लोकतंत्र का समर्थन करते रहे और पश्चिमी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका ने इसकी स्वीकार्यता को और आगे बढ़ाने का काम किया।

लोकतंत्रके संबंध में पुरातन उदारवादी मत को समय-समय पर अनेक विचारकों द्वारा चुनौतियां मिलती रही हैं। प्रथमतः, लोकतंत्र की इस मान्यता पर प्रश्न खड़े किए गए हैं कि प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि उसके लिए सर्वोत्तम क्या है। लॉर्ड ब्राइस, ग्राहम वाल्स इत्यादि विचारक मानते हैं कि मनुष्य उतना विवेकशील, तटस्थ, जानकार अथवा सक्रिय नहीं है जितना कि प्रजातंत्र के संचालन के लिए उसे मान लिया जाता है। द्वितीयतः, लोकतंत्र जनता के शासन की आधारशिला पर टिका होता है, किन्तु यह स्पष्टतः बतलाना आसान नहीं है कि ‘शासन‘ और ‘जनता‘ के बिल्कुल सही अर्थ क्या है। इसलिए सरकार के आधार के रूप में लोकमत एक मिथक है। तृतीयतः लोकतंत्र से अपेक्षा की जाती है कि वह सामान्य हित का काम करेगा, लेकिन सामान्य हित जैसी कोई चीज नहीं भी हो सकती है। किसी भी समाज में सामान्य हित विभिन्न लोगों के लिए विभिन्न अर्थ रख सकता है। चतुर्थतः, पुरातन उदारवादी सिद्धान्त समूह मनोविज्ञान, सामूहिक उत्पीड़न और प्रत्यायन तथा जनोत्तेजक नेतृत्व जैसे कारकों की उपेक्षा कर देता है। पंचमतः, लोकतंत्र में दलीय प्रणाली प्रायः अभिजात्य वर्ग का खेल बन जाती है अथवा उनके द्वारा नियंत्रित होती है जो साधन संपन्न है और वे ही महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय लेते हैं। फिर, नीति-निर्धारण की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। उदारवादियों ने अनावश्यक रूप से इसे सरल, पारदर्शी और न्यायसंगत मान लिया है। और सबसे बड़ी त्रुटि इस सिद्धान्त में यह है कि यह राजनीतिक समानता किन्तु आर्थिक विषमता पर आधारित है।

लोकतंत्र का अभिजनवादी सिद्धान्तसंपादित करें

बीसवीं सदी में राजनीतिक विचारकों ने प्रश्न उठाना शुरू किया कि क्या जनसाधारण प्रतिदिन के जीवन में राजनीति में कोई भूमिका निभा सकते हैं? क्या सामान्य नागारिक, जो अपने जीविकोपार्जन में लगे रहते हैं, राजनीतिक भूमिका निभाने के लिए समय और शक्ति लगा सकते हैं? क्या जनसमूह बिना किसी प्रतिबंध के चुनावी लोकतंत्र के माध्यम से अपनी भावनाओं का खुला प्रदर्शन करता है तो स्वतंत्रता नष्ट हो जाएगी? इन प्रश्नों के उत्तर में ही लोकतंत्र के अभिजनवादी और बहुलवादी सिद्धान्त विकसित हुए हैं।

अभिजन (एलीट) पद का प्रयोग किसी समूह के ऐसे अल्पसंख्यक वर्ग के लिए होता है जो कुछ कारकों की वजह से समुदाय में विशिष्ट हैसियत रखते हैं। यह अल्पसंख्यक वर्ग समाज में सत्ता के वितरण में अग्रणी भूमिका में होता है। राजनीतिक श्रेष्ठीवर्ग, प्रेस्थस के अनुसार, सामुदायिक मामलों में अपने संख्या-बल के अनुपात में कहीं ज्यादा सत्ता का उपभोग करता है।

प्रजातंत्र के सबंध में अभिजन सिद्धान्त का अभ्युदय द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ इस सिद्धान्त के प्रवर्त्तकों में विल्फ्रेडो पैरेटो, ग्रेटानोमोस्का, रॉबर्ट मिशेल्स और अमेरिकी लेखक जेम्स बर्नहाम तथा सी. राइट मिल्स प्रमुख हैं। इस सिद्धान्त का मुख्य आधार यह मान्यता है कि समाज में दो तरह के लोग होते हैं- गिने चुने विशिष्ट लेग और विशाल जनसमूह। विशिष्ट लोग हमेशा शिखर तक पहुँचते हैं क्योंकि वे सारी अर्हताओं से सम्पन्न सर्वोत्तम लोग होते हैं। अभिजन वर्ग विशेष रूप से राजनीतिक अभिजन वर्ग, सारे राजनीतिक कृत्यों का निष्पादन करता है, सत्ता पर एकाधिकार कर लेता है और सत्ता से जुड़े सारे लाभ उठाता है। बहुसंख्यक समूह अभिजन वर्ग द्वारा मनमाने ढंग से नियंत्रित और निर्देशित होता है। संगठित अल्पसंख्यक ही हमेशा असंगठित जनसमूह को शासित और निर्देशित करता है। रॉबर्ट मिशेल्स ने ‘अल्पतंत्र के लौह कानून‘ जैसी उक्ति का प्रयोग करते हुए कहा है कि सामान्य वर्गों को अभिजन वर्ग की अधीनता स्वीकार करनी ही चाहिए क्योंकि जनसंख्या का एक विशाल भाग उदासीन कर्मण्य और स्व-शासन में अक्षम होता है। लोकतंत्र के अभिजन सिद्धान्त की मुख्य विशेषताए हैं :

  • (1) लोग समान रूप से योग्य नहीं होते, अतः अभिजन और गैर-अभिजन का निर्माण अपरिहार्य है,
  • (2) अपनी उच्चतर योग्यताओं के बल पर अभिजनवर्ग सत्ता-नियंत्रक एवं प्रभविष्णु बन जाता है,
  • (3) अभिजनवर्ग अनवरत एक जैसा नहीं रहता। इस वर्ग में नए लोग शामिल होते हैं और पुराने लोग बाहर हो जाते है,
  • (4) बहुसंख्यक जनसमुदाय, जो गैर-अभिजनवर्ग का निर्मायक है, में अधिकांश भावशून्य, आलसी और उदासीन होते हैं, इसलिए एक ऐसा अल्पसंख्यक वर्ग का होना आवश्यक है जो नेतृत्व प्रदान करे और
  • (5) आज के युग में शासक अभिजनवर्ग में मुख्य रूप से बुद्धिजीवी, औद्योगिक प्रबंधक और नौकरशाह होते हैं।

लोकतंत्र के अभिजन सिद्धान्त का सुव्यवस्थित प्रतिपादन सर्वप्रथम जोसेफ शुंप्टर ने अपनी पुस्तक ‘कैपिटलिज्म, सोशलिज्म एंड डेमोक्रेसी‘ (पूंजीवाद, समाजवाद और लोकतंत्र, 1942) में किया। बाद में सार्टोरी, रॉबर्ट डाल, इक्सटाईन, रेमंड अरोन, कार्ल मैन हियुमंड, सिडनी वर्बा आदि ने अपनी रचनाओं में इस मत का समर्थन किया। लोकतंत्र की यह अवधारणा इस मान्यता पर आधारित है कि जनसंख्या का विशाल भाग अक्षम और तटस्थ होता है और वह योग्यता और क्षमता के आधार पर कुछ लोगों का चुनाव करता है जो राजनीतिक दल का नियंत्रित और संचालित करते हैं। बहुसंख्यक लोग जीविका कमाने में व्यस्त रहते हैं। उन्हें राजनीतिक मामलों में न तो अभिरूचि होती है, न समझ। इसलिए वे अभिजनवर्ग से कुछ लोगों का चयन कर लेते हैं और उनके अनुयायी बन जाते हैं। अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आज के जटिल समाज में कार्यक्षमता के लिए विशेषज्ञता आवश्यक है और विशेषज्ञों की संख्या हमेशा कम ही होती है। अतः राजनैतिक नेतृत्व ऐसे चुनिंदा सक्षम लोगों के हाथ में होना आवश्यक है। यह सिद्धान्त लोगो की अतिसहभागिता को भी खतरनाक मानता है, क्योंकि तानाशाही प्रवृत्ति का हिटलर जैसा कोई ताकतवर नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जनसमूह को लामबंद कर लोकतंत्र को ही खत्म कर दे सकता है जिसका सीधा अर्थ है मौलिक स्वतंत्रताओं का अंत। इसलिए उनका दावा है कि लोकतांत्रिक और उदारवादी मूल्यों को बचाए रखने के लिए जनसमूह को राजनीति से अलग रखना जरूरी है। अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आम जनता के द्वारा वास्तविक शासन हो ही नहीं सकता। शासन हमेशा जनता के लिए होता है, जनता के द्वारा कभी नही, क्योंकि जनता जिन्हें प्रतिनिधि चुनती है वे अभिजनवर्ग के ही होते हैं। दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का अर्थ है अभिजन वर्गां के बीच प्रतिद्वन्द्विता और जनता द्वारा यह निर्णय कि कौनसा अभिजन ऊपर शासन करेगा। इस प्रकार, लोकतंत्र मात्र एक ऐसी कार्यप्रणाली है जिसके द्वारा छोटे समूहों में से एक जनता के न्युनतकम अतिरिक्त समर्थन से शासन करता हैं अभिजनवादी सिद्धान्त यह भी मानता है कि अभिजन वर्गों- राजनीतिक दलों, नेताओं, बड़े व्यापारी घरानों के कार्यपालकों, स्वैच्छिक संगठनों के नेताओं और यहां तक कि श्रमिक संगठनों के बीच मतैक्य आवश्यक है ताकि लोकतंत्र की आधारभूत कार्यप्रणाली को गैर जिम्मदार नेताओं से बचाया जा सके। इससे यह स्पष्ट होता है कि बाह्य तौर पर तो अभिजन वर्ग सिद्धान्त लोकतंत्र के विचार को अधिक व्यवहारवादी और आनुभविक बनाने का दावा करती है, लेकिन अंततः यह लोकतंत्र को एक ऐसे रूढ़िवादी राजनीतिक सिद्धान्त में बदल देता है जो उदारवादी अथवा नव-उदारवादी यथास्थितिवाद से संतुष्ट हो जाता है और इसके स्थायित्व को बनाए रखना चाहता है।

अभिजनवाद की कई विचारकों ने आलोचना की है जिनमें सी. बी. मैक्फर्सन, ग्रीम डंकन, बैरी होल्डन, रॉबर्ट डाल आदि प्रमुख हैं। इस सिद्धान्त के विरुद्ध मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:

