भामती अद्वैत वेदान्त दर्शन का एक उपसम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय का नाम वाचस्पति मिश्र के 'भामती' नामक ग्रन्थ पर पड़ा है जो आदि शंकराचार्य कृत ब्रह्मसूत्र के भाष्य की टीका है। भामती वाचस्पति मिश्र जी की पत्नी का नाम था ।

 भामति-टीका नाम कैसे हुआ उसको एक दृष्टान्त से आपको बताता हूँ । 

दक्षिण प्रदेश में आज से ग्यारह सौ वर्ष पहले वाचस्पति मिश्र नाम के ऋषि हुये । षड्शास्त्रों पर उन्होंने टीकाएँ लिखी हैं, जो आज भी प्रख्यात हैं।

वे सारा बिन तपश्चर्या और ग्रंथ-लेखन में बिताते थे। विवाह होने के बाद छत्तीस बरस गुजर गये, किंतु वे यह भी नहीं जानते थे कि उनकी पत्नी कौन है? छत्तीस वर्ष साथ रहने पर भी वे अपनी पत्नी को पहचानते नहीं थे।

एक दिवस वे ब्रह्मसूत्र के शांकरभाष्य पर टीका लिख रहे थे । भाष्य लिख रहे थे, किंतु एक पंक्ति कुछ ढंग से लिखी नहीं जा रही थी। दिया भी कुछ धुंधला हो चला था, अतः ठीक तरह से दीखता भी नहीं था। उनकी पत्नी दिए की लौ बढ़ा रही थी। इतने में वाचस्पति की नजर उस पर पड़ी तो उन्होंने पूछा-देवी, तुम कौन हो ?

विवाह हुए छत्तीस बरस बीत चुके थे, फिर भी वे पत्नी को पहचानते नहीं थे। कितने संयमी और जितेन्द्रिय होंगे वे ! पत्नी ने कहा कभी आपका दिवाह हुआ था, वह याद आता है ? वाचस्पति ने कहा- हाँ, कुछ-कुछ याद आ रहा है।

पत्नी ने कहा- मेरे साथ आपका विवाह हुआ था। मैं आपकी दासी हूँ। आज से छत्तीस बरस पहले हमारा विवाह हुआ था ।

पत्नी ने विवाह की याद दिलाई तो वाचस्पति के मन में प्रकाश जगा और उन्होंने पत्नी से कहा- तेरे साथ मेरा विवाह हुआ है। छत्तीस वर्ष तूने मौन ही रहकर मेरी सेवा की। तेरे उपकार अनन्त हैं। तेरी क्या इच्छा है ?

पत्नी भामति ने कहा-नाथ, मेरी तो कोई भी इच्छा नहीं है। आप जगत् के कल्याण के लिए शास्त्रों की टीकाएँ रचते हैं। मैं आपकी सेवा करके कृतार्थ हुई हूँ। आपकी सेवा करते ही मेरी मृत्यु हो । वाचस्पति का हृदय भर आया। पत्नी से और एक बार कुछ माँगने को कहा, किंतु उसने कुछ भी नहीं माँगा।

वाचस्पति-देवी, तुम्हारा नाम क्या है ? भामति- इस दासी को सब भामति कहते हैं।

वाचस्पति- मैं शांकरभाष्य पर जो टीका लिख रहा हूँ, उसका नाम मैं 'भामति टीका' रखूंगा।

आज भी वाचस्पति की वह टीका 'भामति-टीका' के नाम से प्रसिद्ध है।

ऐसा था हमारा भारतवर्ष। एक ही घर में छत्तीस वर्ष तक साथ-साथ रहकर भी संयम का उन्होंने पालन किया था। ऐसे संयमी को ही ज्ञान मिलता है। ज्ञान बाजार में नहीं मिलता। आजकल पुस्तकों के द्वारा ज्ञान का प्रचार और प्रसार तो बहुत हो रहा है, किंतु किसी भी व्यक्ति के मस्तक में ज्ञान दिखाई नहीं देता।