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प्राणायाम करते हुए एक व्यक्ति

प्राणायाम योग के आठ अंगों में से एक है। अष्टांग योग में आठ प्रक्रियाएँ होती हैं।

1.यम

2.नियम

3.आसन

4.प्राणायाम

5.प्रत्याहार

6.धारणा

7.ध्यान

8.समाधि

प्राणायाम = प्राण + आयाम। इसका का शाब्दिक अर्थ है - 'प्राण (श्वसन) को लम्बा करना' या 'प्राण (जीवनीशक्ति) को लम्बा करना'। (प्राणायाम का अर्थ 'स्वास को नियंत्रित करना' या कम करना नहीं है।)प्राण या श्वास का आयाम या विस्तार ही प्राणायाम कहलाता है।यह प्राण -शक्ति का प्रवाह कर व्यक्ति को जीवन शक्ति प्रदान करता है।

करने की विधि-

सर्वप्रथम श्वास -प्रश्वास फेफड़ों में भरना।

सर्वप्रथम श्वास -प्रश्वास फेफड़ों में भरना,रोकना और फिर धीरे-धीरे छोड़ना चाहिए।

हठयोगप्रदीपिका में कहा गया है-

चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥२॥
(अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल हो जाता है और योगी स्थाणु हो जाता है। अतः योगी को श्वांसों का नियंत्रण करना चाहिये।

यह भी कहा गया है-

यावद्वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिः ततो वायुं निरोधयेत् ॥
( जब तक शरीर में वायु है तब तक जीवन है। वायु का निष्क्रमण (निकलना) ही मरण है। अतः वायु का निरोध करना चाहिये।)

परिचयसंपादित करें

प्राणायाम दो शब्दों के योग से बना है- (प्राण+आयाम) पहला शब्द "प्राण" है दूसरा "आयाम"। प्राण का अर्थ जो हमें शक्ति देता है या बल देता है। आयाम का अर्थ जानने के लिये इसका संधि विच्छेद करना होगा क्योंकि यह दो शब्दों के योग (आ+याम) से बना है। इसमें मूल शब्द '"याम" ' है 'आ' उपसर्ग लगा है। याम का अर्थ 'गमन होता है और '"आ" ' उपसर्ग 'उलटा ' के अर्थ में प्रयोग किया गया है अर्थात आयाम का अर्थ उलटा गमन होता है। अतः प्राणायाम में आयाम को 'उलटा गमन के अर्थ में प्रयोग किया गया है। इस प्रकार प्राणायाम का अर्थ 'प्राण का उलटा गमन होता है। यहाँ यह ध्यान देने कि बात है कि प्राणायाम प्राण के उलटा गमन के विशेष क्रिया की संज्ञा है न कि उसका परिणाम। अर्थात प्राणायाम शब्द से प्राण के विशेष क्रिया का बोध होना चाहिये।

प्राणायाम के बारे में बहुत से ऋषियों ने अपने-अपने ढंग से कहा है लेकिन सभी के भाव एक ही है जैसे पतन्जलि का प्राणायाम सूत्र एवं गीता में जिसमें पतन्जलि का प्राणायाम सूत्र महत्वपूर्ण माना जाता है जो इस प्रकार है- तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद:प्राणायाम॥ इसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार होगा- श्वास प्रश्वास के गति को अलग करना प्राणायाम है। इस सूत्र के अनुसार प्राणायाम करने के लिये सबसे पहले सूत्र की सम्यक व्याख्या होनी चाहिये लेकिन पतंजलि के प्राणायाम सूत्र की व्याख्या करने से पहले हमे इस बात का ध्यान देना चाहिये कि पतंजलि ने योग की क्रियाओं एवं उपायें को योगसूत्र नामक पुस्तक में सूत्र रूप से संकलित किया है और सूत्र का अर्थ ही होता है -एक निश्चित नियम जो गणितीय एवं विज्ञान सम्मत हो। यदि सूत्र की सही व्याख्या नहीं हुई तो उत्तर सत्य से दूर एवं परिणाम शून्य होगा। यदि पतंजलि के प्राणायाम सूत्र के अनुसार प्राणायाम करना है तो सबसे पहले उनके प्राणायाम सूत्र तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद:प्राणायाम॥ की सम्यक व्याख्या होनी चाहिये जो शास्त्रानुसार, विज्ञान सम्मत, तार्किक, एवं गणितीय हो। इसी व्याख्या के अनुसार क्रिया करना होगा। इसके लिये सूत्र में प्रयुक्त शब्दों का अर्थबोध होना चाहिये तथा उसमें दी गयी गति विच्छेद की विशेष युक्ति को जानना होगा। इसके लिये पतंजलि के प्राणायाम सूत्र में प्रयुक्त शब्दो का अर्थ बोध होना चाहिये।