  • (1) अभिजनवाद लोकतंत्र का अर्थ ही विकृत कर देता है और इसकी आधारभूत विशेषताओं की उपेक्षा कर इसे स्वेच्छाचारी बना देता है। यदि जनता का काम प्रतिनिधियों को चुनना भर ही है तो शासन संचालन में उनके पास बोलने-कहने को अधिकार नहीं रह जाता और ऐसी स्थिति में प्रणाली अलोकतांत्रिक बन जाती है।
  • (2) यह सिद्धान्त लोकतंत्र की परंपरागत पुरातन अवधारणा के नैतिक उद्देश्य को समाप्त कर देता है पुरातन अवधारणा के अनुसार लोकतंत्र का लक्ष्य मानवजाति का उन्नयन है, लेकिन अभिजन सिद्धान्त इस नैतिक पक्ष की अवहेलना कर देता है और पूरी स्थिति अल्पसंख्यक अभिजनवर्ग के शासन की निष्क्रिय स्वीकृति हो जाती है।
  • (3) अभिजन सिद्धान्त सहभागिता, जो लोकतांत्रिक शासन का केन्द्रीय तत्त्व है, का महत्त्व घटा देता है और दावा करता है कि सहभागिता संभव है ही नहीं। इस तरह जनता द्वारा शासन असंभव हो जाता है।
  • (4) अभिजन सिद्धान्त एक सामान्य व्यक्ति को राजनीतिक दृष्टि से अक्षम और निष्क्रिय रूप में चित्रित करता है, एक ऐसा व्यक्ति जो अपना जीवन-निर्वाह करता है, शाम में अपने परिवार या मित्रों के बीच अथवा मीडिया के साधनों के उपयोग में अपना समय बिताता है और श्रेष्ठी समूहों में से किसी एक को समय-समय पर चुनने के अतिरिक्त कुछ नही करता।
  • (5) अभिजन सिद्धान्त लोकतांत्रिक प्रक्रिया के द्वारा मौलिक परिवर्तन लाने के बदले प्रणाली के स्थायित्व बनाए रखने पर ही विशेष बल देता है। उसका मुख्य उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रणाली को कायम रखना है। वह सामाजिक आन्दोलन को लोकतंत्र के लिए खतरा और अभिजनवर्ग द्वारा व्यवस्थित कानूनी प्रक्रिया का विघटनकारी मानता है।

लोकतंत्र का बहुलवादी सिद्धान्तसंपादित करें

लोकतंत्र का बहुलवादी सिद्धान्त भी जन सामान्य के बदले समूहों की भूमिका पर बल देता है। कुछ विचारकों ने लोकतंत्र संबंधी ऐसे सिद्धान्तों का निरूपण किया है जो अभिजन सिद्धान्त और बहुलवादी सिद्धान्त का मिश्रण है। लेकिन यह भी सही है कि बहुलवादी सिद्धान्त की उत्पत्ति अभिजन सिद्धान्त की आंशिक प्रतिक्रिया के रूप में हुई है। अभिजन सिद्धान्त एक ऐसी स्थिति के निर्माण से संतुष्ट है जिसमें सत्ता ऐसे अभिजनवर्ग में निहित होती है जो महत्त्वपूर्ण निर्णय लेता है, लेकिन बहुलवादी एक ऐसी प्रणाली पर जोर देता है जो उदारवादी लोकतंत्र में अभिजनवाद की प्रवृत्ति को निष्प्रभावी कर देगा और सही जनाकांक्षा को प्रकट करेगा।

बहुलवाद की अवधारणा वैसे तो पुरानी है, किन्तु बीसवीं सदी में आधुनिक उदारवादी चिंतन का यह एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गया। सामान्य अर्थ में बहुलवाद सत्ता को समाज में एक छोटे से समूह तक सीमित करने के बदले उसे प्रसारित और विकेन्द्रीकृत कर देता है। आधुनिक औद्योगिक और प्रौद्योगिक काल में, बहुलवादियों के अनुसार, सत्ता विखंडित हो गई है और इसमें प्रतियोगी सार्वजनिक और निजी समूहों की साझेदारी बढ़ गई है। उच्च स्थानों पर आसीन लोगों के पास पूर्व की भांति सत्ता नहीं रह गई है, क्योंकि वे मुख्य रूप से परस्पर विरोधी स्वार्थों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने लगे। विभिन्न समूह अपने नेतृत्व के माध्यम से मध्यस्थता करते हैं और इसके जरिए व्यक्ति का भी प्रतिनिधित्व हो जाता है। यद्यपि औद्योगिक और प्रौद्योगिक एकीकरण और प्रौद्योगिक अभियाचनाओं के कारण सत्ता कुछ ही व्यक्तियों में केन्द्रित हो गई है लेकिन अल्पसंख्यक किन्तु वृहत्तर, हित-समूहों के बीच प्रतियोगिता सार्वजनिक हित के पक्ष में जाती है। बड़े व्यापारी घरानों, श्रम और सरकार के बीच प्रतियोगिता ने प्रत्येक समूह को अपनी सत्ता का दुरुपयोग करने पर लगाम कसी है। इस प्रकार, नागरिकों के बीच संपत्ति, शिक्षा और सत्ता में असमानता को निम्न प्रभावित कर दिया जाता है क्योंकि संगठन और समूह आशा से अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान करते है और इससे लोकतंत्र अधिक वास्तविक बनता है और इस अर्थ में अधिक व्यवहार्य भी सिद्ध होता है। भारत का ही उदाहरण लें। यहां महेन्द्र सिंह टिकैत का किसान संगठन और नर्मदा बचाओ आन्दोलन ऐसे जन आन्दोलन हैं जो लाखों गरीब और अशिक्षित लोगों की आवाज़ बन जाते हैं। और लोकतंत्र को निश्चय ही अधिक वास्तविक बनाते हैं। यह सही है कि अभिजनवर्ग और उनके समाचार मीडिया उनकी आलोचना करते हैं और उन्हें प्रगति का बाधक बताते हैं और यदा कदा सर्वोच्च न्यायालय भी उन्हें अपने आन्दोलनों को रोक देने के लिए बाध्य करता है, किन्तु इस सब के बावजूद ऐसे जनान्दोलन भारतीय लोकतंत्र को अधिक सार्थक और प्रतिनिधिमूलक बनाते हैं। लोकतंत्र की बहुवादी अवधारणा का विकास मुख्य रूप से अमेरिका में हुआ। इसके प्रणेताओं में एस. एम. लिण्सेट, रॉबर्ट डाल, वी. प्रेस्थस, एफ. हंटर आदि प्रमुख हैं। उनका तर्क है कि राजनीतिक सत्ता उतनी सरल नहीं है जितनी दिखाई पड़ती है, यह विभिन्न समूहों, संगठनों, वर्गों और संघों समेत अभिजन वर्ग जो आमतौर पर समाज को नेतृत्व प्रदान करता है के बीच बंटी हुई है। विभिन्न स्वार्थ समूह अपनी मांगों को सीधे तौर पर तो प्रस्तुत करते ही हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों के माध्यम से भी पेश करते हैं। बहुलवादी लोकतंत्र की एक परिभाषा इस प्रकार दी गई है। यह एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है जिसमें नीतियां विभिन्न समूहों के बीच पारस्परिक परामर्श और विचारों के आदान प्रदान के द्वारा निर्धारित की जाती है क्योंकि कोई भी समूह या अभिजनवर्ग इतना सशक्त नही है कि वह अकेले सरकार पर इतना दबाब डाल सके कि वह उसकी सारी माँगों को पूरा कर सके।

बहुलवादी सत्ता की इस साझेदारी का अनुमोदन करते हैं कि इससे लाभ यह होता है कि कोई भी सामाजिक समूह सरकार की नीति- निर्धारण की प्रक्रिया पर इस कदर हावी नहीं हो पाता कि वह अन्य वर्गों के हितों की अनदेखी कर सके। लेकिन, बहुलवादी सिद्धान्तकारों की एक मान्यता यह भी थी कि सभी नागरिकों को राजनीतिक क्षेत्र में अपने हितों को संघटित करने और उन्हें साधने के लिए वैधानिक अवसर और आर्थिक संसाधन प्राप्त हैं। इस अवसर के बगैर नागारिक किसी प्रस्तावित कदम का समर्थन या विरोध नहीं कर सकते। बहुलवादी विचारक राजनीति को व्यक्तियों के बदले समूहों के बीच निश्चयों की प्रक्रिया मानते हैं और घोषणा करते हैं कि लोकतंत्र सर्वोत्तम तरीके से तभी काम करता है जब नागरिक अपने विशेष हितों के समर्थक समूह से जुड़ जाते हैं। वे इस बात पर विशेष बल देते हैं कि किसी समाज में व्यक्तियों की सक्रिय सहभागिता होनी चाहिए और अपने संकल्प को क्रियान्वित करने के लिए विभिन्न समूहों से जुड़ जाना चाहिए। साथ ही, सारे समूहों और उनके सदस्यों को यह स्वीकार करना चाहिए कि चुनाव राजनीतिक निर्णयों में विशाल समुदाय की सहभागिता का एक कारगर हथियार है। इसी तरह, अभिजन वर्ग के सारे समूह और सदस्य पारस्परिक प्रतियोगिता के द्वारा लोकतंत्र को संभव बनाते हैं। इससे स्पष्ट है कि बहुलवादी सिद्धान्त वास्तव में अभिजनवाद का पूर्णतः विरोध नहीं करता क्योंकि इसके प्रवर्तकों के अनुसार अभिजनवर्ग का अस्तित्व एक हकीकत है और वे उसकी अवस्थिति से संतुष्ट है। यही कारण है कि बहुलवादी सिद्धान्तों कभी-कभार अभिजनवर्ग सिद्धान्तों से आंशिक रूप में ही भिन्न समझा जाता है। महान अमेरिकी राजनीतिक विचारक रॉबर्ट डाल लोकतंत्र की अभिजनवादी और बहुलवादी अभिधारणाओं को संयुक्त करते हुए अपनी लोकतांत्रिक अभिधारणा को बहुतंत्र की संज्ञा देता है। उसके अनुसार, जनता समूहों और अभिजनवर्ग के राजनीतिज्ञों दोनों के माध्यम से सक्रिय होती है। उसने अनेक ऐसे समुदायों का हवाला दिया है जो सरकार के नीति-निर्धारण को प्रभावित करते हैं- जैसे, व्यापारी घराने और उद्योगपति, सौदागर, श्रमिक संगठन, किसान संगठन, उपभोक्ता, मतदाता इत्यादि। ऐसा नहीं है कि उनकी पूरी कार्यसूची क्रियान्वित हो ही जाती है। सारे समूह समान रूप से सशक्त नहीं होते और अनेक समूह अपनी मनोनुकूलनीतियों को मनवाने की अपेक्षा प्रतिकूलनीतियों की रोकथाम में ज्यादा प्रभावी होते हैं।

बहुलवादी सिंद्धान्त के विरुद्ध उठाई जाने वाली आपत्तियों में निम्नलिखित प्रमुख हैं:

