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बहुजन हिताय बहुजन सुखाय च (शाब्दिक अर्थ - 'अधिकाधिक लोगों के हित के लिए एवं अधिकाधिक लोगों के सुख के लिए') एक सूत्रवाक्य है जो ऋग्वेद में मिलता है। इसी सूत्र का अनुसरण करते हुए गौतम बुद्ध ने (ईसापूर्व ५वीं शताब्दी में) अपने शिष्यों को जनसामान्य के कल्याण एवं सुख के लिए कार्य करने का उपदेश दिया। [1]अन्य अनेक लोगों ने भी इस सूत्र के अनुसार कार्य करने की सलाह दी है जिनमें स्वामी विवेकानन्द तथा महर्षि अरविन्द घोष के नाम उल्लेखनीय हैं। यह सूत्र आकाशवाणी का ध्येयवाक्य (मोट्टो) भी है।

हिन्दू धर्म में पाँच मूलभूत दार्शनिक अवधारणाएँ हैं जिनमें से 'बहुजन हिताय बहुजन सुखाय च' है। [2]

सन्दर्भसंपादित करें

  1. चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं । देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मंझे कल्याणं परियोसान कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ। (महावग्ग : विनयपिटक)
    अर्थ- भिक्षुओ, बहुजनसुख के लिये, बहुजन हित के लिये , लोगों को सुख पंहुचाने के लिये निरन्तर भ्रमण करते रहो। आदि-मध्य-और अन्त सभी अवस्थाओं के लिये कल्याणमय धर्म का भाव और आचरण-सहित प्रकाश करते रहो !
  2. (१) ईशावाश्यमिदं यद्किञ्च जगत्यां जगत् (इस संसार में जो कुछ भी है उसमें ईश्वर का वास है);
    (2) ईश्वरः सर्वभूतानां हृदये वसति (ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में रहता है।) ;
    (3) अमृतस्य पुत्राः (हम सभी 'न मरने वाले' के पुत्र हैं) इसलिए वसुधैव कुटुम्बकम् (सारी पृथ्वी ही परिवार है।)
    (४) एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति (सत्य एक ही है, ज्ञानी लोग उसे अनेक प्रकार से कहते हैं। )
    (५) बहुजन सुखाय बहुजन हिताय च (अधिक से अधिक लोगों के सुख के लिए और अधिक से अधिक लोगों के हित के लिए)