प्राणायाम प्राण अर्थात् साँस आयाम याने दो साँसो मे दूरी बढ़ाना, श्‍वास और नि:श्‍वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को कहा जाता है।

श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। हम साँस लेते है तो सिर्फ़ हवा नहीं खीचते तो उसके साथ ब्रह्मान्ड की सारी उर्जा को उसमे खींचते है। अब आपको लगेगा की सिर्फ़ साँस खीचने से ऐसा कैसा होगा। हम जो साँस फेफडो में खीचते है, वो सिर्फ़ साँस नहीं रहती उसमे सारे ब्रम्हन्ड की सारी उर्जा समायी रहती है। मान लो जो साँस आपके पूरे शरीर को चलाना जनती है, वो आपके शरीर को दुरुस्त करने की भी ताकत रखती है। प्राणायाम निम्न मंत्र (गायत्री महामंत्र) के उच्चारण के साथ किया जाना चाहिये।

ॐ भूः भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ।

महत्वसंपादित करें

प्राणायाम का योग में बहुत महत्व है।

सावधानियाँसंपादित करें

  • सबसे पहले तीन बातों की आवश्यकता है, विश्वास,सत्यभावना, दृढ़ता।
  • प्राणायाम करने से पहले हमारा शरीर अन्दर से और बाहर से शुद्ध होना चाहिए।
  • बैठने के लिए नीचे अर्थात भूमि पर आसन बिछाना चाहिए।
  • बैठते समय हमारी रीढ़ की हड्डियाँ एक पंक्ति में अर्थात सीधी होनी चाहिए।
  • सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन किसी भी आसन में बैठें, मगर जिसमें आप अधिक देर बैठ सकते हैं, उसी आसन में बैठें।
  • प्राणायाम करते समय हमारे हाथों को ज्ञान या किसी अन्य मुद्रा में होनी चाहिए।
  • प्राणायाम करते समय हमारे शरीर में कहीं भी किसी प्रकार का तनाव नहीं होना चाहिए, यदि तनाव में प्राणायाम करेंगे तो उसका लाभ नहीं मिलेगा।
  • प्राणायाम करते समय अपनी शक्ति का अतिक्रमण ना करें।
  • ह्‍र साँस का आना जाना बिलकुल आराम से होना चाहिए।
  • जिन लोगो को उच्च रक्त-चाप की शिकायत है, उन्हें अपना रक्त-चाप साधारण होने के बाद धीमी गति से प्राणायाम करना चाहिये।
  • यदि आँप्रेशन हुआ हो तो, छः महीने बाद ही प्राणायाम का धीरे धीरे अभ्यास करें।
  • हर साँस के आने जाने के साथ मन ही मन में ओम् का जाप करने से आपको आध्यात्मिक एवं शारीरिक लाभ मिलेगा और प्राणायाम का लाभ दुगुना होगा।
  • साँसे लेते समय किसी एक चक्र पर ध्यान केंन्द्रित होना चाहिये नहीं तो मन कहीं भटक जायेगा, क्योंकि मन बहुत चंचल होता है।
  • साँसे लेते समय मन ही मन भगवान से प्रार्थना करनी है कि "हमारे शरीर के सारे रोग शरीर से बाहर निकाल दें और हमारे शरीर में सारे ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा, ओज, तेजस्विता हमारे शरीर में डाल दें"।
  • ऐसा नहीं है कि केवल बीमार लोगों को ही प्राणायाम करना चाहिए, यदि बीमार नहीं भी हैं तो सदा निरोगी रहने की प्रार्थना के साथ प्राणायाम करें।