  • (१) बहुलवादी सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अलग-अलग समूहों के बीच हितों के टकराव के फलस्वरूप उन हितों अथवा उनके अंश को प्रोत्साहन मिलता है जो स्वीकार किए जाने के योग्य होते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि इस टकराव के कारण यथास्थिति अथवा गत्यावरोध के हालात बन जाते हैं। कभी-कभी तो और बदतर स्थिति हो जाती है जब एक समूह-विशेष अपनी संपूर्ण कार्य सूची को मनवा लेता है जिसके फलस्वरूप अन्य समूह आक्रोशित हो उठते हैं।
  • (२) बहुलवादी सिद्धान्त का सूत्र-वाक्य है कि लोग अपने हितों की सीधे तौर पर पूर्ति चाहते हैं। लेकिन यह सर्वथा और सर्वदा सत्य नहीं होता। लोग राष्ट्रवादी अथवा अन्य अभिप्रेरणाओं से भी संचालित हो सकते हैं।
  • (३) माइकल मावगोलिस के अनुसार बहुलवादी सिद्धान्त समाज के संसाधनों को संवर्द्धित या पुनर्वितरित करने के तरीके खोजने में अक्षम है। नतीजतन, निम्नजातियों, महिलाओं, आदिवासियों तथा परंपरागत रूप से समाज के अन्य वंचित तबकों को साधन संपन्न वर्गों की भांति राजनीति में सहभागिता के समान अवसर नहीं मिल पाते।
  • (४) मावगोलिस का यह भी कहना है कि बहुलवादियों के पास यथोचित आर्थिक और पर्यावरणीय मूल्य पर सामाजिक समानता और विकास की कोई योजना नहीं है।

लोकतंत्र का सहभागिता सिद्धान्तसंपादित करें

राजनीति क्रियाकलाप में सहभागिता लोकतंत्र का मूल तत्त्व है, लेकिन खासकर पूंजीवादी लोकतंत्रों में यह प्रायः चुनावों में मतदान तक ही सीमित रहता है। लोकतंत्र का सहभागिता सिद्धान्त संवर्द्धित भागीदारी को एक आदर्श भी मानते है और कृत्यात्मक आवश्यकता भी। इस सिद्धान्त के प्रमुख प्रस्तावकों में 1960 के दशक से कैरोल पेर्लमैन, सी. बी. मैक्फर्सन और एन. पॉलैन्ट जास जैसे वामपंथी विचारक प्रमुख रहे हैं। सहभागी लोकतंत्र की दो प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

(1) निर्णय लेने की प्रक्रिया का इस रूप में विकेन्द्रीकरण कि उन निर्णयों से प्रभावित होने वाले लोगों तक नीति निर्धारण किया जा सके।
(2) नीति-निर्धारण में सामान्यजन की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी। सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार लोकतंत्र वास्तविक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की समान सहभागिता है, न कि मात्र सरकार को स्थायी बनाए रखना जैसा कि अभिजनवादी अथवा बहुलवादी सिद्धान्तकार मान लेते हैं। सच्चे लोकतंत्र का निर्माण तभी हो सकता है जब नागरिक राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हों और सामूहिक समस्याओं में निरंतर अभिरूचि लेते रहें। सक्रिय सहभागिता इस लिए आवश्यक है ताकि समाज की प्रमुख संस्थाओं के पर्याप्त विनिमय हों और राजनीतिक दलों में अधिक खुलापन और उत्तरदायित्व के भाव हों।

सहभागी लोकतंत्र के सिद्धान्तकारों के अनुसार यदि नीतिगत निर्णय लेने का जिम्मा केवल अभिजन वर्ग तक सीमित रहता है तो उसके लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप बाधित होता है। इसलिए वे इसमें आम आदमी की सहभागिता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि यदि लोकतांत्रिक अधिकार कागज के पन्नों अथवा संविधान के अनुच्छेदों तक ही सीमित रहे तो उन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, अतः सामान्य लोगों द्वारा उन अधिकारों का वास्तविक उपभोग किया जाना आवश्यक है। लेकिन यह उपभोग भी तभी संभव है जबकि व्यक्ति स्वतंत्र और समान हो। यदि लोगों का विश्वास हो कि नीतिगत निर्णयों में कारगर सहभागिता के अवसर वास्तव में विद्यमान न हैं तो वे निश्चय ही सहभागी बनेंगे। ऐसी स्थिति में वे प्रभावी ढंग से साझेदारी भी कर सकेंगे। जिस लोकतंत्र में, चाहे वह राजनीतिक हो या प्राविधिक या शिल्पतांत्रिक अभिजनवर्ग का वर्चस्व होता है वह नागरिकों के लिए संतोषप्रद नही होता और आमलोग सहभागिता के द्वारा ही उस वर्ग के वर्चस्व को समाप्त कर सकते हैं। सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों का यह भी कहना है कि आज के औद्योगिक और प्रौद्योगिक समाजों में शिक्षा का स्तर ऊँचा हो गया है और बौद्धिक तथा राजनैतिक चेतना से संपन्न समाज में अभिजन और गैर-अभिजन के बीच की खाई कम हुई है। इसलिए कार्यक्षमता और विकास की दृष्टि से अधिकांश मामलों में सामान्य लोगों की सहभागिता कोई बाधा नहीं रह गई है। सच पूछा जाए तो सत्ता का विकीर्णन ही अत्याचार के विरुद्ध सबसे मजबूत सुरक्षा-कवच है। सहभागिता पर आधारित लोकतंत्र ही नागरिकों को तटस्थता, अज्ञान और अलगाव से बचा सकता है और लोकतंत्र की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकता है।

प्रश्न है, आम नागरिक की राजनीतिक सहभागिता कैसे हो ? इसके सिद्धान्तकारों ने इसके निम्नलिखित तरीके बताए हैं:

  • 1. चुनावों में मतदान
  • 2. राजनीतिक दलों की सदस्यता
  • 3. चुनावों मे अभियान कार्य
  • 4. राजनीतिक दलों की गतिविधियों में शिरकत
  • 5. संघों, स्वैच्छिक संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों जैसे दबाव तथा लॉबिंग समूहों की सदस्यता और सक्रिय साझेदारी
  • 6. प्रदर्शनों में उपस्थिति
  • 7. औद्योगिक हड़तालों में शिरकत (विशेषकर जिनके उद्देश्य राजनीतिक हों अथवा जो सार्वजनिक नीति को बदलने अथवा प्रभावित करने को अभिप्रेत हों)
  • 8. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भागीदारी, यथा- कर चुकाने से इन्कार इत्यादि
  • 9. उपभोक्ता परिषद् की सदस्यता
  • 10. सामाजिक नीतियों के क्रियान्वयन में सहभागिता
  • 11. महिलाओं और बच्चों के विकास, परिवार नियोजन, पर्यावरण संरक्षण, इत्यादि सामुदायिक विकास के कार्यों में भागीदारी, इत्यादि।

मैक्फर्सन की टिप्पणी है कि आज के राष्ट्र क्षेत्र और जनसंख्या की दृष्टि से विशालकाय हैं और यह संभव नहीं है कि सारे नागरिक रोजमर्रे के राजनीतिक विमर्श या नीति निर्धारण में शामिल हों, फिर भी यदि कुछ शर्तो को स्वीकार कर लिया जाए तो सहभागिता का अनुपात निश्चित रूप से बढ़ाया जा सकता ह। ये शर्ते हैं:

(1) यदि राजनीतिक दल “प्रत्यक्ष लोकतंत्र” के सिद्धान्त के अनुसार लोकतांत्रिक हो,
(2) यदि राजनीतिक दल सच्चे अर्थ में संसदीय ढाँचे के अन्तर्गत कार्य करते हों, और
(3) यदि राजनीतिक दल के क्रिया कलाप श्रमिक संगठनों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा ऐसे ही अन्य निकायों से संपूरित होते हों।

डेविड हेल्ड ने सहभागिता सिद्धान्त पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि यह पुरातन/अभिजन बहुलवादी जैसे सिद्धान्तों से बेहतर तो है, लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कैसे और क्यों सिर्फ सहभागिता मानवीय विकास, जो लोकतंत्र का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है, के उच्चतर स्तर को प्राप्त कर सकेगी। इस बात का कोई साक्ष्य अथवा तर्क संगत आधार नहीं मिलता कि सहभागिता नागरिकों को सामान्य हित के प्रति अधिक सहयोगशील और प्रतिबद्ध बनाएगी। हेल्ड इस केन्द्रीय मान्यता को भी आवश्यक रूप से सत्य नहीं मानता कि आम लोग अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर नीति निर्धारण करने और निर्णय लेने में अधिक उत्तरदायी बनना चाहते हैं। यदि वे सामाजिक-आर्थिक मामलों और नीतियों के निर्धारण में भाग लेना नहीं चाहें तो उन्हें इसके लिए बाध्य करना उचित नहीं माना जा सकता। फिर भी मान लिया जाए कि आम लोग अपने लोकतांत्रिक रुझान को यदि एक सीमा से आगे ले जाना चाहें और बुनियादी स्वतंत्रता और अधिकार के मामले में दखलंदाजी करने लगे तो लोकतंत्र का क्या हश्र होगा, ऐसे प्रश्नों पर सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। कुक और मॉर्गन के अनुसार सहभागी लोकतंत्र को असली जामा पहनाना उतना आसान नहीं है जितना ऊपरी तौर पर प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ, सहभागी इकाई के सम्यक् आकार और कृत्य क्या हों फिर, नागरिकों की सक्रिय सहभागिता के बल पर स्थानीय स्तरों पर लिए गए निर्णयों को संपूर्ण राष्ट्र के हित के साथ किस प्रकार समन्वित एवं समेकित किया जाएगा? एक स्थानीय सहभागी इकाई के नीतिगत मामले दूसरी इकाई के विरोधी भी तो हो सकते हैं। फिर एक बात यह भी है कि अधिकतम संभव सहभागिता के बल पर लिए गए निर्णय आवश्यक नहीं कि सर्वाधिक कारगर निर्णय हों ही। सहभागिता सिद्धान्त के समर्थक कार्यक्षमता एवं प्रभाव के मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते।

लोकतंत्र का मार्क्सवादी सिद्धान्तसंपादित करें

आम धारणा के विपरीत लोकतंत्र के विचार को मार्क्स और पश्चवर्ती मार्क्सवादी विचारकों ने भी स्वीकार कर लिया है। इतना अवश्य है कि उनकी लोकतंत्र-संबधी अभिधारणा पाश्चात्य उदारवादी लोकतांत्रिक अभिधारणाओं से पूर्णतः भिन्न है। चूंकि मार्क्सवादियों का मानना है कि पूंजीवादी व्यवस्था में लोकतांत्रिक अधिकार सही अर्थ में आम जनता के पास न होकर सिर्फ साधन-संपन्न वर्ग के हाथ में होता है, इसलिए वे एक ऐसे लोकतंत्र की स्थापना चाहते हैं जो ‘जनता का लोकतंत्र‘ (पीपल्स डेमोक्रेसी) हो। मार्क्सवादी लोकतंत्र में उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व को खत्म करने और सर्वहारावर्ग द्वारा अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के पश्चात् समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना होती है।

मार्क्स उदारवादी संवैधानिक लोकतंत्र का आलोचक था क्योंकि उसके अनुसार पूंजीवादी लोकतंत्र का आधार एक ऐसी आर्थिक प्रणाली होती है जिसमें उत्पादन के साधन हमेशा पूंजीपति वर्ग के नियंत्रण में होते हैं। यही पूंजीपति वर्ग अपनी धन-शक्ति के बल पर राजनीतिक व्यवस्था की नियंत्रण में रखकर सरकार और राज्य-तंत्र को अपने अधीन रखता है। राज्य सत्ता, अधिकार और विशेषाधिकार पूर्णतः उसी वर्ग के पास होते हैं और श्रमिकवर्ग के पास सिर्फ नाम की स्वतंत्रता और अधिकार होते हैं। राज्य का अधिकारी वर्ग, न्यायालय और पुलिस बल भी तटस्थ न होकर प्रभुतासम्पन्न वर्ग के ही हित साधक होते हैं। इसलिए, लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली का रूप अख्तियार कर लेता है जो शासक वर्ग की सत्ता और विशेषाधिकार को बढ़ावा देने और उच्च वर्ग के हितों को साधने के काम आता है।

