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तेरहवी शताब्दी में अमरकोट(वर्तमान में पाकिस्तान) से श्री रूपसिंह महाराज के पूर्वज गोपा नायक आये थे वह राजपूत वंश से थे | गोपा अपने भाई पछाण के साथ दिल्ली के बादशाह की शाही सेना में सैनिक थे | यह दोनों भाई गोड़(सोड़ावत) जाति के राजपूत थे | इनके वंश में पछाण का नाहर, नाहर का वीरम, वीरम का रामसिंह और रामसिंह के आसोसिंह, आसोसिंह के रूपसिंह व सूरजमल हुये | रूपसिंह के चार लड़के गोविन्द,गोपाल,धनराज और मोकुल हुये तथा सूरजमल के एक पुत्र धनराज हुआ | आसोसिंह के पुत्र रूपसिंह बड़े हि निर्भीक, साहसी,स्वाभिमान प्रेमी एवं अपनी स्वतंत्रता में रहने के आदि थे | वो किसी की दासता स्वीकार नहीं करना चाहते थे | अपने अडिग स्वाभाव,खानाबदोष जीवन और सामाजिक अवमानना के कारण उनका अपने वंश एवं कुल से सम्बन्ध विच्छेद हो गया और ये नाहर-मगर के जंगल में रहने लगे | इस कारण विवाह आदि के समाधान हेतु रूपसिंहजी ने एक नविन समाज की स्थापना करने का विचार किया | इन्होंने अपने सहयोगी भाईयो ओगलिया,सुरवात,बगाड़ा को एकत्रित किया व अपनी जाति बदलकर गरासिया हो गये | तीन जातियों ने इनका साथ दिया कछावा जहां रूपसिंह का ससुराल था, चावड़ा जहां रूपसिंह का ननिहाल था, दायमा जो की उनके लड़के मोकुल का ससुराल था | इन्होंने मिलकर नयी जाति बनायीं जिसे बामनिया भाट की संज्ञा दी | इसमें विभिन्न राजपूत वंशो के बारह गोत्र हैं - गोड़,गरासिया,सुरावत,नाथावत,बगाड़ा,ओगालिया ये छ: गोत्र एक हि कूल के माने जाते हे | ये परस्पर अपने को भाई मानते हे | श्री रूपा नायक नाहर-मगरा के जंगल में रहते थे | उस समय उदयपुर दरबार महाराजा अड़सी शिकार खेलने आये | दरबार को प्यास लगी, सैनिक पानी खोजने लगे इस दोरान उनको रूपसिंह का डेरा मिला | दरबार ने पानी पिलाने के बदले में रूपसिंह की निर्भयता,वीरता से प्रभावित होकर 12 गाव व 11000 बीघा जमीन जागीर में दे दी और रूपसिंह बामनिया में रहने लगे | सभी जागीरदारों को दरबार के यहाँ हाजरी देने जाना पड़ता था लेकिन रूपसिंह को किसी की दासता पसंद नहीं थी | महाराणा ने रूपसिंह को ख़त्म करने के लिये मारवाड़ परगना के एकलमल जिसने मेवाड़ में लुट-पाट मचा राखी थी, को षड़यंत्र पूर्वक दोनों में युद्ध करवाने की ठानी और रूपसिंह को बुलावा भेजा | जब रूपसिंह महाराणा के दरबार में गए तो द्वारपाल ने गेट खोला तब रूपसिंह महाराज जो की गुरु धनराज पंड्या के भगत थे और लाला सती का स्मरण किया और घोड़े को एड़ लगायी | घोडा कूदकर दरबार में प्रवेश हो गया | रूपसिंह ने राजा के अनुसार एकलमल को मारा | एकलमल की पत्नीं रूपसिंह को श्राप देने लगी तब रूपसिंह ने उन्हें रोका और रोकने पर वह कहने लगी उसे पत्नीं के रूप में स्वीकार करे | रूपसिंह ने श्राप से डरकर उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया | गुरु धनराज पंड्या का पूरा किस्सा सुनाया और गुरु ने कहा कि तुमने पाप किया हे और पाप का प्रायश्चित करने के लिये चारनाथ भुजा का शिखर बनाओ तथा गायों के पीने के पानी के लिये तालाब का निर्माण कराओ | तब रूपसिंह ने चार भुजा का मंदिर बनाया तथा बामनिया के आसपास सात तालाब खुदवाए | श्री रूपसिंह महाराज को एकलमल के मामा मंगलिया ने औरत के वैश में आकर कटार मार दी और कमरबंद खोलने के दोरान वह वीर गति को प्राप्त हो गए

🙏🙏 लेखक =होकम गरासिया ग्राम छायनरूंडी पंचायत

पिछंला तहसील शामगढ जिला मदंसोर  मध्यप्रदेश🙏🙏🌹🌹

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बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

  • African Pygmies Nomadic and semi-nomadic peoples in the Central African rainforest