भस्त्रिका प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। नाक से लंबी साँस फेफडों में ही भरें, फिर लंबी साँस फेफडोॆ से ही छोडें| साँस लेते और छोडते समय एकसा दबाव बना रहे। हमें हमारी गलतियाँ सुधारनी है, एक तो हम पूरी साँस नहीं लेते; और दूसरा हमारी साँस पेट में चली जाती है। देखिये हमारे शरीर में दो रास्ते है, एक (नाक, श्वसन नलिका, फेफडे) और दूसरा (मुँह्, अन्ननलिका, पेट्)| जैसे फेफडो में हवा शुद्ध करने की प्रणाली है, वैसे पेट में नहीं है। उसी के का‍रण हमारे शरीर में आॅक्सीजन की कमी महसूस होती है और उसी के कारण हमारे शरीर में रोग जुड़ते है।

लाभसंपादित करें

  • हमारा हृदय सशक्त बनाने के लिये है।
  • हमारे फेफड़ों को सशक्त बनाने के लिये है।
  • मस्तिष्क से सम्बंधित सभी व्याधिओं को मिटाने के लिये भी यह लाभदायक है।
  • पार्किनसन, पैरालिसिस, लूलापन इत्यादि स्नायुओं से सम्बंधित सभी व्यधिओं को मिटाने के लिये।
  • भगवान से नाता जोडने के लिये।

कपालभाति प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें और साँस को बाहर फैंकते समय पेट को अन्दर की तरफ धक्का देना है, इसमें सिर्फ साँस को छोड़ते रहना है। दो साँसों के बीच अपने आप साँस अन्दर चली जायेगी, जान-बूझ कर साँस को अन्दर नहीं लेना है। कपाल कहते है मस्तिष्क के अग्र भाग को, भाती कहते है ज्योति को, कान्ति को, तेज को; कपालभाति प्राणायाम लगातार करने से चहरे का लावण्य बढ़ता है। कपालभाति प्राणायाम धरती की सन्जीवनि कहलाता है। कपालभाती प्राणायाम करते समय मूलाधार चक्र पर ध्यान केन्द्रित करना होता है। इससे मूलाधार चक्र जाग्रत हो कर कुन्डलिनी शक्ति जाग्रत होने में मदद होती है। कपालभाति प्राणायाम करते समय ऐसा सोचना है कि, हमारे शरीर के सारे नकारात्मक तत्व शरीर से बाहर जा रहे हैं। खाना मिले ना मिले मगर रोज कम से कम ५ मिनिट कपालभाति प्राणायाम करना ही है, यह दृढ़ संक्लप करना है।

लाभसंपादित करें

  • बालों की सारी समस्याओँ का समाधान प्राप्त होता है।
  • चेहरे की झुरियाँ, आँखो के नीचे के डार्क सर्कल मिट जायेंगे|
  • थायराॅइड की समस्या मिट जाती है।
  • सभी प्रकार की चर्म समस्या मिट जाती है।
  • आँखों की सभी प्रकार की समस्याऐं मिट जाती है और आँखो की रोशनी लौट आती है।
  • दाँतों की सभी प्रकार की समस्याऐं मिट जाती हैं और दाँतों की खतरनाक पायरिया जैसी बीमारी भी ठीक हो जाती है।
  • कपालभाति प्राणायाम से शरीर की बढ़ी चर्बी घटती है, यह इस प्राणायाम का सबसे बड़ा फायदा है।
  • कब्ज, ऐसिडिटी, गैस्टि्क जैसी पेट की सभी समस्याएँ मिट जाती हैं।
  • यूट्रस (महिलाओं) की सभी समस्याओँ का समाधान होता है।
  • डायबिटीज़ संपूर्णतय: ठीक हो जाता है।
  • कोलेस्ट्रोल को घटाने में भी सहायक है।
  • सभी प्रकार की ऐलर्जियाँ मिट जाती हैं।
  • सबसे खतरनाक कैन्सर रोग तक ठीक हो जाता है।
  • शरीर में स्वतः हीमोग्लोबिन तैयार होता है।
  • शरीर में स्वतः कैल्शियम तैयार होता है।
  • किडनी स्वतः स्वच्छ होती है, डायलेसिस करने की जरुरत नहीं पड़ती|

बाह्य प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। साँस को पूरी तरह बाहर निकालने के बाद साँस बाहर ही रोके रखने के बाद तीन बन्ध लगाते हैं।