इसके बावजूद, मार्क्स और एंगेल्स ने यह स्वीकार किया है कि संपन्न पूंजीपति वर्ग द्वरा नियंत्रित उदारवादी बुर्जुआ लोकतंत्र भी किसी हद तक अपने नागरिकों को वास्तविक अधिकार देने के ऐतिहासिक दावे कर सकता है और श्रमिक वर्ग इसका इस्तेमाल अपने को संगठित कर सर्वहारा की क्रांति के लिए कर सकते हैं। उदारवादी लोकतंत्रों में आम मताधिकार का उपयोग सर्वहारावर्ग की क्रांतिकारी आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में किया जा सकता है। मार्क्सवादी यह अवश्य मानते हैं कि कुछ स्थितियों में हिंसक क्रांतिकारी आन्दोलन की आवश्यकता नहीं हो सकती है लेकिन ऐसी स्थितियों की संभावना अत्यल्प है। अगर समाजवादी क्रांति के लक्ष्य को पूरा करने के लिए संसदीय मार्ग अपनाया भी जाता है तो यह अन्य प्रकार के संघर्षों में एक अतिरिक्त सहायक उपकरण ही हो सकता है।

मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार वास्तविक लोकतंत्र सर्वहारा के अधिनायकवाद को कायम करने के लिए सर्वहारावर्ग की क्रांति के पश्चात ही संभव है क्योंकि उदारवादी बुजुआर् लोकतंत्र का आदर्श प्रतिभागिता का हो सकता है, लेकिन यथार्थ में साधनहीन श्रमिक वर्ग की सहभागिता उसमें नहीं हो पाती। अपनी रचना ‘द क्रिटिक ऑफ द गोथा प्रोग्राम‘ (गोथा कार्यक्रम की समीक्षा- 1875) में मार्क्स और एंगेल्स ने अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा था ‘पूंजीवादी और साम्यवादी समाज के बीच में ही एक का दूसरे में रूपांतरण की अवधि निहित होती है। इसी से मेल खाती एक राजनीतिक संक्रमण की अवधि भी होती है जिसमें राज्य सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद और साम्यवाद में भेद किया है। वे इसे एक मध्यवर्ती काल मानते हैं। इसकी परिणति साम्यवादी समाज की स्थापना में होती है। यह समझना जरूरी है कि कार्ल मार्क्स और एंगेंल्स ने अधिनायकवाद पद का प्रयोग किस अर्थ में किया है। उनकी दृष्टि में प्रत्येक राज्य शासक सामाजिक वर्ग का अधिनायकवाद रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में यह वर्ग संपन्न औद्योगिक और व्यापारी बुर्जुआ का था जबकि उनकी अपनी अवधारणा वाला राज्य क्रांति के तुरंत बाद सर्वहारा के नियंत्रण वाला राज्य होगा और तब समाजवादी पुननिर्माण की प्रक्रिया शुरू होगी जिसका अंत एक वर्गहीन समाज की स्थापना में होगा। इसलिए, उनकी दृष्टि में लोकतंत्र और सर्वहारा अधिनायकवाद एक ही साथ चलेंगे, ठीक वैसे ही जैसे कि पूंजीवादी व्यवस्था में उदारवादी लोकतंत्र व्यवहार्यतः लोकतंत्र भी और उद्योगपतियों एवं व्यापारिक घरानों के बुर्जुआ वर्ग का अधिनायकवादी शासक भी। इसीलिए, मार्क्स और एंगेल्स का कहना था कि क्रांति और श्रमिक वर्ग के आधिपत्य के पश्चात् की प्रणाली ‘जनता के लोकतंत्र‘ की प्रणाली होगी। जनता से उनका तात्पर्य मुठ्ठीभर संपन्न बुर्जुआ के स्थान पर जनसामान्य की विशाल आबादी से था। मार्क्स द्वारा प्रतिपादित ‘जनता का लोकतंत्र‘ की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैंः

  • (1) जनता का लोकतंत्र तत्त्वतः एक ऐसा लोकतंत्र है जिसमें श्रमिक वर्ग का एक विशाल भाग राजनैतिक एवं नीतिगत निर्णय के अधिकार अल्पसंख्यक अभिजनवर्ग से अपने हाथ में ले लेता है। इस तरह, राजकीय एवं आर्थिक व्यवस्था के अधिकार अल्पसंख्यक उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों के पास नहीं रह जाते।
  • (2) जनता के लोकतंत्र में उत्पादन के साधनों - भूमि, कल कारखानें इत्यादि पर जनता का स्वामित्व होता है, राज्य सारी उत्पादक पूंजीगत परिसंपत्त्यिं को अपने नियंत्रण में ले लेता है और उत्पादन-क्षमता में दु्रतगति से वृद्धि होती है। इसमें प्रत्येक नागरिक के लिए नियोजन के समान अवसर होते हैं।
  • (3) समाजवादी लोकतंत्र में कार्यकारी और विधायी कृत्यों का समेकीकरण हो जाता है और क्रांति के पश्चात् सारे कार्मिक सीधे तौर पर चुने जाते हैं तथा पुलिस और सैन्य बल का स्थान नागरिक सेना ले लेती है। सारे सरकारी सेवक श्रमिक के रूप में समान वेतन पाते हैं।
  • (4) सामाजिक स्तर पर विरासत का चलन समाप्त हो जाता है, सभी बच्चे निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं, गांवों और शहरों के बीच आबादी का न्यायसंगत वितरण होता है और सभी नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादक शक्तियों के संवर्धन के लिए पुरजोर कोशिश की जाती है।
  • (5) मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार जनता का लोकतंत्र पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच की स्थिति है। व्यक्तिगत संपत्ति और वर्गों के उन्मूलन के पश्चात् जब समाजवादी समाज का निर्माण हो जाता है तो वह क्रमशः पूर्ण साम्यवाद की ओर अग्रसर होने लगता है। पूर्ण साम्यवाद की अवस्था में राज्य व्यवस्था का अंत हो जाता है और उसके स्थान पर वास्तविक अर्थ में एक प्रकार का स्व-शासन कायम हो जाता है।

समाजवादी समाजों की रचना ने मार्क्सवादी विचारों को और आगे बढ़ाया, लेनिन जिसने रूस में 1917 में प्रथम समाजवादी राज्य की स्थापना की ने मार्क्सवादी चिंतन की नई व्याख्याएं प्रस्तुत की। उसने सर्वहारा के अधिनायकवाद को स्वीकार किया और समाजवादी क्रांति के इसके महत्त्व पर बल दिया, लेकिन उसने इसके साथ यह भी जोड़ दिया कि सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद विशाल सर्वहारा संगठन या साम्यवादी दल द्वारा ही प्रयोग में लाया जा सकता है। उसने लोकतंत्र की तीन अवस्थाएं बताईः पूंजीवादी लोकतंत्र, समाजवादी लोकतंत्र और साम्यवादी लोकतंत्र। उसके अनुसार लोकतंत्र राज्य का एक स्वरूप है और वर्ग-विभाजित समाज में सरकार अधिनायकवादी और लोकतांत्रिक दोनों होती है। यह एक वर्ग के लिए लोकतंत्र है तो दूसरे के लिए अधिनायकवाद। बुर्जुआ वर्ग चुंकि अपने हित साधन में पूंजीवादी प्रणाली को नियंत्रित और संचालित करता है, इसलिए उसे सत्ता से बेदखलकर समाजवादी लोकतंत्र को स्थापित करना आवश्यक है। लेनिन स्वीकार करता है कि नव स्थापित समाजवादी राज्य उतना ही दमनात्मक होता है जितना कि पूंजीवादी राज्य। सर्वहारा वर्ग के शासन को लागु करने के लिए यह आवश्यक भी है। चूंकि बुर्जुआ काफी शक्तिशाली होता है, इसलिए समाजवादी लोकतंत्र के आरंभिक दौर में सर्वहारा वर्ग के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह बलपूर्वक पूंजीवादी वर्ग का उन्मूलन कर दे। सर्वहारा के अधिनायकवाद के समक्ष दो लक्ष्य होते हैं:संपादित करें

  • (२) एक नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को संघटित करना

लेनिन के अनुसार यह कार्य मुख्य रूप से साम्यवादी दल को करना पड़ता है।

इस तरह, लेनिन की दृष्टि में पूंजीवादी लोकतंत्र में सच्चा लोकतंत्र नहीं होता, जबकि सर्वहारा के अधिानायकवाद में पूर्वापेक्ष अधिक लोकतंत्र होता है, क्योंकि यह बहुसंख्यक सर्वहारा वर्ग का शासन है। उसका यह भी दावा था कि अन्ततः सच्चे साम्यवाद की प्राप्ति के साथ लोकतंत्र अनावश्यक हो जाएगा, क्योंकि उस समाज के सन्दर्भ में इसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के बाद अनेक विचारकों ने मार्क्सवाद की अनेक व्याख्याएं प्रस्तुत की है। इनमें एडवर्ड बर्नस्टाइन, कार्ल कॉट्स्की, रोजा लुक्जमवर्ग आदि प्रमुख हैं। एडवर्ड बर्नस्टाइन का दावा है कि पूंजीवाद की मार्क्सवादी व्याख्या गलत है और सर्वहारा का अधिनायकवाद न तो आवश्यक है, न वांछनीय। उसके अनुसार, राजनीतिक लोकतंत्र और उदारवादी स्वतंत्रताएं अधिक महत्त्वपूर्ण है। लेनिन की यह मान्यता सही नहीं है कि सर्वहारा का अधिनायकवाद आवश्यक है। बर्नस्टाइन का तर्क है कि जब तक सर्वहारा वर्ग बहुमत हासिल नहीं कर लेता, समाजवादी क्रांति असंभव है और यदि वह बहुमत हासिल कर लेता है तो अधिनायकवाद की जरूरत ही नहीं रहती। उसके अनुसार लोकतंत्र आवश्यक है और मार्क्सवादी समाजवादी सिद्धान्त के साथ लोकतांत्रिक परंपरा को जोड़कर ही समाजवाद की स्थापना हो सकती है। मार्क्सवादी क्रांतिकारी रोजा लक्जमबर्ग ने लेनिन की लोकतंत्र- विरोधी नीति के संबंध में आपत्ति उठाते हुए कहा है कि इससे विशाल जनसमुदाय का अधिनायकवाद नहीं, विशाल जनसमुदाय पर अधिनायकवाद स्थापित हो जाता है।

