प्रेतराज मेंहदीपुर बालाजी मंदिर में बालाजी महाराज के सहायक हैं। प्रेतराज का अर्थ होता है प्रेतों का राजा। इनकी कथा सभी स्थानों पर अलग अलग दी गई है। जो इस प्रकार है -:

पहली कथासंपादित करें

पहली कथा रामायण के एक संस्करण में मिलती है। उस के अनुसार जब श्री बालाजी महाराज ने लंका दहन किया तो असुर नरेश रावण के यहां एक ऋषि रहते थे उनका नाम था नीलासुर। श्री बालाजी महाराज को लंका दहन करते हुए ऋषि नीलासुर ने देख लिया और वे समझ गए कि ये कपि कोई साधारण कपि नहीं हो सकता ये अवश्य ही कोई दिव्य देहधारी हैं। उन्होंने श्री हनुमान जी महाराज से उनका परिचय पूछा तो श्री बालाजी महाराज ने उत्तर दिया कि मैं श्री राम का सेवक हूं जो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। उनकी ऐसी बातें सुनकर ऋषि नीलासुर को श्री राम के दर्शन करने की इच्छा हुई उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए श्री बालाजी महाराज ने श्री राम के दर्शन करवाए। जब श्री राम वापिस बैकुंठ धाम को जाने लगे तो उन्होंने श्री हनुमान महाराज को आदेश दिया " हे हनुमान तुम्हें कलयुग में मेरे कल्कि अवतार की प्रतीक्षा करनी होगी और तब तक भक्तों का कल्याण करने के लिए मेंहदीपुर दौसा में प्रकट हो और भक्तों का कल्याण करो। तब श्री बालाजी महाराज ने ऋषि नीलासुर का स्मरण किया और कहा कि "आज से ये संसार आपको प्रेतराज सरकार के नाम से जानेगा। मुझसे पहले आपकी पूजा की जाएगी और आप बुरी शक्तियों को दण्ड देने का अधिकार रखेंगे। आप मेरे दण्डनायक के रूप में कार्यरत होंगे"।

दूसरी कथासंपादित करें

एक दूसरी कथा के अनुसार प्रेतराज सरकार एक भटकता हुआ प्रेत हुआ करते थे जो एक पेड़ पर बैठकर लोगों को डराकर आनन्द प्राप्त करते थे। एक दिन सन्योगवश श्री बालाजी महाराज उस वृक्ष के नीचे विश्राम करने गए। प्रेत ने उन्हें भी भयभीत करने का प्रयास किया लेकिन बालाजी महाराज ने उनपर अपनी गदा का जोरदार प्रहार किया। उससे डरकर प्रेत ने श्री बालाजी महाराज से क्षमा याचना की। श्री बालाजी महाराज ने कहा कि "आज से तुम प्रेतराज सरकार कहलाओगे तथा अन्य सभी भूतों को काबू में रखोगे। तुम्हारी पूजा मुझसे पहले होगी तथा तुम मेरे दण्डनायक के पद पर कार्यरत होगे"।

तीसरी कथासंपादित करें

तीसरी कथा सर्वाधिक प्रचलित कथा है जो इस प्रकार है -:

ऐसा कहा जाता है कि प्रेतराज सरकार अपने जीवनकाल में जयपुर के राजा हुआ करते थे जो भूत , प्रेत , जिन्न , डायन , चुड़ैल आदि बुरी शक्तियों को पकड़कर अपना गुलाम बनाने की कला जानते थे इसी कारण उन्हें प्रेतों का राजा श्री प्रेतराज कहा गया है। मेहंदीपुर में प्रकट होने से पूर्व बालाजी महाराज को एक सहायक की आवश्यता महसूस हुई। वे जयपुर में गए और वहां के नागरिकों से उन्हें जयपुर नरेश के बारे में पता चला जो बुरी शक्तियों को अपना गुलाम बना लेते थे। इसी कारण उनके मन में उन्हें अपना सहायक बनाने का विचार आया। उन्होंने प्रेतराज को अपना सहायक बनाने का आदेश दिया लेकिन श्री प्रेतराज उस समय बहुत गुस्से में थे। जिस कारण उन्होंने श्री बालाजी महाराज का आदेश नहीं माना। श्री बालाजी महाराज ने दूसरी बार प्रेतराज से अपना सहायक बनाने का अनुरोध किया। इस पर प्रेतराज बोले "चूंकि मैं एक राजा हूं मेरी पूजा आपसे पहले होनी चाहिए साथ ही मेरी कचहरी में मेरा ही हुकुम चले। श्री बालाजी महाराज ने प्रेतराज की ये बातें स्वीकार कर ली और उन्हें अपना सहायक बना लिया। इसी मान्यता के आधार पर भक्त बालाजी महाराज के दर्शन के पूर्व श्री प्रेतराज सरकार के दर्शन करने प्रेतराज मंदिर जातें हैं जो बालाजी मंदिर से ठीक ऊपर बना हुआ है। श्री प्रेतराज का हुकुम ही उनकी कचहरी में चलता है। प्रेतराज दरबार रोज दोपहर दो बजे लगता है। जिसमें बुरी आत्माओं की पेशी प्रेतराज सरकार के समक्ष होती है।

प्रेतराज का भोगसंपादित करें

श्री प्रेतराज सरकार को खीर का भोग विशेष प्रिय है। इसी के साथ उन्हें पके हुए चावलों का भी भोग लगाया जाता है।