१) जालंधर बन्ध :- गले को पूरा सिकोड कर ठोडी को छाती से सटा कर रखना है।

२) उड़ड्यान बन्ध :- पेट को पूरी तरह अन्दर पीठ की तरफ खींचना है।

३) मूल बन्ध :- हमारी मल विसर्जन करने की जगह को पूरी तरह ऊपर की तरफ खींचना है।

लाभ्संपादित करें

  • कब्ज, ऐसिडिटी, गैस जैसी पेट की सभी समस्याएें मिट जाती हैं।
  • हर्निया पूरी तरह ठीक हो जाता है।
  • धातु, और पेशाब से संबंधित सभी समस्याएँ मिट जाती हैं।
  • मन की एकाग्रता बढ़ती है।
  • व्यंधत्व (संतान हीनता) से छुटकारा मिलने में भी सहायक है।

अनुलोम-विलोम प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। शुरुआत और अन्त हमेशां बाँये नथुने (नोस्टिरल) से ही करनी है, नाक का दाँया नथुना बंद करें व बाँये से लंबी साँस लें, फिर बाँये को बंद करके, दाँये वाले से लंबी साँस छोडे़ं...अब दाँये से लंबी साँस लें और बाँयें वाले से छोडे़ं...यानि यह दाँया-दाँया बाँया-बाँया यह क्रम रखना, यह प्रक्रिया १०-१५ मिनट तक दुहराएं| साँस लेते समय अपना ध्यान दोंनों आँखों के बीच में स्थित आज्ञा चक्र पर ध्यान एकत्रित करना चाहिए। और मन ही मन में साँस लेते समय ॐ-ॐ का जाप करते रहना चाहिए। हमारे शरीर की ७२,७२,१०,२१० सुक्ष्मादी सूक्ष्म नाड़ी शुद्ध हो जाती हैं। बाँयी नाड़ी को चन्द्र (इडा, गन्गा) नाडी, और दायीं नाडी को सूर्य (पीन्गला, यमुना) नाड़ी कहते हैं। चन्द्र नाडी से ठण्डी हवा अन्दर जाती है और सूर्य नाड़ी से गरम हवा अन्दर जाती है। ठण्डी और गरम हवा के उपयोग से हमारे शरीर का तापमान संतुलित रहता है। इससे हमारी रोग-प्रतिकारक शक्ति बढ़ जाती है।


लाभसंपादित करें

  • हमारे शरीर की ७२,७२,१०,२१० सुक्ष्मादी सूक्ष्म नाड़ी शुद्ध हो जाती है।
  • हार्ट की ब्लाॅकेज खुल जाते है।
  • हाई, लो दोंनों रक्त चाप ठीक हो जायेंगे|
  • आर्थराटिस, रह्यूमेटोइड आर्थराइटिस, कार्टीलेज घिसना जैसी बीमारियाँ ठीक हो जाती है।
  • टेढे़ लिगामेंट्स सीधे हो जायेंगे|
  • वैरीकोस वेन्स ठीक हो जाती हैं।
  • कोलेस्ट्रोल , टाँक्सिन्स, आँक्सीडैन्ट्स जैसे विजातीय पदार्थ शरीर के बाहर निकल जाते हैं।
  • सायकिक पेंशेन्ट्स को फायदा होता है।
  • किडनी प्राकृतिक रूप से स्वच्छ होती है, डायलेसिस करने की जरुरत नहीं पड़ती|
  • सबसे बड़ा खतरनाक कैन्सर तक ठीक हो जाता है।
  • सभी प्रकार की ऐलर्जीयाँ मिट जाती है।
  • मेमरी बढ़ाने के लिये।
  • सर्दी, खाँसी, नाक, गला ठीक हो जाता है।
  • ब्रेन ट्यूमर भी ठीक हो जाता है।
  • सभी प्रकार के चर्म समस्या मिट जाती है।
  • मस्तिषक के सम्बधित सभी व्याधिओं को मिटाने के लिये।
  • पार्किनसन्स, पैरालिसिस, लूलापन इत्यादि स्नायुओं से सम्बधित सभी व्याधिओं को मिटाने के लिये।
  • सायनस की व्याधि मिट जाती है।
  • डायबीटीज़ पूरी तरह मिट जाती है।
  • टाँन्सिल्स की व्याधि मिट जाती है।

भ्रामरी प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। दोनो अंगूठों से कान पूरी तरह बन्द करके, दो उंगलिओं को माथे पर रख कर, छः उंगलियों को दोनो आँखो पर रख दे। और लंबी साँस लेते हुए कण्ठ से भवरें जैसा (म……) आवाज निकालना है।