लोकतंत्र की आवश्यकतासंपादित करें

• बहुसंख्यक जनसमुदाय, जो गैर-अभिजनवर्ग का निर्मायक है, में अधिकांश भावशून्य, आलसी और उदासीन होते हैं, इसलिए एक ऐसा अल्पसंख्यक वर्ग का होना आवश्यक है जो नेतृत्व प्रदान करे।

• अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आज के जटिल समाज में कार्यक्षमता के लिए विशेषज्ञता आवश्यक है और विशेषज्ञों की संख्या हमेशा कम ही होती है। अतः राजनैतिक नेतृत्व ऐसे चुनिंदा सक्षम लोगों के हाथ में होना आवश्यक है।

• लोकतंत्र मात्र एक ऐसी कार्यप्रणाली है जिसके द्वारा छोटे समूहों में से एक जनता के न्युनतकम अतिरिक्त समर्थन से शासन करता हैं अभिजनवादी सिद्धान्त यह भी मानता है कि अभिजन वर्गों- राजनीतिक दलों, नेताओं, बड़े व्यापारी घरानों के कार्यपालकों, स्वैच्छिक संगठनों के नेताओं और यहां तक कि श्रमिक संगठनों के बीच मतैक्य आवश्यक है ताकि लोकतंत्र की आधारभूत कार्यप्रणाली को गैर जिम्मदार नेताओं से बचाया जा सके।

• सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार लोकतंत्र वास्तविक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की समान सहभागिता है, न कि मात्र सरकार को स्थायी बनाए रखना जैसा कि अभिजनवादी अथवा बहुलवादी सिद्धान्तकार मान लेते हैं। सच्चे लोकतंत्र का निर्माण तभी हो सकता है जब नागरिक राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हों और सामूहिक समस्याओं में निरंतर अभिरूचि लेते रहें। सक्रिय सहभागिता इस लिए आवश्यक है ताकि समाज की प्रमुख संस्थाओं के पर्याप्त विनिमय हों और राजनीतिक दलों में अधिक खुलापन और उत्तरदायित्व के भाव हों।

• सहभागी लोकतंत्र के सिद्धान्तकारों के अनुसार यदि नीतिगत निर्णय लेने का जिम्मा केवल अभिजन वर्ग तक सीमित रहता है तो उसके लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप बाधित होता है। इसलिए वे इसमें आम आदमी की सहभागिता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि यदि लोकतांत्रिक अधिकार कागज के पन्नों अथवा संविधान के अनुच्छेदों तक ही सीमित रहे तो उन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, अतः सामान्य लोगों द्वारा उन अधिकारों का वास्तविक उपभोग किया जाना आवश्यक है।

• लोकतंत्र राज्य का एक स्वरूप है और वर्ग-विभाजित समाज में सरकार अधिनायकवादी और लोकतांत्रिक दोनों होती है। यह एक वर्ग के लिए लोकतंत्र है तो दूसरे के लिए अधिनायकवाद। बुर्जुआ वर्ग चुंकि अपने हित साधन में पूंजीवादी प्रणाली को नियंत्रित और संचालित करता है, इसलिए उसे सत्ता से बेदखलकर समाजवादी लोकतंत्र को स्थापित करना आवश्यक है।

[1]= जनतंत्र के लिए लिक्षा की आवश्यकता = शिक्षा के क्षेत्र में जनतंत्र के सिधान्तों तथा मूल्यों का समावेश अभी कुछ वर्ष पूर्व से ही हुआ है।इस महत्वपूर्ण परिवर्तन का श्रेय अमरीका के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री जॉन डीवी को है।उसने बताया है कि “ एक जनतंत्रीय समाज में ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिये जिससे प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक कार्यों तथा सम्बन्धों में निजी रूप में रूचि ले सके।इस शिक्षा को मनुष्य में प्रत्येक सामाजिक परिवर्तन के दृढ़तापूर्वक स्वीकार करने की सामर्थ उत्पन्न करनी चाहिये |“ डीवी के इस कथन से जनतंत्र के सिधान्तों तथा मूल्यों का प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में किया जा जाने लगा।परिणामस्वरूप अब दिन-प्रतिदिन जनसाधारण की शिक्षा का आन्दोलन चारों कोर जोर पकड़ता जा रहा है।ठीक भी है शिक्षित होएं पर ही व्यक्ति अपने अधिकारों के सम्बन्ध में जागरूक हो सकता है तथा अपने कर्तव्यों में जनहित के लिए निभाने में तात्पर्य हो सकता है।अशिक्षित जनता अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों को नहीं समझ पाती।इससे देश में सत्ताधारियों का एक ऐसा वर्ग बन जाता है दो दूसरे व्यक्तियों के उपर अपनी इच्छाओं को थोपने लगता है।इससे जनतंत्र का मुख्य लक्ष्य-नष्ट हो जाता है।चूँकि जनतंत्रीय व्यवस्था में देश के सभी नागरिक शासन में भाग लेते हैं, इसलिए उन सब महत्व को समझते हुए अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों देश में सर्वसाधारण की अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जा रही है |

शिक्षा का जनतंत्रसंपादित करें

जनतंत्रीय शिक्षा का अर्थ है – शिक्षा से जनतंत्र की विचारधारा का प्रभाव।शिक्षा में जनतंत्रीय विचारधारा का प्रभाव निम्नलिखित बातों पर पड़ा है –

(1) समान अवसर प्रदान करना तथा व्यक्तिगत विभिन्नता का आदर करना – जनतंत्र में प्रत्येक बालक समाज की एक पवित्र एवं अमूल्य निधि होता है।अत: प्रत्येक बालक को उसकी समस्त शक्तियों के विकास हेतु समाज में अवसर प्रदान किये जा रहे हैं।समान अवसरों के प्रदान करने का अर्थ सब बालकों को एक जैसे अवसर प्रदान करना नहीं है।कारण यह है कि जिन अवसरों से मन्द बुद्धि बाले बालकों को लाभ हो सकता है, उनसे सामान्य बुद्धि वाले बालकों को भी पर्याप्त लाभ होना आवश्यक नहीं है।ऐसी ही , प्रखर बुद्धि बाले बालकों के विकास में भी बाधा आ सकती है यदि उन्हें मन्द अथवा सामान्य बुद्धि वाले बालकों के साथ एक जैसे ही अवसर प्रदान किये जायें।अत: जब शिक्षा प्रदान करते समय व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धांत को दृष्टि रे रखते हुए प्रत्येक बालक की रुचियों, योग्यताओं तथा क्षमताओं को ध्यान में रखा जाता है |

(2) सार्वभौमिक तथा अनिवार्य शिक्षा – जनतंत्र में सरकार की बागडोर जनता के हाथ में होती है।इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को जहाँ एक ओर अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान होना चाहिये वहाँ दूसरी ओर उस पक्षपात तथा अज्ञान के अन्धकार से भी दूर रहना परम आवश्यक है।अत: अब प्रत्येक बालक को बिना किसी भेद-भाव के एक निश्चित स्तर तक अनिवार्य रूप से शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था की जा रही है जिससे वह अपने देश की उचित सरकार का निर्माण कर सके |

(3) निशुल्क शिक्षा – जनतंत्र सार्वभौमिक तथा अनिवार्य एवं समान अवसरों के प्रदान करने में विश्वास रखता है इसका अर्थ यह हुआ है कि शिक्षा में वर्ग-भेद अर्थात निर्धन एवं धनवान के अन्तर का कोई स्थान नहीं है।इसलिए अब शिक्षा सार्वभौमिक तथा अनिवार्य ही नहीं अपितु नि:शुल्क भी होती जा रही है।चूँकि जनतंत्र में शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का जन्म-सिद्ध अधिकार है , इसलिए अमरीका, रूस, टर्की तथा फ़्रांस एवं जापान आदि सभी अनिवार्य कर दी है।साथ ही उक्त सभी राज्य अंधे, बहरे, गूंगे, लंगड़े, मन्द-बुद्धि तथा कुशाग्र बुद्धि एवं मानसिक न्यूनता ग्रस्त सभी प्रकार के बालकों की शिक्षा का उचित प्रबन्ध कर रहे हैं |

(4) प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था – जनतंत्रीय विचारधारा को दृष्टि में रखते हुए विभिन्न देशों में प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा तथा विकलांग व्यक्तियों की शिक्षा पर बल दिय जा रहा है।इस सम्बन्ध में विभिन्न राज्यों में रात्री स्कूलों, सन्डे-कोर्रसिज तथा प्रौढ़-साहित्य की व्यवस्था की जा रही है |

(5) बाल केन्द्रित शिक्षा – जनतंत्रीय विचारधारा के प्रभाव से अब बालक के व्यक्तितिव का निर्माण किया जाता है जिसमें रहते हुए बालक के व्यक्तितिव का सर्वांगीण विकास हो जाये।दूसरे शब्दों में , अब शिक्षा बाल-केन्द्रित होती जा रही है |

(6) शिक्षण पद्धतियाँ – अब बालकों को रुचियों एवं शक्तियों का दमन करने वाली रूढिगत, सामूहिक शिक्षण समाप्त होती जा रही है।परिणामस्वरूप अब बालकों के मस्तिष्क में ज्ञान को बलपूर्वक ठूंसने पर बल नहीं दिया जाता अपितु जनतंत्रीय विधियों का प्रयोग करते हुए ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाता है जिसमें रहते हुए प्रत्येक बालक ज्ञान की खोज स्वयं कर सकें |

(7) व्यक्तिगत अध्ययन का महत्त्व – जनतंत्रीय विचारधारा से प्रभावित होते हुए अब शिक्षक बालकों के व्यक्तिगत अध्ययन के महत्त्व को दृष्टि में रखते हुए उनकी पारिवारिक-परिस्थितियों, मनोवैज्ञानिक विशेषताओं सांस्कृतिक प्रष्टभूमि तथा अभिवृतियों को समझने का प्रयास कर रहे है |

(8) सामाजिक क्रियायें- अब स्कूल में केवल पुस्तकीय ज्ञान पर बल न देते हुए सामाजिक-क्रियायों तथा सामाजिक-तत्वों को मुख्य स्थान दिया जाता है जिससे प्रत्येक बालक सामाजिक अनुभव प्राप्त कर सके |

(9) छात्र परिषद् – जनतंत्रीय भावना से प्रेरित होते हुए अब स्कूलों में छात्र-संघ अथवा छात्र-परिषद् आदि को प्रोत्साहन दिया जाता है |

(10) शिक्षक के व्यक्तित्व का सम्मान – जनतंत्रीय व्यवस्था में शिक्षक के व्यक्तितिव को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।अत: जनतंत्रीय भावना से प्रेरित होते हुए अब शिक्षक से जहाँ एक ओर पाठ्यक्रम के निर्माण में सहयोग किया जा रहा है, वहाँ दूसरी ओर उसे शिक्षण कार्य के लिए भी आवशयकतानुसार शिक्षण-विधियों में परिवर्तन करने की स्वतंत्रता प्रदान की जा रही है।यही नहीं, अब शिक्षक को अपनी व्यवसायिक कुशलता को बढ़ाने के लिए भी अनके सुविधायें दी जा रही है |

(11) स्कूल प्रशासन – जनतंत्रीय भावना के प्रभाव से अब स्कूल के संगठन एवं प्रशासन कार्यों में बालकों को भाग लेने के अवसर दिये जा रहे हैं जिससे उनमें स्वशासन की भावना विकसित हो जाये |

