लेखक परिचय बिहारी लाल हरित हिंदी दलित कविता के प्रसिद्ध हस्ताक्षर रहे हैं। हीरा डोम और अछूतानंद जैसे प्रारंभिक दलित रचनाकारों की श्रेणी में हरित का नाम लिया जाता है। सन 1940 से 80 के दशक तक दलित हिंदी कविता धारा के क्षेत्र में हरित एवं उनके शिष्यों का प्रभाव रहा है। दलित समाज के प्रसिद्ध नारे जय भीम की सजना का श्रेया बिहारीलाल हरित को है। उन्होंने ही 1946 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के जन्म दिवस समारोह के अवसर पर पहली बार दिल्ली में डॉ आंबेडकर की उपस्थिति में एक गीत के माध्यम से जय भीम का उद्घोष किया था यथा "नवयुवक कौम के जूट जावै सब मिलकर कौम परस्ती में जय भीम का नारा लगा करें भारत की बस्ती बस्ती में"।

डॉक्टर अंबेडकर को दलित समाज के घर घर तक पहुंचाने तथा जनमानस को अंबेडकर के प्रति श्रद्धा से भरने के लिए हरित जी ने 1983 में भीमायण महाकाव्य की रचना की। अभिमान की एक विशेषता यह भी है कि इसमें उन्हीं छंदों का प्रयोग किया गया है जिनका प्रयोग तुलसीदास ने रामचरितमानस में किया है। यह साहित्य के उन आचार्य आलोचकों के लिए एक सशक्त जवाब है जो दलित रचनाकारों में कौशल की संभावनाओं को नकारते हैं। वीरांगना झलकारी बाई हरित जी का दूसरा महत्वपूर्ण काव्य ग्रंथ है जिसमें देश के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना से वीरता पूर्वक लड़का अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाली दलित वीरांगना झलकारी बाई के शौर्य और बलिदान की गौरव गाथा का चित्रण कर इतिहास के उन प्रसंगों और घटनाओं की ओर समाज और राष्ट्र क्या ध्यान आकृष्ट करने का सार्थक प्रयास किया गया है जो दलितों के राष्ट्र प्रेम त्याग और शौर्य से परिपूर्ण है। प्रसिद्ध दलित राजनेता और देश के भूतपूर्व उप प्रधान मंत्री बाबू जगजीवन राम के जीवन पर आधारित जग जीवन ज्योति नामक एक चंपू काव्य की रचना भी उन्होंने की। बिहारीलाल हरित अभिमान के कवि थे। सन 1940 में हापुर उत्तर प्रदेश निवासी चर्चित शायर जिनका उपनाम बूंम था उसने चमारी नामा नामक एक लघु पुस्तिका लिखी जिसमें दलित की स्त्रियों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की गई थी। हरित जी का मानस दलितों के प्रति बूम की आपत्तिजनक टिप्पणियों साहब और आंदोलित हुआ और उन्होंने चमार नामा लिखकर बूंम का सटीक जवाब दिया। इसके अलावा भी बिहारीलाल हरित ने अन्य कई पुस्तकें लिखी जिनमें अछूतों का बेताज बादशाह प्रमुख है। हिंदी दलित साहित्य में कई महाकाव्य रचे गए जिनमें बिहारीलाल हरित कृत्य भीमआयन जग जीवन ज्योति कथा वीरांगना झलकारी बाई प्रसिद्ध है। इस प्रकार सन 40 से लेकर 80 के दशक तक दलित समाज में अंबेडकरी आंदोलन के प्रचार प्रसार में हरित जी की महत्वपूर्ण साहित्यिक सभा गीता रही है इनकी काव्य संवेदना का निर्माण असमानता शोषण और अन्याय के प्रतिकार का उद्वेलन है जिसका संबंध समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने से है। हरित जी दलित चेतना के समर्थ रचनाकार हैं जिन की कविताओं में प्रतिरोध की भावना प्रबल दिखती है। जन्म जन्म चमार जाटव (दलित) परिवार में हुआ था। प्रसिद्ध रचनाएं १) भीमायण महाकाव्य २) वीरांगना झलकारी बाई महाकाव्य ३) जग जीवन ज्योति महाकाव्य ४) चमार नामा ५) अछूतों का बेताज बादशाह इत्यादि वर्ण्य विषय संपादित करें बिहारी की कविता का मुख्य विषय श्रृंगार है। उन्होंने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का वर्णन किया है। संयोग पक्ष में बिहारी ने हावभाव और अनुभवों का बड़ा ही सूक्ष्म चित्रण किया हैं। उसमें बड़ी मार्मिकता है। संयोग का एक उदाहरण देखिए -

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय। सोह करे, भौंहनु हंसे दैन कहे, नटि जाय॥ बिहारी का वियोग वर्णन बड़ा अतिशयोक्ति पूर्ण है। यही कारण है कि उसमें स्वाभाविकता नहीं है, विरह में व्याकुल नायिका की दुर्बलता का चित्रण करते हुए उसे घड़ी के पेंडुलम जैसा बना दिया गया है -

इति आवत चली जात उत, चली, छसातक हाथ। चढी हिंडोरे सी रहे, लगी उसासनु साथ॥ सूफी कवियों की अहात्मक पद्धति का भी बिहारी पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। वियोग की आग से नायिका का शरीर इतना गर्म है कि उस पर डाला गया गुलाब जल बीच में ही सूख जाता है -

औंधाई सीसी सुलखि, बिरह विथा विलसात। बीचहिं सूखि गुलाब गो, छीटों छुयो न गात॥ भक्ति-भावना संपादित करें बिहारी मूलतः श्रृंगारी कवि हैं। उनकी भक्ति-भावना राधा-कृष्ण के प्रति है और वह जहां तहां ही प्रकट हुई है। सतसई के आरंभ में मंगला-चरण का यह दोहा राधा के प्रति उनके भक्ति-भाव का ही परिचायक है -

मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय। जा तन की झाई परे, स्याम हरित दुति होय॥ बिहारी ने नीति और ज्ञान के भी दोहे लिखे हैं, किंतु उनकी संख्या बहुत थोड़ी है। धन-संग्रह के संबंध में एक दोहा देखिए -

मति न नीति गलीत यह, जो धन धरिये जोर। खाये खर्चे जो बचे तो जोरिये करोर॥ प्रकृति-चित्रण संपादित करें प्रकृति-चित्रण में बिहारी किसी से पीछे नहीं रहे हैं। षट ॠतुओं का उन्होंने बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। ग्रीष्म ॠतु का चित्र देखिए -

कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ। जगत तपोतवन सो कियो, दारिग़ दाघ निदाघ॥ बिहरि गाव वालो कि अरसिक्त का उपहास करते हुए कहते हैं-

कर फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहि। रे गंधी मतिअंध तू इत्र दिखावत काहि॥ बहुज्ञता संपादित करें बिहारी को ज्योतिष, वैद्यक, गणित, विज्ञान आदि विविध विषयों का बड़ा ज्ञान था। अतः उन्होंने अपने दोहों में उसका खूब उपयोग किया है। गणित संबंधी तथ्य से परिपूर्ण यह दोहा देखिए -

कहत सवै वेदीं दिये आंगु दस गुनो होतु। तिय लिलार बेंदी दियैं अगिनतु बढत उदोतु॥ भाषा संपादित करें बिहारी की भाषा साहित्यिक भाषा ब्रज भाषा है। इसमें सूर की चलती ब्रज भाषा का विकसित रूप मिलता है। पूर्वी हिंदी, बुंदेलखंडी, उर्दू, फ़ारसै आदि के शब्द भी उसमें आए हैं, किंतु वे लटकते नहीं हैं। बिहारी का शब्द चयन बड़ा सुंदर और सार्थक है। शब्दों का प्रयोग भावों के अनुकूल ही हुआ है और उनमें एक भी शब्द भारती का प्रतीत नहीं होता। बिहारी ने अपनी भाषा में कहीं-कहीं मुहावरों का भी सुंदर प्रयोग किया है। जैसे -

मूड चढाऐऊ रहै फरयौ पीठि कच-भारु/ रहै गिरैं परि, राखिबौ तऊ हियैं पर हारु॥ शैली संपादित करें विषय के अनुसार बिहारी की शैली तीन प्रकार की है

1 - माधुर्य पूर्ण व्यंजना प्रधानशैली - वियोग के दोहों में। 2 - प्रसादगुण से युक्त सरस शैली - भक्ति तथा नीति के दोहों में। 3 - चमत्कार पूर्ण शैली - दर्शन, ज्योतिष, गणित आदि विषयक दोहों में।

रस संपादित करें बिहारी के काव्य में शांत, हास्य, करुण आदि रसों के भी उदाहरण मिल जाते हैं, किंतु मुख्य रस श्रृंगार ही है।

छंद संपादित करें बिहारी ने केवल दो ही छंद अपनाए हैं, दोहा और सोरठा। दोहा छंद की प्रधानता है। बिहारी के दोहे समास-शैली के उत्कृष्ट नमूने हैं। दोहे जैसे छोटे छंद में कई-कई भाव भर देना बिहारी जैसे कवि का ही काम था।

अलंकार संपादित करें अलंकारों की कारीगरी दिखाने में बिहारी बड़े पटु हैं। उनके प्रत्येक दोहे में कोई न कोई अलंकार अवश्य आ गया है। किसी-किसी दोहे में तो एक साथ कई-कई अलंकारों को स्थान मिला है। अतिशयोक्ति, अन्योक्ति और सांगरूपक बिहारी के विशेष प्रिय अलंकार हैं अन्योक्ति अलंकार का एक उदाहरण देखिए -

स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखु विहंग विचारि। बाज पराये पानि पर तू पच्छीनु न मारि।। एवम् मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरी सोइ। जा तन की झाई पारे, श्यामु-हरित-दुति होइ ॥ साहित्य परीचय संपादित करें किसी कवि का यश उसके द्वारा रचित ग्रंथों के परिमाण पर नहीं, गुण पर निर्भर होता है। बिहारी के साथ भी यही बात है। अकेले सतसई ग्रंथ ने उन्हें हिंदी साहित्य में अमर कर दिया। श्रृंगार रस के ग्रंथों में बिहारी सतसई के समान ख्याति किसी को नहीं मिली। इस ग्रंथ की अनेक टीकाएं हुईं और अनेक कवियों ने इसके दोहों को आधार बना कर कवित्त, छप्पय, सवैया आदि छंदों की रचना की। बिहारी सतसई आज भी रसिक जनों का काव्य-हार बनी हुई है।

कल्पना की समाहार शक्ति और भाषा की समास शक्ति के कारण सतसई के दोहे गागर में सागर भरे जाने की उक्ति चरितार्थ करते हैं। उनके विषय में ठीक ही कहा गया है -

सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर॥ अपने काव्य गुणों के कारण ही बिहारी महाकाव्य की रचना न करने पर भी महाकवियों की श्रेणी में गिने जाते हैं। उनके संबंध में स्वर्गीय राधाकृष्णदास जी की यह संपत्ति बड़ी सार्थक है -

यदि सूर सूर हैं, तुलसी शशि और उडगन केशवदास हैं तो बिहारी उस पीयूष वर्षी मेघ के समान हैं जिसके उदय होते ही सबका प्रकाश आछन्न हो जाता है।