  • सायकीक पेंशेट्स को फायदा होता है।
  • मायग्रेन पेन, डीप्रेशन, और मस्तिष्क से सम्बधित सभी व्याधिओं को मिटाने के लिये।
  • मन और मस्तिषक की शांति मिलती है।
  • ब्रम्हानंद की प्राप्ति करने के लिये।
  • मन और मस्तिषक की एकाग्रता बढाने के लिये।

उद्गीथ प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। और लंबी सास लेके मुँह से ओउम का जाप करना है।

लाभसंपादित करें

  • पॉजिटिव एनर्जी तैयार करता है।
  • सायकीक पेंशेट्स को फायदा होता है।
  • मायग्रेन पेन, डिप्रेशन, ऑर मस्तिष्क के सम्बधित सभी व्याधिओं को मिटाने के लिये।
  • मन और मस्तिष्क की शांति मिलती है।
  • ब्रम्हानंद की प्राप्ति करने के लिये।
  • मन और मस्तिष्क की एकाग्रता बढाने के लिये।

प्रणव प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। और मन ही मन में एकदम शान्त बैठ कर लंबी साँस लेते हुए ओउम का जाप करना है।

लाभसंपादित करें

  • पॉझीटीव्ह एनर्जी तैयार करता है।
  • सायकीक पैशान्ट्स को फायदा होता है।
  • मायग्रेन पेन, डिप्रेशन और मस्तिषक के सम्बधित सभी व्यधिओं को मिटाने के लिये।
  • मन और मस्तिष्क की शांति मिलती है।
  • ब्रम्हानंद की प्राप्ति करने के लिये।
  • मन और मस्तिष्क की एकाग्रता बढाने के लिये।

अग्निसार क्रियासंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। यह क्रिया में कपालभाती प्राणायाम जैसा नहीं है बार बार साँस बाहर नहीं करनी है। सास को पुरी तरह बाहर नीकल के बाद बाहर ही रोक के पेट को आगे पीछे करना है।

लाभसंपादित करें

  • कब्ज, ऐसिडिटी, गँसस्टीक, जैसी पेट की सभी समस्याऐं मिट जाती हैं।
  • हर्निया पूरी तरह मिट जाता है।
  • धातु, और पेशाब के संबंधित सभी समस्याऐं मिट जाती हैं।
  • मन की एकाग्रता बढ़ेगी|
  • व्यंधत्व से छुटकारा मिल जायेगा|