(12) बुद्धि परीक्षायें- अब बालकों की मानसिक योग्यता का मुल्यांकन करने के लिए बुद्धि परीक्षाओं का प्रयोग किया जा रहा है |

(13) बालक का शारीरिक स्वास्थ्य – बालक को शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ रखने के लिए अब स्कूल में जहाँ एक ओर नाना प्रकार के खेलों का प्रबन्ध किया जा रहा है, वहाँ दूसरी ओर स्कूल के अस्पताल का डॉक्टर प्रत्येक बालक के शारीरिक स्वाथ्य का परीक्षा करके उसे पूर्ण स्वस्थ बनाने के लिए अपना निजी परमर्श भी देता है |

(14) स्कूल – जनतंत्रीय भावना के प्रभाव से अब स्कूल को ऐसा स्थान समझा जाता है जहाँ पर प्रत्येक बालक नागरिकता की शिक्षा के साथ-साथ विश्व-बंधुत्व की शिक्षा प्राप्त करते हुए मानवता के आदर्शों को विकसित कर सकता है।दूसरे शब्दों में, अब स्कूल को समाज का लघू रूप माना जाने लगा है |

(15) शिक्षा के समस्त साधनों में सहयोग – जनतंत्रीय समाज में शिक्षा के समस्त साधनों में परस्पर सहयोग होता है।अत: अब जनतंत्र के प्रभाव से परिवार, स्कूल, समुदाय तथा धर्म एवं राज्य आदि शिक्षा के समस्त साधनों में सहयोग स्थापित करने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं |

जनतंत्र तथा शिक्षा के उद्देश्यसंपादित करें

जनतंत्र में शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं –

(1) जनतंत्र के मूल्यों का विकास – जनतंत्र की सफलता विशाल भवनों, विधान-सभाओं, विधान-परिषदों तथा सांसदों से नहीं होती अपितु ऐसे नागरिकों से होती है जो जनतंत्र के मूल्यों का पालन करते हों।इस दृष्टि से जनतंत्रीय शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बालकों में जनतंत्र के मूल्यों का विकास करना है।कोई भी पुस्तकीय ज्ञान उस उद्देश्य को उस समय तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक बालकों को स्कूल से उपयुक्त अवसर न प्रदान किये जायें।वस्तु-स्थिति यह है कि बालक जनतांत्रिक ढंग से रहना उसी सके सीख सकता है जब उसे जनतंत्रीय ढंग से रहने के अवसर उपलब्ध हों।अत: स्कूल का सम्पूर्ण वातावरण अर्थात प्रत्येक क्रिया पाठ्यक्रम सम्बन्धी अथवा सहगामी, हर प्रकार से सम्बन्ध, चाहे वे बालकों के आपसी हों अथवा शिक्षकों और बालकों के, जनतंत्रीय मूल्यों के अनुसार होने चाहिये |

(2) उत्तम अभिरुचियों का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का दूसरा उद्देश्य बालकों में उत्तम तथा उपयोगी अभिरुचियों का विकास करना है।रुचियाँ बालक के चरित्र का निर्माण करती है तथा उसको जीवन सम्पन्नता प्रदान करती है।इसीलिए प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हरबार्ट ने बहुमुखी रुचियों के विकास पर बल दिया है।इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बालकों को विभिन्न प्रकार की क्रियाओं को करने के लिए अवसर मिलने चाहिये।विभिन्न क्रियाओं में भाग लेने से उनकी कार्य में रूचि जागृत होगी।ध्यान देने की बात है कि बालक में जितनी अधिक उपयुक्त एवं श्रेष्ट अभिरुचियाँ विकसित हो जायेंगी वह उतना ही अधिक सुखी, कुशल तथा सन्तुलित जीवन व्यतीत कर सकेगा |

(3) व्यवसायिक कुशलता का विकास – जनतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों का आर्थिक दृष्टि से हीन व्यक्ति अपने असली लक्ष्य से विमुख हो सकता है तथा धनवानों के हाथ का खिलौना बनकर अपने बहुमूल्य वोट को भी अवांछनीय व्यक्ति को दे सकता है।अत: जनतंत्रीय शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे किसी व्यवसाय को अपनाकर अपना भार स्वयं ही वहन करते हुए राष्ट्र की यथाशक्ति सेवा कर सकें |

(4) अच्छी आदतों का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का चौथा उद्देश्य बालकों में अच्छी आदतों का विकास करना है।इसका कारण यह है कि आदतें ही अच्छे अथवा बुरे कार्यों की नीवं डालती है।अत: जनतन्त्र को सफल बनाने के लिए बालकों में आरम्भ से ही अच्छी आदतों का विकास करना चाहिये |

(5) विचार शक्ति का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का पांचवां उद्देश्य बालकों में अच्छी आदतों का विकास करना है।इसका कारण है कि आज के बालक कल के नागरिक हैं।इन्हीं बालकों को निकट भविष्य में राष्ट्र की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं पर विचार करना है।अत: इन्हें शिक्षा के द्वारा आरम्भ से ही विभिन्न समस्याओं के विषय में स्वतंत्रतापूर्वक विचार करने तथा अपना निजी निर्णय लेने की आदत डालनी चाहिये |

(6) सामाजिक दृष्टिकोण का विकास – सामाजिक दृष्टिकोण का विकास करना जनतंत्रीय शिक्षा का छठा महत्वपूर्ण उद्देश्य है।इस उद्देश्य का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक बालक यह समझने लगे कि वह समाज आ अंग है तथा उसका सम्पूर्ण जीवन समाज के ही लिए है।इस भावना के विकसित हो जाने से वह समाज-हित के लिए अपने निजी हित को त्यागने में कोई संकोच नहीं करेगा।अत: इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा में ऐसी क्रियाओं को महत्त्व दिया जाना चाहिये जिनके द्वारा बालकों को सामाजिक अभिरुचियाँ विकसति हो जायें वे अपने सहयोगीयों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करना सीख जायें तथा उनमें उतरदायित्वों को समझने एवं उनके पालन करने की भावना विकसित हो जाये |

(7) व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास- जनतंत्रीय शिक्षा का सातवाँ उद्देश्य व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास करना है।इसका कारण यह है कि वर्तमान संसार संघर्षों तथा कटुताओं का संसार है।ऐसे संसार में सामंजस्यपूर्ण व्यक्तित्व वाला व्यक्ति ही सफल हो सकता है।अत: शिक्षा को बालक के व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास करना चाहिये जिससे वह एक चरित्रवान, योग्यता तथा सबल नागरिक के रूप में अपना विकास तथा समाज का कल्याण कर सके।हुमायूँ कबीर ने ठीक ही लिखा है – “शिक्षा को मानव प्राकृति के सब पहलुयों के लिए सामग्री जुटानी चाहिये तथा मानवशास्त्र, विज्ञान एवं प्रौधोगिकी को समान महत्त्व देना चाहिये जिससे कि वह मनुष्य को सब कार्यों को निष्पक्षता, कुशलता तथा उदारता से करने के योग्य बना सकें।“

(8) नेतृत्व का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का आठवाँ उद्देश्य बालकों में नेतृत्व का विकास करना है।इसका कारण यह है कि आज के बालक शासन की बागडोर अपने हाथों में सम्भालेंगे।अत: जनतंत्र को सफल बनाने के लिए शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिये कि वे बड़े होकर नागरिक के रूप में देश के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों का कुशलतापूर्वक नेतृत्व कर सकें |

(9) राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भावना का विकास – जनतंत्र को सफल बनाने के लिए शिक्षा का नवां उद्देश्य बालकों में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भावना का विकास करना है।ध्यान देने की बात है कि जनतंत्र जहाँ एक ओर राष्ट्रीय भावना के विकास पर बल देना है वहाँ दूसरी ओर वह अपनी सफलता के लिए अंतर्राष्ट्रीय भावना का संचार करना भी अपना परम कर्त्तव्य समझता है।इसका कारण यह है कि आधुनिक युग में कोई राष्ट्र अकेला जीवित नहीं रह सकता।उसे अपने निजी अस्तित्व को बनाये रखने के लिए संसार के अन्य राष्ट्रों से भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना आवश्यक है।अत: शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जानी चाहिये कि जहाँ बालकों में एक ओर राष्ट्रीय भावना विकसित हो, वहाँ दूसरी ओर उनमें अंतर्राष्ट्रीय भावना का विकास भी हो जाये |

भारतीय जनतंत्र में शिक्षा के उद्देश्यसंपादित करें

भारतीय जनतंत्र को सफल बनाने के लिए माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भारत की राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों की चर्चा की है –

(1) जनतांत्रिक नागरिकता का विकास- भारतवर्ष एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है।इसे सफल बनाने के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को सच्चा, इमानदार तथा कर्मठ नागरिक बनाना परम आवश्यक है।चूँकि आज के बालक कल के नागरिक बनेंगे, इसीलिए प्रत्येक बालक में जनतांत्रिक नागरिकता का विकास करना भारतीय शिक्षा का प्रथम उद्देश्य है।वस्तुस्थिति यह है कि जनतंत्र में नागरिकता एक प्रकार की चुनौती होती है।इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रत्येक बालक में उसकी प्रकृति के अनुसार ऐसे बौद्धिक, सामाजिक, तथा नैतिक गुणों को विकसित करना परम आवशयक है जिनके आधार पर वह नागरिक के रूप में देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा तथा सांस्कृतिक सभी समस्याओं के विषय में स्पष्ट रूप से चिन्तन करके अपना निजी निर्णय ले सके और उन्हें सुलझा सके।इन सभी शक्तियों को विकसित करने के लिए बालकों का बौद्धिक विकास होना चाहिये।बौद्धिक विकास के हो जाने से वे सत्य-असत्य तथा वास्तवकिता एवं प्रचार में अन्तर समझते हुए अन्ध-विश्वासों तथा निरर्थक परम्पराओं का उचित विश्लेषण करके अपने जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं को आसानी से सुलझा सकेंगे।चूँकि स्पष्ट चिन्तन का भाषण देने तथा लेखन की स्पष्टता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, इसलिए प्रत्येक बालक को शिक्षा के द्वारा इस योग्य बनाना परम आवश्यक है कि वह अपने भाषणों तथा लेखों के द्वारा अपने विचारों तो स्पष्ट करते हुए जनमत प्राप्त कर सकें।

(2) कुशल जीवन यापन कला की दीक्षा – कुशल जीवन यापन की कला में दीक्षित करना भारतीय शिक्षा का दूसरा उद्देश्य है।कोई भी व्यक्ति एकान्त में रहकर न तो जीवन यापन ही कर सकता है और न ही पूर्णरूपेण विकसित हो सकता है।व्यक्ति तथा समाज दोनों के विकास के लिए यह आवशयक है कि व्यक्ति सह-अस्तित्व की आवश्यकता को समझते हुए व्यवहारिक अनुभवों द्वारा सहयोग के महत्त्व का मुल्यांकन करना सीखे।अत: सफल सामुदायिक जीवन व्यतीत करने के लिए बालकों में सहयोग , सहनशीलता सामाजिक चेतना तथा अनुशासन आदि सामाजिक गुणों का विकास किया जाना चाहिये जिससे प्रत्येक बालक एक-दूसरे के विचारों का आदर करते हुए घुलमिल कर रहना सीख जाये |

