बहुजन हिताय बहुजन सुखाय च (शाब्दिक अर्थ - 'अधिकाधिक लोगों के हित के लिए एवं अधिकाधिक लोगों के सुख के लिए') एक सूत्रवाक्य है जो त्रिपिटक के विनयपिटक में मिलता है। इसी सूत्र का अनुसरण करते हुए गौतम बुद्ध ने (ईसापूर्व ५वीं शताब्दी में) अपने शिष्यों को जनसामान्य के कल्याण एवं सुख के लिए कार्य करने का उपदेश दिया। [1]अन्य अनेक लोगों ने भी इस सूत्र के अनुसार कार्य करने की सलाह दी है जिनमें स्वामी विवेकानन्द तथा महर्षि अरविन्द घोष के नाम उल्लेखनीय हैं। यह सूत्र आकाशवाणी का ध्येयवाक्य (मोट्टो) भी है।

यह सूत्र इस प्रकार है ,

'चरथ भिक्खवे चारिकं, बहुजन हिताय बहुजन सुखाय।   लोकानुकंम्पाय अध्याय हिताय सुखाय देवमनुस्नानं ।

देसे थ भिक्खवे , धम्मं आदि कल्याणं मज्झे कल्याणं परियोसान कल्याणं । सात्थं सव्यज्जनं केवल परिपुण्णं परिसुद्धं ब्रम्हचरियं पकासेथं ।

इस का अर्थ इस प्रकार है , भिकखुओं ! बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, लोक पर अनुकंपा करने के लिए, देवताओं और मनुष्यों के प्रयोजन के लिए, हित और सुख के लिए विचरण करो, भिक्खुओं ! यह धम्म आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी और अंत में भी कल्याणकारी हैं । इस धम्म का उसके अर्थों और भावों सहित उपदेश करके परिपूर्ण एवं परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करो । "

सन्दर्भसंपादित करें

  1. चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं । देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मंझे कल्याणं परियोसान कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ। (महावग्ग : विनयपिटक)
    अर्थ- भिक्षुओ, बहुजनसुख के लिये, बहुजन हित के लिये , लोगों को सुख पंहुचाने के लिये निरन्तर भ्रमण करते रहो। आदि-मध्य-और अन्त सभी अवस्थाओं के लिये कल्याणमय धर्म का भाव और आचरण-सहित प्रकाश करते रहो !