== विशेष प्राणायाम ==ॐ के ओ ओर म से प्राणायाम के अभ्यास से समाधि कैसे पाएं:-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी- प्राणायाम संग ॐ उच्चरण से समाधि की प्राप्ति का अभ्यास:- मेरे पिछले सत्संग भाग 1 ओर 2 में अपने जाना ॐ के जप के ज्ञान विज्ञान का प्रयोगवादी दर्शन यानी प्रक्टिकल थ्योरी ओर ॐ के ओ व म के मानसिक जप से अपनी अंतर बहिर प्रकर्ति को अपने वशीभूत करके आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति का ज्ञान और अब बताता हूं कि कैसे ओ व म के प्राणायाम के साथ अंतर बहिर प्राण अपान के पूरक ओर रेचन ओर कुम्भक के द्धारा अपनी स्व प्रकर्ति को अपने वशीभूत करके अपने आत्मतत्व में अपने परमतत्व की प्राप्ति करके स्वयं के अवतारवाद की श्रंखला का निर्माण कैसे करे,वो एक ही शास्त्र सम्वत प्रमाणिक प्राणायाम का योगविज्ञान का अभ्यास क्या है? तो भक्तों- इस अभ्यास में प्रातः हल्का गुनगुना पानी पीकर फिर शौच से निर्वत होकर खाली पेट से गर्मियों में अपने खुले आंगन या छत पर अन्यथा पूजाघर में ओर जाड़ो में अपने पूजाघर में आसन पर सीधे बैठकर अब ऐसे प्राणायाम शुरु करें की,पहले ओ..की मानसिक ध्वनि अंतर मन मे करना प्रारम्भ करें और उसे करते हुए से ही श्वास खींचते हुए पूरक करते जाए और अपने पेट व मूलाधार तक सांस भरे, ध्यान रहे कि,इस मंत्र प्राणायाम के करते में मूलबन्ध आदि नही लगाने है,बस ओ ध्वनि के करने पर अंतर मन मे जोर देना है,ओर जितना सांस सहजता से अंदर को खिंचे,उसे ओ की अंतर ध्वनि करते हुए ध्वनि के बल से जोर लगाते हुए,जितनी देर अंदर बिना कुम्भक किये रोका जाए,उतनी देर रोकना है,फिर अब म.. की अंतर ध्वनि के जप को दीर्घ करते हुए अपनी रोकी सांस को बाहर को धीरे धीरे पूरी तरहाँ से फेंकते जाना है।ओर अब बस सारा जोर अंतर गूँजती ओर अंदर ही अंदर म.. को गूंजते हुए अपनी सांस को बिन मूलबन्ध लगाए और बिना अपनी गुदा को सिकोड़े केवल फेफड़े व पेट की सारी प्राण वायु बाहर धकेले हुए जप को करे,इस जप के जोर से सांस बाहर को जितनी देर रोकी जा सके,उतनी देर रोके,व घबराहट सी होने पर,फिर ओ..के जप गूंज करते हुए सांस को धीरे से अंदर को खींचते हुए पूरक करें। प्रारम्भ में ये प्राणायाम केवल के बार पूरक से ओर एक बार रेचक से ही करके अगले दिन को स्थगित कर दे,बिल्कुल भी दोबारा या शाम को नहीं करे,अन्यथा दिल की धड़कन का अनुपात बिगड़ जाएगा।यो अगले दिन भी एक बार ही पूरक व रेचक करे,यो एक सप्ताह बाद दो बार पूरक व दो बार रेचक करें और तीसरे सप्ताह 3 बार पूरक व 3 बार रेचक करे,ऐसे करके एक महीने तक करें।फिर ऐसा 3 महीने में 12 पूरक व 12 रेचक हो जाएंगे। बस इतना ही इस प्राणायाम को बढ़ाना है,इससे ज्यादा इस प्राणायाम को बिल्कुल भी नही बढ़ाना। यदि आप म से रेचक करते प्राणायाम की शरूवात करते जो,तो भी कोई विशेष फर्क नही पड़ता है,पर मैने पहले भी कहा है कि,आ..नांद से नवीन जीवन व नवीन सृष्टि का प्रारम्भ हुआ व पुनः पुनः होता है,ओर न..के नांद जप उच्चारण से अपने स्वरूप की ओर सिमटने का क्रम प्रारम्भ होता है,ओर अपने स्वरूप में लय हो जाता हूं।यो इस म.. से जप का रेचन सहित पहले प्राणायाम का अभ्यास का प्रारम्भ नही करें।

जिसे करने की प्रयोगिक इच्छा हो,वो चाहे करें,म नादांत में काल तक विस्तार होकर विस्तार के अंत मे मिटने के म्रत्यु के महाभाव में विलीन करता है, क्योकि म्रत्यु के बाद भी जीवन है और म्रत्यु के पहले भी जीवन है और इस प्रकार से भी म्रत्यु को ही हटा देने पर यानी प्रकार्तिक स्थूल से सूक्ष्म से सुक्षमतीत काल का पर्दा तब केवल जीवन ही रह जाता है और उसी जीवन मे स्थित व स्थिर होना ही कुम्भक यानी समाधि है,तब भी ये सब सूक्ष्म अमरदेह बज्रदेह शब्दातीत देह देने पर भी प्रकर्ति को सम्पूर्ण भेद नही पाती है।इसे अमरदेह यानी बज्रदेह कोबप्राप्त करके अनेक योगी अनन्तकाल से आज तक उस देह से आगे की साधना में लगे है,ये मछेन्द्रनाथ गोरख व बाबा जी,त्रिलँग स्वामी आदि सब इसी देह को प्राप्त कर अपने अनन्तकाल से दीक्षित शिष्यों को इस बताये योग के अनेक स्थूल प्राणायामों में उनके विकास को शक्तिपात करते रहते। ये मेने पहले सोने पर हुए अचानक आंतरिक ओ के प्राणायाम जिसकी विधि रेकी का ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने अंदर लाना व विस्तार करने का अभ्यास है,फिर एक बार म के स्वयं उत्पन्न शब्द घोष से अपने शरीर से निकल कर अनेक योगियों को काल के पर्दे के पीछे अमरदेह में साधना करते देखा व जिनमे विशेषकर मछेन्द्र नाथ जिन्हें आज के साधक लोग महावतार बाबा के नाम से जानते है,इनसे इसी विषय पर वार्ता हुई।