(3) व्यवसायिक कुशलता की उन्नति – जनतंत्र की सफ़लत कुशल व्यवसायिओं तथा आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न नागरिकों पर निर्भर करती है।अत: भारतीय शिक्षा का तीसरा उद्देश्य बालकों में व्यवसायिक कुशलता के लये व्यवसायिक प्रशिक्षण परम आवश्यक है।अत: बालकों के मन में आरम्भ से ही श्रम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करनी चाहिये, हस्तकला के कार्य पर बल देना चाहिये तथा पाठ्यक्रम में विभिन्न व्यवसायों को सम्मिलित करना चाहिये जिससे प्रत्येक बालक अपनी रूचि के अनुसार उस व्यवसाय को चुन कर उसमें उचित प्रशिक्षण प्राप्त कर सके जिसे वह अपने आगामी जीवन में अपनाना चाहें।इससे हमें विभिन्न व्यवसायों के लिए कुशल कारीगर भी प्राप्त हो सकेंगे तथा औधोगिक प्रगति के कारण देश की धनधान्य से परिपूर्ण हो जायेगा |

(4) व्यक्तित्व का विकास – जनतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति बालक को सृष्टि की अमूल्य एवं पवित्र निधि समझा जाता है।अत: भारतीय शिक्षा का चौथा उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का विकास करना है।इस उद्देश्य के अनुसार बालकों को क्रियात्मक कार्यों को करने के लिये प्रेरित करना चाहिये जिससे उनमें सहित्यिक, कलात्मक तथा सांस्कृतिक आदि विभिन्न प्रकार की रुचियों का निर्माण हो जाये।रुचियों के विकसित हो जाने से बालकों को आत्माभिव्यक्ति, सांस्कृतिक तथा सामाजिक सम्पति की प्राप्ति, अवकाश काल के सदुपयोग करने की योग्यता तथा चहुंमुखी विकास में सहायता मिलेगी।इस दृष्टि से बालकों के विकास हेतु उन्हें रचनात्मक क्रियाओं में भाग लेने के लिए अधिक से अधिक अवसर प्रदान किये जाने चाहिये |

(5) नेतृत्व के लिए शिक्षा – जनतंत्र सफल बनाने के लिए योग्य, कुशलता एवं अनुभवी नेताओं की आवश्यकता होती है।अत: नेतृत्व की शिक्षा प्रदान करना भारतीय शिक्षा का पांचवां महत्वूर्ण उद्देश्य हैं।इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बालकों में उचित शिक्षा द्वारा अनुशासन, सहनशीलता, त्याग सामाजिक समस्याओं की समझदारी तथा नागरिक एवं व्यावहारिक कुशलता को विकसित, करना चाहिये जिससे यही बालक बड़े होकर नागरिक के रूप में देश के राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक तथा सांस्कृतिक आदि दभी क्षेत्रों में सफल नेतृत्व कर सकें |

जनतंत्र तथा पाठ्यक्रमसंपादित करें

जनतंत्र राज्य में पाठ्यक्रम की रचना जनतंत्रीय आदर्शों एवं मूल्यों को प्राप्त करने के लिए जाती है।अत: जनतंत्रीय पाठ्यक्रम के अन्तर्गत उन विषयों को मुख्य स्थान दिया जाता है जिसके अध्ययन से बालकों में उत्तम मनोवृतियाँ, उत्तम आभ्यास तथा योग्यता एवं सूझ-बूझ विकसित हो जायें और वे सच्चे नागरिक बनकर सफल जीवन व्यतीत कर सकें।इस दृष्टि से जनतंत्रीय पाठ्यक्रम निम्नलिखित सिधान्तों पर आधारित होता है –

(1) बहुमुखी – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम बहुमुखी होता है।इसके अन्तर्गत स्कूल का सम्पूर्ण कार्यक्रम –कक्षा के कार्य-कलाप, सहगामी क्रियायें, खेल-कूद एवं परीक्षा आदि सभी आ जाते हैं।इस प्रकार जनतंत्रीय पाठ्यक्रम अत्यंत विस्तृत होता है |

(2) सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम की रचना करते समय सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति को ध्यान में रखा जाता है जिससे बालकों में सामाजिक भावना विकसित हो जाये।इस दृष्टि से जनतंत्रीय पाठ्यक्रम में सामाजिक संगठन तथा सभाओं आदि को मुख्य स्थान दिया जाता है |

(3) लचीलापन – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम लचीला होता है।इसमें कुछ आवश्यक विषय तो बुनियादी पाठ्यक्रम के रूप में प्रत्येक बालक को अनिवार्य रूप से अध्ययन करने होते हैं।शेष विषयों को व्यक्तिगत विभिन्नता के आधार पर प्रत्येक बालक को अपनी-अपनी रुचियों, योग्यताओं तथा आवश्यकताओं के अनुसार ऐच्छिक रूप से अध्ययन करने की स्वतंत्रता होती है |

(4) स्थानीय आवश्यकताओं पर बल – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम का निर्माण स्थानीय आवश्यकताओं एवं साधनों के आधार पर किया जाता है।इस पाठ्यक्रम में समय, स्थान तथा प्रगति एवं आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी किये जा सकते हैं |

(5) व्यवसायिक आवशयकताओं की व्यवस्था – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम व्यवसायिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है |

(6) क्रिया पर बल – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम बालकों की वृधि को विकसित करने के लिए क्रिया के सिधान्त पर बल देता है।इस दृष्टि से इस पाठ्यक्रम में शिक्षा द्वारा बालकों के मस्तिष्क में बने बनाये पूर्ण विचारों, अभिवृतियों तथा निष्कर्षों को बलपूर्वक थोपने की अपेक्षा ऐसी क्रियाओं पर बल दिया जाता है जिनमें भाग लेने से सभी बालक अपने निजी अनुभवों द्वारा किसी निष्कर्ष पर आ सकें |

(7) अवकाश काल की क्रियाओं को स्थान – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम में ऐसी क्रियाओं को भी सम्मिलित किया जाता है जिनमें भाग लेते हुए अवकास कला का सदुपयोग किया जा सके |

जनतंत्र तथा शिक्षण पद्धतियाँसंपादित करें

जनतंत्र के आदर्शों, मूल्यों तथा भावनाओं का शिक्षण-पद्धतियों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।चूँकि जनतंत्र में बालक को सृष्टि की अमूल्य निधि समझते हुए उसके यक्तित्व का आदर किया जाता है, इसलिए जनतंत्रीय समाज में समस्त शिक्षण –पद्धतियाँ पर प्रकाश डाल रहे हैं –

(1) जनतंत्र का मूल सिधान्त क्रियाशीलता है।अत: जनतंत्रीय समाज में पुराने ढंग से पढ़ाने वाली निष्क्रिय शिक्षण-पद्धतियों की अपेक्षा सक्रिय शिक्षण-पद्धतियों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है |

(2) स्वतंत्रता जनतंत्र की आत्मा है।अत: जनतंत्रीय शिक्षण-पद्धतियाँ बालकों को स्वयं अपने अनुभवों द्वारा सीखने की स्वतंत्रता प्रदान करती है।मान्टेसरी-पद्धति, योजना पद्धति, डाल्टन-पद्धति, हरिसटिक पद्धति तथा प्रयोगशाल पद्धति एवं प्रयोगात्मक-पद्धति आदि प्रमुख जनतंत्रीय शिक्षण-पद्धतियां हैं।इन सभी शिक्षण पद्धतियों में बालक को स्वयं क्रिया के द्वारा ज्ञान को खोजने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।प्रत्येक बालक को ज्ञान प्राप्त करते समय शिक्षक से प्रशन पूछने तथा तर्क एवं आलोचना करने की स्वतंत्रता होती है।उक्त सभी शिक्षण पद्धतियों का प्रयोग करते समय शिक्षक बालकों को ज्ञान के विस्तृत क्षेत्र में अन्वेषण करने के लिए स्वतंत्र छोड़ देता है तथा आवश्यकता पड़ने पर मित्र एवं पर्थ प्रदर्शक के रूप में समुचित सहयता देते हुए मार्ग दर्शन भी करता रहता है।इस प्रकार जनतंत्रीय शिक्षण पद्धतियों वस्तविक जीवन के अनुभवों द्वारा बालकों में विभिन्न समस्याओं को सुलझाने की योग्ताया विकसति करती हैं जिसमें वे आगे चलकर सच्चे नागरिक बन सकें |

(3) जनतंत्रीय शिक्षण पद्धतियों के द्वारा बालकों की बुद्धि को पूर्णरूपेण विकसित किया जाता है।बालकों को जो भी कार्य डे जाते हैं वे न अधिक सरल होते हैं और न अधिक कठिन।दूसरे शब्दों में, ये कार्य न तो इतने सरल ही होते हैं कि बालकों को सोचने-विचारने की आवशयकता अवश्य पड़ती है।इससे बालकों में सोचने-विचारने तथा निर्णय लेने की शक्तियाँ विकसति होती है जो आगे चलकर उन्हें नागरिक के रूप में विभिन्न प्रकार की राजनीतिक , आर्थिक तथा सांस्कृतिक एवं सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में सहायता प्रदान करती है |

जनतंत्र तथा अनुशासनसंपादित करें

अनुशासन जनतंत्र की कुंजी है।परन्तु अनुशासन कैसा ? जनतंत्र तानाशाही अथवा दमनात्मक अनुशासन का खण्डन करते हुए स्वानुशासन पर बल देता है।अत: जनतंत्रीय स्कूल के बालकों में स्वानुशासन की भावनाओं को विकसित करने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाता है –

(1) जनतंत्रीय स्कूल में शिक्षक एक तानाशाह अथवा पुलिस का सिपाही नहीं अपितु बालकों का मित्र एवं पथ-प्रदर्शक होता है।उसका कार्य किसी बालक पर अनावश्यक दबाव न डालते हुए अपने प्रेम तथा सहानुभूतिपूर्ण  व्यवहार के द्वरा ऐसे सुन्दर, सरल तथा प्रभावपूर्ण वातावरण का निर्माण करना है जिसमें रहते हुए बालकों में स्वानुशासन की भावना स्वत: ही विकसित हो जाये |

(2) जनतंत्रीय स्कूल में ऐसी क्रियाओं को प्रतिपादित किया जाता है जिनसे सभी बालक आवश्यक नियमों का पालन करते हुए अपनी-अपनी रुचियों के अनुसार निरन्तर भाग लेते रहते हैं।इससे उनमें स्वनुशासन की भावना विकसित होती रहती है |

(3) जनतंत्रीय स्कूल की व्यवस्था तथा उसके शासन संबंधी कार्यों में भी बालकों को सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसर प्रदान किये जाते हैं।इससे सभी बालक अपने आप को सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसर प्रदान किये जाते हैं।इससे सभी बालक अपने आप को स्कूल का एक अंग समझने लगते हैं जिससे शासन में अनुशासन के महत्त्व को समझते हुए वे स्वयं भी अनुशासन में रहना सीख जाते हैं |

(4) जनतंत्रीय स्कूल में प्रत्येक बालक को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाती है।इससे अनुशासनहीनता का प्रश्न ही नहीं उठता |

(5) जनतंत्रीय स्कूल में बालकों को विधार्थी-परिषद्, विधार्थी लोक सभा तथा विधार्थी सम्मेलन आदि को संगठित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।सभी बालक इन सबको सुचारू रूप से चलाने के लिए मिलजुलकर आवशयक नियम बनाते हैं तथा स्वनिर्मती नियमों का पलान भी करते हैं।इस प्रकार बालकों पर अनुशासन बाहर से नहीं लादा जाता अपितु उनके अन्दर से उत्पन्न किया जाता है |

(6) जनतंत्रीय स्कूल में बालकों को उनके कर्तव्यों तथा अधिकारों के प्रति जागरूकता किया जाता है तथा उनको सामाजिक क्रियाओं द्वारा सामाजिक नियंत्रण का महत्त्व बताया जाता है।इस प्रकार जनतंत्रीय देशों में अनुशासन की समस्या का समाधान बल प्रयोग द्वारा नहीं किया जाता अपितु बालकों में ऐसी भावनाओं का विकास किए जाता है जिनसे उनमें स्वानुशासन में रहने की भावना स्वयं ही उत्पन्न हो जाये और वे इसके महत्त्व का अनुभव करने लगें |

जनतंत्र तथा शिक्षकसंपादित करें

जनतंत्रीय व्यवस्था में शिक्षक का स्थान एक मित्र, पथ-प्रदर्शक तथा समाज सुधारक के रूप में होता है।ऐसे शिक्षक में निम्नलिखित गुण होते हैं –

(1) जनतंत्रीय व्यवस्था में शिक्षक जनतंत्र के मूल्यों से ओत-प्रोत होता है।अत: वह अपने प्रेम तथा सहानभूति व्यवहार के द्वारा प्रत्येक बालक में जनतांत्रिक मूल्यों को विकसित करना परम आवश्यक समझता है।

(2) ऐसी व्यवस्था में शिक्षक प्रत्येक बालक को सृष्टि की पवित्र निधि समझता है।अत: वह व्यक्तिगत विभिन्नता के सिधान्त में विश्वास रखते हुए प्रत्येक बालक के व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता एवं समान अवसर प्रदान करता है |

(3) जनतंत्रीय व्यवस्था में शिक्षक प्रत्येक बालक को सृष्टि की पवित्र निधि समझता है।अत: वह ऐसे वातावरण का निर्माण करता है जिसमें रहते हुए प्रत्येक बालक का सर्वांगीण विकास होता रहे |

(4) चूँकि जनतंत्र की सफलता सुयोग्य तथा सचरित्र नागरिकों पर निर्भर करती है, इसलिए ऐसी व्यवस्था में प्रत्येक शिक्षक बालक को जनतांत्रिक नागरिक बनाने के लिए समाज तथा अभिभावकों का अधिक से अधिक सहयोग प्राप्त करता है |

(5) जनतंत्रीय व्यवस्था में प्रत्येक शिक्षक को अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का पूर्ण ज्ञान होता जा रहा है।अत: वह बालकों में इस प्रकार की जागरूकता उत्पन्न करना परम आवशयक समझता है |

(6) ऐसी व्यवस्था में प्रत्येक शिक्षक को अपने विषय की पूर्ण योग्यता होती है।अत: वह प्रत्येक बालक को उचित पथ-प्रदर्शन द्वारा इस योग्य बनाने का प्रयास करता है कि वह अपने भावी जीवन में आने वाले प्रत्येक समस्या को आसानी से सुलझा सके |

जनतंत्र तथा स्कूल-प्रशासनसंपादित करें

जनतंत्रीय व्यस्था में स्कूल का प्रशासन के आदर्शों एवं मूल्यों पर आधारित होता है।इससे जहाँ एक ओर देश के लिए सुयोग्य तथा सचरित्र नागरिकों का निर्माण होता है वहाँ दूसरी ओर विभिन्न क्षेत्रों का लिए उचित नेतृत्व का प्रशिक्षण भी होता है।परिणामस्वरूप देश उतरोतर उन्नति के शिखर पर चढ़ता रहता है।जनतंत्रीय व्यवस्था में स्कूल के प्रशासन में अधोलिखित विशेषतायें पायी जाती है - -

(1) जनतंत्रीय व्यवस्था में स्कूल का संगठन जनतंत्रीय भावना पर आधारित होता है।यूँ तो स्कूल का प्रशासन पूर्णतया शिक्षक-मण्डल, प्रधानाचार्य तथा बालकों के सहयोग से चलता है परन्तु इसका अधिकतर भार शिक्षकों के उपर ही होता है।सभी शिक्षक मिल-जुलकर स्कूल की नीति का निर्माण करते हैं, पाठ्यक्रम के निर्माण में सहयोग प्रदान करते हैं, कक्षा के कार्यों की योजनायें बनाते हैं , पुस्तकों का चयन करते हैं तथा रचनात्मक कार्यों का संगठन करते हैं |

(2) ऐसी व्यवस्था में स्कूल के प्रधानाचार्य तथा प्रबंधक एवं व्यवस्थापक द्वारा शिक्षकों को उत्क्रमणशीलता को प्रोत्साहित किया जाता है |

(3) जनतंत्रीय व्यवस्था में शिक्षा अधिकारीयों को शिक्षकों के कार्य की आलोचना करने का अधिकतर तो अवश्य होता है, परन्तु यह आलोचना व्यंग के रूप में न होकर रचनात्मक ढंग से की जाती है |

(4) ऐसी व्यवस्था में प्रधानाचार्य अपनी योजनाओं को शिक्षकों तथा बालकों पर बलपूर्वक नहीं थोपता अपितु स्कूल का समस्त कार्य सबके सहयोग की भावना पर आधारित होता है |

(5) जनतंत्रीय व्यवस्था में अभिभावकों, शिक्षकों तथा प्रधानाचार्य एवं स्कूल के निरीक्षकों के आपसी सम्बन्ध जनतंत्रीय भावना पर आधारित होते हैं |

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि जनतंत्रीय व्यवस्था में स्कूल का प्रशासन परस्पर प्रेम, सहयोग तथा सहानभूति एवं सह्करिकता के आधार पर चलता रहता है |

भारत में जनतंत्र और शिक्षासंपादित करें

15 अगस्त सन 1947 ई० को अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त होकर भारत जनतंत्र के सिधान्तों से प्रेरित होते हुए स्वतंत्रता, समानता, बन्धुता तथा न्याय के आधार पर जनतंत्रीय सरकार का गठन किया।26 नवम्बर सन 1949 ई० को भारतीय संविधान बनकर तैयार हुआ।इस संविधान को 26 जनवरी सन 1950 ई० को लागू करके यह घोषित कर दिया गया कि भारत एक सम्पूर्ण-प्रभुत्व-सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य है जो सम्पूर्ण भारतीय जनता के लिए विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, तथा धर्म उपासना की स्वतंत्रता, अवसर की समानता तथा सभी नागरिकों में बंधुत्व की भावना को विकसित करके राजनीतिक,आर्थिक एवं सामाजिक न्याय की आवश्यकता करेगा।चूँकि इन चारों आदर्शों को प्राप्त करने के लिए शिक्षा को परम आवशयक समझा गया, इसलिए संविधान में धारा 45 के अनुसार यह घोषणा कर दी गई कि देश के सभी राज्य संविधान के लागू होने की तिथि से दस वर्ष के अन्दर चौदह वर्ष तक के प्रत्येक बालक के लिए अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था करेंगे।संविधान की उपर्युक्त घोषणा के अनुसार प्रत्येक राज्य सरकार सामान्य तथा स्वस्थ बालकों के अतिरिक्त, गूंगे, बहरे, लंगड़े, अंधे तथा मंद एवं प्रखर बुद्धि वाले सभी बालकों की शिक्षित करने के लिए प्राथमिक, माध्यमिक तथा तकनीकी आदि सभी प्रकार, के स्कूलों तथा विश्वविधालयों एवं महाविधालयों का आयोजन कर रही है |

चूँकि जनतंत्र की सफलता के लिए राष्ट्र में एकता की भावना का विकसित होना परम आवशयक है, इसलिए प्रत्येक राज्य की सरकार यह प्रयास कर कर रही है कि देश का प्रत्येक नागरिक जातीयता, प्रान्तीयता, तथा भाषा आदि के भेद-भावों से ऊपर उठकर एकता के सूत्र में बंध जाये।इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जहाँ एक ओर देश के सभी बालकों की शिक्षा का प्रबन्ध किया जा रहा है वहाँ दूसरी ओर प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था भी की जा रही है।इसमें सन्देह नहीं है कि भारतीय जनतंत्र को सफल बनाने के लिए केन्द्रीय तथा राज्य सरकारें सभी मिलकर अथक प्रयास कर रही हैं, परन्तु इतना सब कुछ होते हुए भी देश की जनता में जनतंत्र के आदर्शों एवं मूल्यों को विकसित नहीं किया जा सका है।परिणामस्वरूप भारत में जनतंत्र इतना सफल नहीं हो पाया है जितना कि होना चाहिये था। इस असफलता का एकमात्र कारण है – शिक्षा की कमी |

धनाभाव के कारण न तो अभी तक संविधान की घोषणा के अनुसार चौदह वर्ष तक के बालकों की अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा हो पाई है और न ही अभी प्रौढ़ शिक्षा की पूर्ण व्यवस्था हुई है।यही नहीं, केन्द्रीय सरकार की ओर से न नियुक्त किये विभिन्न आयोगों द्वारा निर्धारित किये हुए शिक्षा के उद्देश्य भी अभी एक केवल पुस्तकों तक ही सीमित दिखाई दे रहें हैं।इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए न तो जनतंत्रीय सिधान्तों के अनुसार भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रम का ही निर्माण किया गया है और न ही जनतांत्रिक शिक्षण-पद्धतियों का प्रयोग।बालकों में बढ़ती हुई अनुशासनहीनता तथ शिक्षा-अधिकारीयों, प्रबंधकों, प्रधानाचार्यों तथा शिक्षकों एवं बालकों के बीच बढ़ता हुआ तनाव आदि सभी बाते इस बात को सिध्द करती हैं कि हमरे यहां शिक्षा में जनतंत्र असफल हो गया है।चूँकि जनतंत्र की सफलता ऐसे सुयोग्य, सचरित्र तथा सुशिक्षित नागरिकों के उपर निर्भर करती है जो अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का पालन करते हुए जनतंत्र के आदर्शों एवा मूल्यों के अनुसार जीवन व्यापन करते हों, इसलिए उक्त सभी गुणों से परिपूर्ण नागरिकों ने निर्माण हेतु भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।यदि हमारी सरकार इस ओर सतर्क हो जाये तो भारतीय जनतंत्र ही सबल एवं सफल हो सकता है |

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

  • http://hi.vikaspedia.in/education/education-best-practices/91c92892490292494d930-92492593e-93693f91594d93793e