तब यही निष्कर्ष हुआ कि ये म के उच्चारण के साथ प्राणायाम के रेचक करके वही रेचन अवस्था मे अपने को म के नादांत तक रोकने से बाहरी संसार से जागने का अभ्यास किया जाता है ओर ओ के उच्चारण से पूरक करने व वही ओ के पूरक होने की पूरी अंत तक की अवस्था मे कुम्भक करके रुकने में अंतर संसार की नींद तोड़कर जागने का अभ्यास किया जाता है ओर फिर इसॐ को त्याग कर उससे प्राप्त एक शब्दातीत शून्यता को धारण करते हुए केवल कुम्भक करके इन दोनों बहिर व अंतर संसार के बीच जो सन्धि संसार है,उसे तोड़कर जगाने का अभ्यास किया जाता है,जो अमरदेह में ही सिद्ध होता है और तब सच्चा कुम्भक की प्रप्ति होती है,तब सत्य समझ आएगा और असली कुम्भक में स्थिर हो जाओगे।यही बिन प्रयास की समाधि कुम्भक है,यही प्राप्ति हमारा ॐ से प्राणायाम का उद्धेश्य है। ये प्रकार्तिक भंग की साधना है,इसे परे जाने को सत्य का ॐ के साथ संयुक्त करके अपने मे सिद्धायै नामक सिद्ध अवस्था पाई जाती है,जिसमे ईं महाकुंलिनी का बीजमंत्र शब्द से इस महापथ परचढ़ा जाता है और तब नमः से स्वयं के अहंकार को सच्चे अहंकार की मैं हूं सनातन शाश्वत सत्य स्वरूप स्वं प्रकर्ति को अपने वशीभूत करके स्व जन्मा व आजन्मा घोष से बिन मनुष्य योनि के गर्भ में आये केवल उनसे पिंड का निर्माण कराकर उसमे प्रवेश करके इस प्रकर्ति में प्रारम्भ सेवहि चेतन्य शक्ति सम्पन्नता लिए पूण योगी होकर जन्मना,यहिं से अवतार वाद का जन्म और स्वयं धर्म की स्थापना करके अपने ही स्वरूपो को चतुर्थ फट रूप में अपने शक्तिपात ओर अपने भक्ति की शक्ति से प्रसारित प्रकट प्रजनन करके स्वाहा से विस्तृत करना,ओर उन्ही भक्तो के ह्रदय में निवास करना,तभी हर अवतरित योगी कहता है,की मैं ही तुम्हारे ह्रदय में निर्वासित घट घट व्यापित ईश्वत्त्व प्राप्त आत्मा और भक्ति हूं,यो मुझसे जुडो ओर मुझमें लीन होकर मुक्त हो जाओ।यही सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट स्वाहा की अपने को ही अवतारवादी साधना व मोक्ष का सम्पूर्ण अर्थ की रेहिबक्रिया योग सहित साधना है।जिसे जपते करो ओर आत्मसाक्षात्कर की प्राप्ति करो। स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी,सत्य ॐ सिद्धाश्रम शनिदेव मन्दिर कोर्ट रोड बुलन्दशहर उत्तर प्रदेश।

उज्जायी प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। सीकुडे हुवे गले से सास को अन्दर लेना है।

लाभसंपादित करें

  • थायराँइड की शिकायत से आराम मिलता है।
  • तुतलाना, हकलाना, ये शिकायत भी दूर होती है।
  • अनिद्रा, मानसिक तनाव भी कम करता है।
  • टी•बी•(क्षय) को मिटाने में मदद होती है।
  • गुंगे बच्चे भी बोलने लगेंगे|

सीत्कारी प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। जिव्हा तालू को लगाके दोनो जबड़े बन्द करके लेना और उस छोटी सी जगह से सीऽऽ सीऽऽ करत॓ हुए हवा को अन्दर खीचना है। और मुँह बन्द करके से साँस को नाक से बाहर छोड़ दे। जैसे ए• सी• के फिन्स होते है, उससे ए• सी• के काँम्प्रेसर पर कम दबाव आता है और गरम हवा बाहर फेकने से हमारी कक्षा की हवा ठंडी हो जाती है। वैसे ही हमे हमारे शरीर की अतिरिक्त गर्मी कम कर सकते है।

लाभसंपादित करें

  • शरीर की अतिरिक्त गरमी को कम करने के लिये।
  • ज्यादा पसीना आने की शिकायत से आराम मीलता है।
  • पेट की गर्मी और जलन को कम करने के लिये।
  • शरीर पर कही़ं भी आयी हुई फोड़ी को मिटाने की लिये।

शितली प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। हमारे मुँह का " ० " आकार करके उससे जीव्हा को बाहर निकालना, हमरी जीव्हा भी " ० " आकार की हो जायेगी, उसी भाग से हवा अन्दर खीचनी है। और मुँह बन्द करके से साँस को नाक से बाहर छोड़ दे।

लाभसंपादित करें

  • शरीर की अतिरिक्त गरमी को कम करने के लिये।
  • ज्यादा पसीना आने की शिकायत से आराम मिलता है।
  • पेट की गर्मी और जलन को कम करने के लिये।
  • शरीर पर कहीं भी आई हुई फोड़ी को मिटाने की लिये।

शीतली प्राणायमसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। हमारे मुँह का " ० " आकार करके उससे जिव्हा को बाहर निकालना, हमारी जीव्हा भी " ० " आकार की हो जायेगी, उसी भाग से हवा अन्दर खीचनी है। और मुँह बन्द करके से साँस को नाक से बाहर छोड़ दे।

लाभसंपादित करें

  • शरीर की अतिरिक्त गरमी को कम करने के लिये।
  • ज्यादा पसीना आने की शिकायत से आराम मीलता है।
  • पेट की गर्मी और जलन को कम करने के लिये।
  • शरीर पर कहा भी आयी हुई फोड़ी को मिटाने की लिये।

चंदभेदी प्राणायामसंपादित करें

सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। हमारे मुँह का " ० " आकार करके उससे जीव्हा को बाहर निकालना, हमरी जीव्हा भी " ० " आकार की हो जायेगी, उसी भाग से हवा अन्दर खीचनी है। और मुँह बन्द करके से साँस को नाक से बाहर छोड़ दे।

लाभसंपादित करें

जैसाकि "सूय॔भेदी प्राणायाम" अनुभाग के अंतरगत वर्णित है।|

इसके अलावा भी योग में अनेक प्रकार के प्राणायामों का वर्णन मिलता है जैसे-

1. अनुलोम-विलोम प्राणायाम

2. अग्नि प्रदीप्त प्राणायाम

3. अग्नि प्रसारण प्राणायाम

4. एकांड स्तम्भ प्राणायाम

5. सीत्कारी प्राणायाम

6. सर्वद्वारबद्व प्राणायाम

7. सर्वांग स्तम्भ प्राणायाम

8. सम्त व्याहृति प्राणायाम

9. चतुर्मुखी प्राणायाम,

10. प्रच्छर्दन प्राणायाम

11. चन्द्रभेदन प्राणायाम

12. यन्त्रगमन प्राणायाम

13. वामरेचन प्राणायाम

14. दक्षिण रेचन प्राणायाम

15.शक्ति प्रयोग प्राणायाम

16. त्रिबन्धरेचक प्राणायाम

17. कपाल भाति प्राणायाम

18. हृदय स्तम्भ प्राणायाम

19. मध्य रेचन प्राणायाम

20. त्रिबन्ध कुम्भक प्राणायाम

21. ऊर्ध्वमुख भस्त्रिका प्राणायाम

22. मुखपूरक कुम्भक प्राणायाम

23. वायुवीय कुम्भक प्राणायाम

24. वक्षस्थल रेचन प्राणायाम

25. दीर्घ श्वास-प्रश्वास प्राणायाम

26. प्राह्याभ्न्वर कुम्भक प्राणायाम

27. षन्मुखी रेचन प्राणायाम

28. कण्ठ वातउदा पूरक प्राणायाम

29. सुख प्रसारण पूरक कुम्भक प्राणायाम

30. नाड़ी शोधन प्राणायाम व नाड़ी अवरोध प्राणायाम

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें